Mango Farming: आम की बंपर पैदावार चाहिए! फरवरी में करें ये खास उपाय, कीटों से बचाएँ फसल

Gaon Connection | Feb 16, 2026, 17:42 IST
Mango Farming Tips: अगर आप आम की खेती करते हैं तो फरवरी का महीना आम की खेती के लिए बेहद ध्यान देने वाला होता है। जनवरी में नई कोंपलें आती है तो फरवरी में मंजर बनना शुरू हो जाता है।फरवरी महीने में जब हवा में नमी 80 प्रतिशत से अधिक हो या अचानक बेमौसम बारिश हो जाए, तो ऐसी स्थिति में फफूंदी सक्रिय हो जाती है और फूल झड़ने लगते हैं। ऐसे में कई प्रकार के कीट और रोग भी आम की फसल को ख़राब कर सकते हैं जैसे झुलसा रोग, गुझिया कीट और मधुआ कीट। जानिए इन कीटों से निपटने के लिए विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं।
<p>आम की फसल को इन रोगों से बचाएं<br></p>

इस साल आम की बंपर पैदावार के लिए फरवरी का महीना बेहद खास है। लखनऊ के केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH) के विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समय मंजर से फल बनने की शुरुआत होती है और इसी नाजुक दौर में खाद, सिंचाई और कीटों से सुरक्षा बाग की किस्मत तय करती है। लेकिन इसी समय पर रोगों के लगने का खतरा भी रहता है। ऐसे में बेहतर फसल के लिए समय पर रोगों की पहचान और बचाव भी जरूरी है।



फरवरी का महीना आम के बागों के लिए बहुत नाजुक या कहें जरूरी होता है क्योंकि इसी समय मंजर से फल बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। दिसंबर से मध्य जनवरी तक पेड़ आराम करते हैं, लेकिन जनवरी के दूसरे हफ्ते के बाद नई कोपलें और बौर आने लगते हैं। यह समय बहुत नाजुक होता है और इस दौरान दी जाने वाली खाद, सही सिंचाई और कीटों से सुरक्षा सीधे तौर पर फसल की पैदावार पर असर डालती है।



शुरुआती बौर में लगने वाला झुलसा रोग

शुरुआती बौर पर झुलसा रोग का ख़तरा बढ़ जाता है। यह तब और भी गंभीर हो जाता है जब हवा में नमी 80 प्रतिशत से अधिक हो या अचानक बेमौसम बारिश हो जाए। ऐसी स्थिति में फफूंदी सक्रिय हो जाती है और फूल झड़ने लगते हैं। इसके अलावा, 'गुझिया' कीट जमीन से चढ़कर फसल तबाह कर सकता है और 'मधुआ' यानी मैंगो हॉपर टहनियों और मंजरों का रस चूसकर उन्हें सुखा देते हैं, जिससे 50 से 90% तक फसल बर्बाद हो सकती है।



इन खतरों से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने कई प्रभावी उपाय बताए हैं, जैसे कि मैंकोजेब और कार्बेन्डाजिम का छिड़काव, 'ट्री-बैंडिंग' तकनीक, नीम या करंज की खली का प्रयोग और जरूरत पड़ने पर 'पेड़ों की धुलाई'। इससे बचने के लिए, 2 ग्राम मैंकोजेब और कार्बेन्डाजिम के मिश्रण को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। यह शुरुआती नुकसान से फसल को बचाने में मदद करता है।



आम के बौर में 'गुझिया' नामक कीट

आम के बागों में 'गुझिया' नाम का एक कीट चुपके से जमीन से चढ़कर पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है। इसे रोकने का सबसे आसान और सस्ता तरीका 'ट्री-बैंडिंग' है। इसके लिए 1 किलो चिकनी मिट्टी, 250 ग्राम पी.ओ.पी. (प्लास्टर ऑफ पेरिस) और थोड़ा जला हुआ मोबिल ऑयल मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट बनाएँ। इस पेस्ट को पेड़ के तने पर जमीन से थोड़ी ऊपर 2-3 इंच चौड़ी पट्टी के रूप में लगाएँ। इस पट्टी के ऊपर प्लास्टिक की शीट या सेलो टेप को कसकर लपेटें और सुतली से बांध दें। यह चिकनी सतह कीटों को पेड़ पर चढ़ने से रोक देती है।



इसके साथ ही, 'इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट' (IPM) अपनाना भी फायदेमंद है। इसके तहत, पेड़ के चारों ओर एक मीटर के घेरे में नीम या करंज की खली डालें। यह मिट्टी में छिपे कीटों को वहीं खत्म कर देती है। यदि कुछ कीट गलती से पेड़ पर चढ़ भी जाएं, तो डायमेथोएट का छिड़काव करना जरूरी है ताकि बौर सुरक्षित रह सकें।



आम के बौर पर लगने वाला मधुआ या मैंगो हॉपर कीट

बौर निकलते ही एक और खतरनाक कीट सक्रिय हो जाता है, जिसे मधुआ या मैंगो हॉपर कहते हैं। यह कीट टहनियों और मंजरों का रस चूसकर उन्हें सुखा देता है। यह पूरे भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में तबाही मचाता है। जब पूर्वी हवा चलती है और मौसम में नमी बढ़ती है, तो इनका हमला इतना तेज होता है कि 50 से 90 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो सकती है। ये कीट एक मीठा और चिपचिपा पदार्थ छोड़ते हैं, जिसे 'सूटी मोल्ड' या काली फफूंद कहते हैं। यह फफूंद पत्तियों को काला कर देती है, जिससे पेड़ धूप से भोजन नहीं बना पाते और कमजोर होकर सूखने लगते हैं। इस समस्या का एकमात्र समाधान सही समय पर निगरानी और बचाव है, वरना फल बनने से पहले ही गिर जाते हैं।



कब करें आम के पेड़ों की धुलाई

अगर आपके बाग में कीटों का हमला ज्यादा दिख रहा है और मंजर आने में देरी हो रही है, तो 'पेड़ों की धुलाई' की सलाह दी जाती हैं। इसके लिए किसी असरदार कीटनाशक की 2 मिलीलीटर मात्रा को एक लीटर पानी में घोलें और स्प्रे मशीन से तने से लेकर पत्तियों तक पूरे पेड़ को अच्छी तरह नहला दें। यह तरीका छिपे हुए कीटों को जड़ से खत्म कर देता है। जब मंजर निकल रहे हों लेकिन फूल अभी खिले न हों, तो और भी सावधानी बरतनी पड़ती है। इस दौरान सिस्टेमिक इंसेक्टिसाइड की 1 मिलीलीटर मात्रा को प्रति लीटर पानी के साथ मिलाकर 'स्टीकर' (चिपकाने वाला गोंद) का प्रयोग जरूर करें। स्टीकर मिलाने से दवा ओस या हल्की फुहार में भी पत्तियों और फूलों पर लंबे समय तक टिकी रहती है। इससे कीटों पर दवा का असर गहरा होता है और आपकी मेहनत सफल होती है।

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