वर्तमान सरकार अगर कश्मीर समस्या हल न कर पाई तो ज़्यादा विकल्प नहीं बचेंगे (भाग- 3)

वर्तमान सरकार अगर कश्मीर समस्या हल न कर पाई तो ज़्यादा विकल्प नहीं बचेंगे (भाग- 3)जम्मू-कश्मीर।

कश्मीर घाटी से कश्मीरियत तो पहले ही चली गई, अब सरकार यदि चाहे तो कश्मीर बचा सकती है। श्रीनगर के एनआईटी में कई दिनों तक छात्रों के दो खेमे बन गए थे एक कश्मीरी छात्रों का दूसरा शेष भारत के छात्रों का। जब भारत की क्रिकेट टीम की हार पर खुशी मनाई गई तो शेष भारत के छात्रों ने भारत माता की जय के नारों के साथ जुलूस निकाला। स्थानीय पुलिस ने उनकी पिटाई कर दी। यह वो कश्मीर तो नहीं है जहां से शंकराचार्य ने दुनिया को सन्देश दिया था, गुरु तेग बहादुर और स्वामी विवेकानन्द ने धर्म का प्रचार किया था, सूफी सम्प्रदाय जहां पनपा था, अमर नाथ यात्रियों का मुसलमानों द्वारा भी स्वागत होता था और जिसे दुनिया का स्वर्ग का जाता था।

मान लेता हूं कि छात्रों में जोश अधिक और होश कम होता है लेकिन कश्मीरी बड़ों ने कश्मीरी पंडितों को मार पीट कर कश्मीर से बाहर भगा दिया जो दर-दर भटक रहे हैं, बड़ों में तो होश होना चाहिए। इतना ही नहीं, आतंकवादियों के जनाज़़े में हजारों की संख्या में कश्मीरी शामिल होते हैं, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगते हैं, पाकिस्तान और बगदादी के इस्लामिक झंडे फहराए जाते हैं और कश्मीर में आतंकवादियों के शुभचिन्तकों के घरों से सेना पर पत्थर फेंके जाते हैं।

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कश्मीरियत बचाने के लिए धारा 370 का सहारा लिया गया था भारत और कश्मीर के बीच में पुल के रूप में जब कि कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर का भारत में विलय कर दिया था। पुल की क्या जरूरत थी। संसद ने पास तो कर दिया कि भारत के पास वाला और पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। लेकिन प्रस्ताव पास कर देने से वह अभिन्न अंग नहीं बन जाएगा। पिछले 70 साल में हमारे नेताओं ने सेना के जवानों से नहीं पूछा होगा कि उनकी राय क्या है। प्रजातंत्र में सेना की राय नहीं चलती लेकिन हमारी सेना ने हजारों सिपाही गंवाए और सिर कटाए हैं और कितने सेनानी शहीद होंगे। हमारे जवानों के जान की कीमत यह देश कभी नहीं चुका सकता। अटल जी ने 1965 के युद्ध के बाद कहा था, ''कितनी बहनों की मांग सूनी हो गई, कितनी माताओं की गोद खाली हो़ गई।'' लेकिन अब तो यह सिलसिला थमना चाहिए।

कश्मीर समस्या का हल खोजने के लिए अटल जी की सरकार के दिनों में इज़राइल से एक रक्षा विशेषज्ञों की टीम आई थी। उस टीम का निश्चित मत था कि जब तक कश्मीर का आबादी सन्तुलन नहीं बदलेगा समस्या का हल सम्भव नहीं। उसके लिए विरोधी दल जो नरेन्द्र मोदी की ढुलमुल कश्मीर नीति की आलोचना करते हैं उन्हें एक जुट होकर धारा 370 समाप्त करानी चाहिए। इज़राइल के प्रधान मंत्री का यह कहना कि हम इस दिन का 70 साल से इन्तजार कर रहे थे बहुत कुछ कहता है। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि नेहरू सरकार ने कई साल तक उस देश को मान्यता तक नहीं दी और उनकी सरकार ने 40 साल तक कूटनीतिक सम्बन्ध तक नहीं बनाए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने 1992 में कूटनीतिक सम्बन्ध कायम नहीं किए और वाजपेयी सरकार ने सम्बन्धों को मजबूती नहीं दी। नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री के रूप में इज़राइल गए और उनके स्वागत में वहां के लोगों ने पलक पांवड़े बिछाए।

