World Radio Day: पहाड़ों में गूंज रही 'मंदाकिनी की आवाज़', ग्रामीण बने रेडियो जॉकी
रुद्रप्रयाग की पहाड़ियों में बसा ‘मंदाकिनी की आवाज़’ सिर्फ एक रेडियो स्टेशन नहीं, बल्कि उन लोगों की उम्मीद है, जिनकी अपनी बोली-भाषा में बात करने का हक़ मुख्यधारा के मीडिया से कहीं गायब हो गया था। विश्व रेडियो दिवस के मौके पर यह कहानी उस सामुदायिक रेडियो की है, जो 24 साल के संघर्ष के बाद आज पहाड़ की हर घाटी में गूंजता है। इस कम्युनिटी रेडियो की कहानी काफ़ी है दुनिया को यह बताने के लिए कि आज के आधुनिक युग में रेडियो की अहमियत क्या है और वह आज भी प्रासंगिक है।
सुबह की पहली किरण के साथ जब 75 वर्षीय जगदीश प्रसाद भट्ट अपने घर के बाहर धूप में कुर्सी लगाते हैं, तो उनके हाथ में एक पुराना रेडियो ज़रूर होता है। फौज से रिटायर हो चुके भट्ट साहब के लिए यह रेडियो महज़ एक यंत्र नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा है।
"अगर यह रेडियो न हो, तो सूना-सूना लगेगा," वे कहते हैं, "टीवी तो है, लेकिन 24 घंटे अंदर बैठे रहने का कोई औचित्य नहीं। रेडियो छोटा है, जहाँ चाहो ले जाओ - खेत में, बगीचे में, धूप में।"
ऐसा ही रुद्रप्रयाग ज़िले के हज़ारों घरों में वर्षों से होता आ रहा है। महिलाएं घास काटते हुए, किसान खेतो पर काम करतें हुए, और बुज़ुर्ग धूप सेंकते हुए 90.8 FM पर 'मंदाकिनी की आवाज़' सुनते हैं। यह वह रेडियो है जो उनकी अपनी भाषा गढ़वाली में बोलता है, उनके अपने गीत सुनाता है, और उनकी अपनी समस्याओं का हल बताता है।
भट्ट साहब अपनी दिनचर्या के बारें में बतातें हुए कहतें हैं," सुबह 6-7 बजे से प्रोग्राम चालू हो जाता है, कीर्तन वगैरह आते हैं, भजन आ जाते हैं और जो ये पंचांग कि आज कैसा दिन रहेगा,ये सारा प्रोग्राम चलता रहता है। फिर जो है उसमें गढ़वाली प्रोग्राम चलते रहते हैं। फिर 2 बजे से पहले न्यूज़ वगैरह चलते रहते हैं और उसके बाद 2 बजे से गढ़वाली प्रोग्राम 3 बजे तक चलते हैं। उसके बाद एक पोटली प्रोग्राम आता है, इंटरव्यू आता है और शाम को ये समय भजन-कीर्तन फिर शुरू हो जाता है।
24 साल का लंबा सफ़र
यह कहानी 2001 से शुरू होती है, जब मनवेन्द्र सिंह नेगी और उनके साथियों ने सामुदायिक रेडियो का सपना देखा। लेकिन तब भारत में सामुदायिक रेडियो की कोई नीति ही नहीं थी। "हम संघर्ष करते रहे," नेगी बताते हैं। "2007 में सरकार ने पॉलिसी बनाई, 2010 में हमने आवेदन किया, और 2014 में जाकर हमें फ्रीक्वेंसी मिली।"
