कमजोर मानसून व पश्चिम एशिया संकट से खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा, बैंक ऑफ बड़ौदा का अनुमान
कमजोर मानसून के शुरुआती संकेत और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत के कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ा दी है। बारिश में कमी और खेती से जुड़े इनपुट महंगे होने की आशंका के बीच किसानों की आय, उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। एक तरफ सामान्य से कम मानसून का अनुमान है, तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने खेती की लागत और उत्पादन दोनों पर खतरा बढ़ा दिया है।
मानसून अनुमान: 25 साल का सबसे कमजोर संकेत
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपने पहले दीर्घकालिक पूर्वानुमान में वर्षा को लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 92% रहने का अनुमान जताया है। यह पिछले लगभग 25 वर्षों में सबसे कमजोर शुरुआती अनुमान माना जा रहा है और 2024-25 में दर्ज सामान्य से अधिक बारिश के रुझान के उलट है। ऐसे में खरीफ सीजन की फसलों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
लागत का दबाव: खाद-कीटनाशक महंगे पड़ने का खतरा
बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) के अनुसार कुल वर्षा का सीधा संबंध खरीफ और रबी दोनों फसलों के उत्पादन से होता है, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण खपत प्रभावित होती है। बैंक ने कहा कि इस वर्ष पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जो उर्वरकों के उत्पादन का अहम हिस्सा है। इससे खाद और कीटनाशकों की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ने और अंतिम उत्पादन पर असर पड़ने की संभावना है।
मानसून पर निर्भरता: खरीफ पर ज्यादा असर
देश में सिंचाई कवरेज अभी भी सीमित है और पिछले पांच वर्षों में यह केवल 50-60% के बीच रहा है, जिससे खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। बैंक के विश्लेषण के अनुसार खरीफ उत्पादन और मानसून के बीच कोरिलेशन 0.64 जबकि रबी के लिए 0.59 है, यानी खरीफ फसलें अधिक संवेदनशील होती हैं। 2014-15 और 2015-16 में कमजोर मानसून के दौरान खरीफ उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई थी, हालांकि रबी उत्पादन बेहतर रहा था। IMD ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह शुरुआती अनुमान है और मई के अंत में संशोधित पूर्वानुमान जारी किया जाएगा।