वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के कारण पूरे उत्तर भारत में बारिश, रबी की किन फसलों को हो सकता है नुकसान?

Preeti Nahar | Jan 28, 2026, 11:07 IST
Image credit : Gaon Connection Creatives

उत्तर भारत में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से लगातार बारिश हो रही है। गेहूं, सरसों, मटर और आलू जैसी रबी की फसलें पकने के कगार पर हैं। इस बेमौसम बारिश से किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।जानिए रबी की किन फसलों को हो सकता है नुकसान।

<p>बारिश से रबी की फसलों पर असर<br></p>

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के कारण उत्तर भारत में हो रही लगातार बारिश, रबी की फसलों के लिए भारी पड़ रही है। पश्चिमी दिशा से आने वाली ये ठंडी हवाएं और बादल अपने साथ बारिश, तेज हवाएं और कभी-कभी ओले भी लाती हैं। इस समय गेहूं में बालिया आ रही है तो वहीं सरसों में फूल खिले हैं। मटर और आलू जैसी फसलें पकने लगी हैं और बेमौसम की इस बारिश से किसानों को भारी नुकसान हो सकता है।समय रहते समझना होगा कि वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से होने वाली ये बारिश कौन-कौन सी फसलों को क्या नुकसान पहुँचा सकती है। ताकि किसान भाई, बहन अपनी तैयार फसलों को बेमौसम बारिश से बचा सके।



गेहूं की फसल



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जो नवंबर-दिसंबर में बोई जाती है, जनवरी के अंत तक कल्ले निकलने से लेकर दाने बनने की शुरुआत में होती है। इस समय हल्की बारिश गेहूं के लिए फायदेमंद होती है क्योंकि इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और मौसम ठंडा रहता है। लेकिन, लगातार कई दिनों तक खेत में पानी भरा रहना, जल निकासी की समस्या, बहुत ज्यादा बारिश या ओले पड़ना गेहूं के लिए नुकसानदायक साबित होता है। बारिश होने पर गेहूं का दाना ठीक से नहीं भर पाता। तेज हवा चलने से फसल गिर जाती है। लगातार नमी से फसल में जंग (रस्ट) लग जाती है। कटाई के समय बारिश होने पर दाना काला पड़ जाता है, जिससे सरकारी मंडी में गेहूं का दाम कम मिलता है। कई बार तो किसान की पूरी मेहनत आधी रह जाती है।



सरसों की फसल-



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जो अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती है, जनवरी के अंत तक फूल और फलियां बनने की अवस्था में होती है। इस समय बारिश होने से सरसों का काफी नुकसान होता है। बारिश से फूल झड़ जाते हैं और फलियां ठीक से नहीं बन पातीं। नमी बढ़ने पर महू (एक तरह का कीड़ा) लग जाता है, जिससे दाने छोटे रह जाते हैं और तेल भी कम निकलता है। भारी बारिश और तेज हवा से तैयार सरसों की फसल गिर जाती है।



मटर की फसल-



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जो एक दलहनी फसल है और अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती है, जनवरी के अंत तक फूल और फलियां लगने की स्टेज में होती है, और कुछ जगहों पर तो तोड़ाई भी शुरू हो जाती है। दलहनी फसलें ज्यादा पानी बिल्कुल नहीं सह पातीं। ऐसे समय में बारिश होने से मटर सड़ सकती है। अगर खेत में पानी भर जाए तो जड़ें सड़ने लगती हैं, पौधा पीला पड़ जाता है, फलियां टूटकर गिर जाती हैं और दाने सिकुड़ जाते हैं। ऐसी फसल का न तो अच्छा दाम मिलता है और न ही वजन के हिसाब से बिक पाती है।



आलू की फसल-



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आलू की बुआई ज्यादातर अक्टूबर-नवंबर में होती है, जनवरी के अंत तक मिट्टी के अंदर आलू का आकार बढ़ने लगता है। 15 जनवरी के आसपास होने वाली हल्की बारिश आलू की फसल के लिए फायदेमंद होती है क्योंकि इससे मिट्टी नरम रहती है, आलू का साइज अच्छा बढ़ता है और ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से हो रही बारिश कई राज्यों में आलू की फसल को खराब कर सकती है। इस मौसम में अधिक बारिश होने से झुलसा रोग तेजी से फैलता है। आलू जमीन के अंदर ही बैठ जाता है और खेत में पानी रुकने पर सड़ने लगता है। खुदाई में देरी से नुकसान और बढ़ जाता है और मंडी में खराब माल का दाम गिर जाता है।



किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है जब बारिश कटाई के समय हो, या बारिश के साथ तेज हवा या ओले पड़ें। अगर 2-3 दिन तक धूप न निकले तो ऐसे मौसम में किसान की समस्या । ऐसे में किसानों को सलाह दी जाती है कि वे खेत में पानी न रुकने दें। मौसम साफ होते ही कटाई में देरी न करें। अगर फसल में कोई बीमारी दिखे तो गांव के कृषि सलाहकार से पूछकर दवा डालें। अगर फसल बीमा कराया है तो तुरंत सूचना दें। बेवजह सिंचाई बिल्कुल न करें।

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