Mahila Sarpanch: एक सरपंच जो सिर्फ नाम की नहीं, फैसलों की भी बनीं प्रधान, तोड़ी परंपरागत सोच की दीवार
भारत आज भी काफी हद तक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। पंचायत चुनावों में आज बड़ी संख्या में महिलाएँ प्रधान या सरपंच बनकर चुनी तो जाती हैं, लेकिन कई जगहों पर असली फैसले लेने की शक्ति अब भी उनके हाथों में पूरी तरह नहीं होती। पारंपरिक सोच और सामाजिक दबाव के कारण कई बार महिला प्रतिनिधियों को केवल औपचारिक पद तक सीमित समझ लिया जाता है। ऐसे माहौल में जब कोई महिला प्रधान अपने अधिकारों को समझकर खुद नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालती है, तो वह न सिर्फ अपनी पहचान बनाती है बल्कि गाँव में बदलाव की नई राह भी खोलती है।
सक्रिय भूमिका और मजबूत फैसलों से बदली धारणा
ये कहानी है हरियाणा के फतेहाबाद जिले के भट्टू कलां ब्लॉक के गढ़ली गाँव की सरपंच Sunita Devi की कहानी है। जो ग्रामीण नेतृत्व में बदलाव और महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल है। पंचायत चुनाव जीतने के बाद शुरुआत में उन्हें भी उन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनसे अक्सर महिला प्रतिनिधि गुजरती हैं। कई लोग उन्हें केवल औपचारिक सरपंच मानते थे, लेकिन सुनीता देवी ने धीरे-धीरे अपनी सक्रिय भूमिका और मजबूत फैसलों से यह धारणा बदल दी।
शुरुआत में आसान नहीं था नेतृत्व
जब सुनीता देवी गाँव की सरपंच चुनी गईं, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पंचायत में महिलाओं को अक्सर केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता था। कई जगह यह धारणा बनी हुई थी कि महिला सरपंच केवल नाम की होती हैं और असली फैसले परिवार या अन्य लोग लेते हैं।
सुनीता देवी बताती हैं, "मेरे प्रधान चुनने के बाद शुरुआत में गाँव में कुछ ऐसा ही माहौल था। पंचायत की बैठकों में मेरी भूमिका सीमित समझी जाती थी और निर्णय प्रक्रिया में मेरी भागीदारी उतनी सक्रिय नहीं मानी जाती थी। लेकिन मैंने इस स्थिति को बदलने का फैसला किया और धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।" सुनीता देवी बताती हैं कि जमीनी स्तर के शासन में औपचारिक प्रतिनिधित्व और वास्तविक प्रतिनिधित्व में जमीन आसमान का अंतर होता है।
सामने आयी कई सारी चुनौतियाँ
भारत सरकार का पंचायती राज का उद्देशय होता है निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने समुदाय का नेतृत्व करना। लेकिन कई स्थानों पर वहाँ की पारंपरिक धारणाएँ आज भी तय करती है कि शासन कौन करेगा या समुदाय का प्रतिनिधित्व कौन करेगा। सुनीता देवी बताती हैं कि शुरूआत में मेरे सामने भी यही समस्या आई, जो ज्यादातर महिला प्रधानों के सामने आती है जैसे महिला प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है वे दूसरों द्वारा लिए गए निर्णयों का पालन करें। इसे "प्रॉक्सी नेतृत्व" कहा जाता है।
गढ़ली गाँव में भी ऐसा ही था। इसके अलावा एक और समस्या थी जैसे गाँव के शासन में महिलाओं की भागीदारी भी सीमित थी। गाँव की सभाओं में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी, जिसके कारण कई अधिकतर महिलाएँ सार्वजनिक मंचों पर बोलने में असहज महसूस करती थी। सुनीता देवी को लगा कि स्थिति ऐसी ही रही तो जमीनी लोकतंत्र का उद्देश्य अधूरा रहा जाएगा।
परिवर्तन की शुरूआत
गाँव की समस्याओं को समझने के लिए सुनीता देवी ने पंचायत से जुड़े नियमों और अधिकारों को जमीनी स्तर से समझने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने पंचायत राज व्यवस्था के प्रावधानों को पढ़ा और जाना कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में उनके पास कौन-कौन से अधिकार और जिम्मेदारियां हैं। इस जानकारी ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया। उन्हें महसूस हुआ कि अगर सही तरीके से काम किया जाए तो किसी भी गाँव की पंचायत, उस गाँव के विकास में बड़ी भूमिका निभा सकती है और महिला प्रतिनिधि भी मजबूत नेतृत्व दे सकती हैं।
पंचायत बैठकों में सक्रिय भागीदारी
धीरे-धीरे सुनीता देवी ने पंचायत की बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि पंचायत के फैसले खुली चर्चा के बाद लिए जाएं और गाँव के लोगों की राय को भी महत्व दिया जाए उन्होंने विकास कार्यों के लिए सरकारी विभागों और अधिकारियों के साथ संवाद बढ़ाया ताकि गाँव को योजनाओं का ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके। पंचायत की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में भी उन्होंने प्रयास किए।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की पहल
सुनीता देवी ने यह महसूस किया कि गाँव के विकास में महिलाओं की भागीदारी बहुत जरूरी है। इसके लिए उन्होंने महिला चौपाल और सामुदायिक बैठकों का आयोजन शुरू कराया। इन बैठकों में महिलाओं को खुलकर अपनी समस्याएं और जरूरतें बताने का मौका मिला। धीरे-धीरे गाँव की महिलाएं इन बैठकों में आने लगीं और पंचायत के कामों में उनकी भागीदारी बढ़ने लगी। इससे न सिर्फ महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि गाँव के विकास से जुड़े कई नए मुद्दे भी सामने आए।
गाँव में दिखने लगा बदलाव
समय के साथ गढ़ली गाँव में पंचायत के कामकाज का माहौल बदलने लगा। ग्राम सभा की बैठकों में लोगों की भागीदारी बढ़ी और महिलाएं भी पहले से ज्यादा सक्रिय होकर अपनी बात रखने लगीं। पंचायत अब केवल विवाद सुलझाने की जगह नहीं रही, बल्कि गाँव के विकास, सुविधाओं और समुदाय के कल्याण पर ज्यादा ध्यान देने लगी। लोगों में यह भरोसा भी बढ़ा कि पंचायत उनके लिए काम कर रही है और उनकी आवाज सुनी जा रही है।
नेतृत्व से मिली नई सीख
सुनीता देवी का मानना है कि अगर महिलाओं को सही जानकारी, सहयोग और अवसर मिले तो वे गाँव के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उनका अनुभव बताता है कि जागरूकता और आत्मविश्वास से महिलाएं न केवल पंचायत का नेतृत्व कर सकती हैं, बल्कि अपने समुदाय में सकारात्मक बदलाव भी ला सकती हैं। उनकी यात्रा यह साबित करती है कि एक महिला सरपंच केवल औपचारिक प्रतिनिधि नहीं होती, बल्कि सही समर्थन और संकल्प के साथ वह अपने गांव की प्रगति की मजबूत नेता बन सकती है।