लेकिन इस बीच 2013 में केदारनाथ आपदा आ गई। जब मंदाकिनी नदी ने तबाही मचाई, जब मोबाइल टावर ध्वस्त हो गए, जब बिजली गायब हो गई, तब 'मंदाकिनी की आवाज़' की टीम ने महसूस किया कि रेडियो कितना ज़रूरी है।
"लोगों के रोज़गार केदारनाथ से जुड़े थे। परिवारों से संपर्क टूट गया था। कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी," मानवेन्द्र सिंह नेगी याद करते हैं। "हम मायूस थे कि अनुमति नहीं थी, तो कुछ ब्रॉडकास्ट नहीं कर सकते थे। लेकिन हम राहत कार्य में जुट गए। 3,000 परिवारों तक राहत सामग्री पहुंचाई, स्कूल बनाए, मेडिकल कैंप लगाए।"
जिला प्रशासन ने भी इस आपदा में रेडियो की अहमियत समझी। तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. राघव लंगर ने मंत्रालय को पत्र लिखा कि 'मंदाकिनी की आवाज़' को तुरंत लाइसेंस दिया जाए।
21 सितंबर 2014 वह तारीख़ है जब पहली बार गढ़वाली में कार्यक्रम प्रसारित हुए और तब से आज तक यह सिलसिला जारी है।
जब श्रोता कहता है - "खाना नहीं पचता"
पूनम रावत पिछले 17-18 साल से 'मंदाकिनी की आवाज़' से जुड़ी हैं। इंटर की छात्रा थीं जब यहाँ आईं। आज वे कम्युनिकेशन टीम हेड हैं।
"मंदाकिनी की आवाज़ ही हमारे लिए सबकुछ है," वे कहती हैं। "यहाँ आकर हमने अपने विचारों की अभिव्यक्ति सीखी। 'करते-करते सीखना' यहीं पता चला।" पूनम बताती हैं कि श्रोताओं का प्यार अद्भुत है। "एक बुज़ुर्ग महिला अस्पताल में भर्ती थीं वहाँ रेडियो नहीं पकड़ता था। उन्होंने ज़िद करी - या तो रेडियो सुनाओ या घर ले चलो। मजबूरी में परिवार को उन्हें घर लाना पड़ा।"
पूनम रावत ने मुस्कुराते हुए कहा,"श्रोता कहते हैं की जिस दिन 'मंदाकिनी की आवाज़' नहीं सुनते, उस दिन खाना नहीं पचता दिन अधूरा लगता है।"
मंदाकिनी की आवाज़ में काम करने वाले रेडियो जॉकी आस पास के गाँव के ही लोग हैं। यहाँ पर काम करने के लिए क्या प्रतिभा होनी चाहिए इस पर मानवेन्द्र सिंह नेगी बतातें हैं," हमारे जो लोग हैं वो अपना फुल टाइम देते हैं, जिसमें वो रिपोर्टिंग, रेडियो जॉकी, स्टेशन में कार्यक्रमों का निर्माण, स्क्रिप्ट राइटिंग तक सारे काम करतें हैं। इसके अलावा हमारे जो रिपोर्टर हैं वो स्वैच्छिक रूप से गाँव से रिपोर्ट यहाँ तक प्रेषित करते हैं। जो बाज़ार भाव संवाददाता हैं वो बाज़ार का भाव बताते हैं कि सब्जियों का, फलों का बाज़ार भाव क्या है, वो प्रत्येक हफ्ते उसका अपडेट 'मंदाकिनी की आवाज़' के साथ अपनी ही आवाज़ में साझा करते हैं।"
यह भी पढ़ें: बदलता रेगिस्तान: हरियाली की आड़ में भूजल संकट की कहानी
क्यों ज़रूरी है आज भी रेडियो?
