मछुआरों की आजीविका बनाम समुद्री संरक्षण: WTO में भारत ने रखी अपनी बात
विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चल रही मत्स्यिकी सब्सिडी से जुड़ी वार्ताओं में भारत ने एक बार फिर साफ किया है कि समुद्री संसाधनों की रक्षा के साथ-साथ मछुआरों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत का कहना है कि टिकाऊ और जिम्मेदार मत्स्यन देश के मछुआरा समुदाय की परंपरा और व्यवहार का हिस्सा रहा है।
मत्स्यिकी सब्सिडी पर WTO का समझौता, जिसे एग्रीमेंट ऑन फिशरीज़ सब्सिडीज़ (WTO-FSA) कहा जाता है, 17 जून 2022 को 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में अपनाया गया था। यह WTO का पहला ऐसा समझौता है, जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और समुद्री मछली भंडार को बचाना है।
इस समझौते के तहत उन सब्सिडियों पर रोक लगाने का प्रावधान है, जो अवैध मछली पकड़ने, जरूरत से ज्यादा शिकार और समुद्री मछली भंडार के खत्म होने का कारण बनती हैं। अब तक की बातचीत मुख्य रूप से अवैध और अनियमित मत्स्यन तथा अत्यधिक दोहन वाले मछली भंडार से जुड़ी सब्सिडियों तक सीमित रही है। वहीं, जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने की क्षमता और बड़े औद्योगिक बेड़ों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत अभी जारी है।
फरवरी 2024 में हुए 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। इस दौरान भारत ने दो टूक कहा कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से बड़े औद्योगिक जहाजों को भारी सब्सिडी दी है, वही समुद्री संसाधनों के अत्यधिक दोहन के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में विकासशील देशों और छोटे द्वीपीय देशों पर एक जैसे नियम लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि देश के लाखों छोटे मछुआरों के लिए सब्सिडी केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जीवन और भोजन की सुरक्षा का साधन है। तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरे पूरी तरह समुद्र पर निर्भर हैं और उनके पास औद्योगिक देशों जैसी तकनीक या संसाधन नहीं हैं।
इसी आधार पर भारत ने WTO में यह मांग दोहराई कि मत्स्यिकी सब्सिडी पर कोई भी व्यापक समझौता “सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि सभी देशों की जिम्मेदारियां एक जैसी नहीं हो सकतीं, बल्कि उनकी क्षमता और विकास स्तर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भारत ने यह भी आग्रह किया कि दूर-दराज समुद्री क्षेत्रों में मछली पकड़ने वाले देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडियों पर कम से कम 25 साल तक रोक लगाई जाए। भारत का मानना है कि खुले समुद्र में बड़े औद्योगिक जहाजों द्वारा किया जाने वाला मत्स्यन समुद्री जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
मत्स्यिकी सब्सिडी से जुड़े इस समझौते की निगरानी WTO की एक समिति करती है। इसके तहत सदस्य देशों को समय-समय पर अपनी सब्सिडी और नीतियों की जानकारी देनी होती है। यदि किसी देश को दूसरे देश की जानकारी पर आपत्ति होती है, तो वह अतिरिक्त विवरण भी मांग सकता है।
इस समझौते में विवाद निपटान की व्यवस्था भी है, ताकि नियमों का पालन निष्पक्ष और भेदभाव-रहित तरीके से हो सके। भारत का कहना है कि वह WTO में सक्रिय रूप से जुड़ा रहेगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर भी न्यायपूर्ण तरीके से लागू हों।
कुल मिलाकर, भारत का रुख साफ है समुद्र को बचाना जरूरी है, लेकिन यह काम छोटे मछुआरों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। टिकाऊ मत्स्यन का मतलब सिर्फ मछलियों की रक्षा नहीं, बल्कि उन समुदायों की सुरक्षा भी है, जिनकी जिंदगी समुद्र से जुड़ी हुई है।