इंटरनेट, टीवी, सोशल मीडिया के इस दौर में रेडियो क्यों? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। पूनम रावत का जवाब सीधा है कि "टीवी देखने के लिए समय चाहिए। रेडियो काम करते-करते सुन सकते हैं और सामुदायिक रेडियो ही अपनी बोली-भाषा में कार्यक्रम देता है यह कानों से देखना सिखाता है।" पहाड़ की महिलाओं की व्यस्त दिनचर्या में टीवी देखने या सोशल मीडिया चलाने का समय नहीं लेकिन रेडियो उनका साथी है।
नेगी जी कहते हैं, "यहाँ लोगों का विश्वास है रेडियो पर यह रेडियो लोगों के द्वारा, लोगों के लिए चलता है। अपनी बोली में जानकारी मिलती है और सबसे ख़ास बात - अपने ही लोगों की आवाज़ सुनाई देती है। जब कोई सुनता है कि 'मेरे मामा जी गा रहे हैं, मेरे ताऊ जी बता रहे हैं' - तो एक अलग ही जुड़ाव होता है।"
एक परिवार की तरह
'मंदाकिनी की आवाज़' की कोर टीम में आठ लोग हैं - पूनम रावत, संजना, उमा नेगी, मनीषा नेगी, पूनम बडियारी, शिवानन्द नौटियाल, भाग्येश्वरी - सभी आसपास के गांवों से। इसके अलावा स्वैच्छिक रिपोर्टर हैं जो गांवों से रिपोर्ट भेजते हैं, बाज़ार भाव बताते हैं। देहरादून के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह रावत ख़ुद अपनी आवाज़ में मौसम की जानकारी भेजते हैं - "अगले चार-पांच दिन बारिश रहेगी, खेती-बाड़ी के लिए तैयार रहें, नदी घाटी में सतर्क रहें।" सुबह 6-7 बजे से शाम तक कार्यक्रम चलते हैं। कीर्तन-भजन, पंचांग, न्यूज़, गढ़वाली गीत, इंटरव्यू, 'पोटली' प्रोग्राम, और 'ओखाण' (लोक मुहावरे)।
भट्ट साहब कहते हैं, "पूरे गढ़वाल को 'मंदाकिनी की आवाज़' ने जोड़ दिया है। विदेशों में हमारे भाई-बहन भी इसे सुनते हैं। यह बंद नहीं होना चाहिए।"
आज की दुनिया में रेडियो का महत्व
टेक्नोलॉजी के इस युग में भी रेडियो की प्रासंगिकता ख़त्म नहीं हुई है। ख़ासकर सामुदायिक रेडियो की यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समुदाय की आवाज़ है। जब बड़े रेडियो स्टेशन हिंदी या अंग्रेज़ी में बोलते हैं, तो 'मंदाकिनी की आवाज़' गढ़वाली में बोलता है। जब मुख्यधारा मीडिया पहाड़ की समस्याओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो यह रेडियो उन्हें उठाता है। जब कलाकारों को मंच नहीं मिलता, तो यह रेडियो उन्हें आवाज़ देता है।
यह एकजुटता का माध्यम है जब एक गांव का व्यक्ति दूसरे गांव के व्यक्ति को रेडियो पर सुनता है, तो रिश्ते मज़बूत होते हैं। यह संस्कृति को बचाने का ज़रिया है। लोक गीत, ओखाण, परंपराएं यहाँ सब सुरक्षित हैं और सबसे महत्वपूर्ण - आपदा के समय यह जीवनरेखा बन जाता है।
एक नदी की तरह
'मंदाकिनी की आवाज़' का नाम मंदाकिनी नदी से लिया गया है। पूनम रावत कहती हैं, "नदी किसी एक को पानी नहीं देती। जितने भी लोग आएं, जानवर आएं, सबको देती है। वैसे ही यह रेडियो भी सबके लिए है। जितनी दूर तक फ्रीक्वेंसी जाएगी, वहाँ तक जानकारी पहुंचेगी।" सचमुच, यह रेडियो एक नदी की तरह ही बहता है - निरंतर, निस्वार्थ, सबको सींचता हुआ।
विश्व रेडियो दिवस पर जब पूरी दुनिया रेडियो के महत्व को याद करती है, तो 'मंदाकिनी की आवाज़' इस बात का जीता-जागता सबूत है कि रेडियो आज भी प्रासंगिक है, ज़रूरी है, और अपरिहार्य है। 24 साल का संघर्ष, केदारनाथ की त्रासदी, और अंततः वह आवाज़ जो आज हर घर में गूंजती है यह सिर्फ एक रेडियो स्टेशन की कहानी नहीं, बल्कि समुदाय की ताकत की कहानी है। यह उस विश्वास की कहानी है कि अपनी आवाज़ सबसे मज़बूत होती है।
जैसा कि भट्ट साहब ने कहा,"यह बंद नहीं होना चाहिए" और यह बंद नहीं होगा क्योंकि यह सिर्फ रेडियो नहीं, पहाड़ की धड़कन है।