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हम अलगाववाद और नक्सलवाद से जूझ रहे हैं जब कि इससे कहीं खराब परिस्थितियों में इजरायल ने आतंकवादियों और घुसपैठियों को धूल चटा दी। भारत के नेता हिन्दू मुसलमान की सोच से आगे बढ़ ही नहीं पाए, बटवारे के बाद भी नहीं। कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय मुस्लिम आबादी नाराज न होने पाए इसकी अनावश्यक चिन्ता सताती रही। अलगाववादी हुरियत से बात करने और आतंकवादियों के मानवाधिकारों की रक्षा की वकालत करते रहे। कश्मीर के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि 2017 की ईद पर वहां के मुस्लिम पुलिस कर्मचारी मस्जिदों में नमाज तक नहीं पढ़ सके। कश्मीर में हिन्दू समाज अल्पसंख्यक है और वहां इसे यह दर्जा मिले। वहां सभी देशवासियों को बसने की आजादी हो। कश्मीर से विस्थापित लोगों को कश्मीर में ही सुरक्षित स्थान दिलाया जाए। लद्दाख, जम्मू और कश्मीर तीन भूभाग है इन्हें तीन प्रदेशों में विभाजित किया जाना चाहिए।

सलाहुद्दीन को आतंकवादी घोषित करके यह तो अमेरिका ने माना कि कश्मीर के अलगाववादी कोई आजादी की लड़ाई नहीं लड़ रहे, वे आतंकवादी हैं। लेकिन इतना करने मात्र से कुछ नहीं होगा जब तक हमारी सेना को इजरायली सेना की तरह अलगाववादियों से निपटने की पूरी छूट नहीं दी जायगी। अलगाववादियों से बात करने में कितना समय बर्बाद किया गया और अब जाकर उनकी सरकारी सुरक्षा कम की गई।

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प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय कूटनीति को नई दिशा दी है और राहुल गांधी जैसा ही कोई उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहेगा। भारत की अमेरिका, जापान और इज़राएल से मित्रता उपयोगी रहेगी कम से कम हिन्दी चीनी भाई जैसा अनुभव तो नहीं रहेगा। जापान और इजराएल राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं और अब डोनाल्ड ट्रम्प ने भी वही रास्ता चुना है। मोदी यथार्थवादी हैं और उनकी क्षमता का पूरा लाभ देश को तभी मिलेगा जब वह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में कामयाब होंगे। अमेरिका से पैसा और हथियार तो पाकिस्तान ने भी खूब हासिल किए थे। हम इजराएल के मामले में नेहरूवियन सोच से पूरी तरह बाहर निकल चुके हैं। यदि वर्तमान सरकार कश्मीर समस्या न हल कर पाई तो कश्मीर घाटी में अधिक विकल्प नहीं बचेंगे।

कष्ट की बात है कि कश्मीर के पत्थरबाजो की हिमायत करने वालों में हुरियत के साथ ही फारूख अब्दुल्ला भी शामिल हो गए हैं। हुरियत नेताओं के खिलाफ पक्के सबूत सरकार को मिले हैं कि वे आतंकवादियों को पैसा मुहैया कराते रहे हैं फिर भी महबूबा मुफ्ती उनसे बात करने की वकालत करती हैं। जम्मू कश्मीर के हालात अस्सी के दशक में आज से भी खराब थे जब राजीव गांधी ने जगमोहन को वहां का गवर्नर बनाया था। जगमोहन ने हालात पर काबू पा लिया था। लेकिन तब तक वीपी सिंह की जनता दल की सरकार बनी और पहली बार मुस्लिम गृहमंत्री हुए महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद। उन्होंने अलगाववादी शेख अब्दुल हमीद, गुलाम नबी बट, नूर मुहम्मद, मुहम्मद अल्ताफ और मुश्ताक अहमद जर्गर कों छोड़ दिया। कश्मीर समस्या को अटल जी ने जहां छोड़ा था वहां से शुरू नहीं कर सकते क्योंकि तब पत्थरबाजी नहीं हो रही थी। अब जम्मू कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि हमारी सरकार जम्मू कश्मीर के हालात सुधारने में नाकाम रही है।

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जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के निवासी पत्थरबाज नहीं है इसलिए वहां का विकास न रुके इसलिए अलग प्रान्त बनाना सहायक होगा। कश्मीरी पंडित देश के अलग-अलग भागों में कठिनाइयों में रह रहे हैं उन्हें जम्मू कश्मीर का मूलनिवासी होने के नाते वापस बुलाना चाहिए लेकिन इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। बकरवार जो एक जमाने से वहां रह रहे हैं औरे भेड़ चराने वाले हैं जिन्होंने करगिल की घुसपैठ को सबसे पहले देखा और बताया था, उन्हें कश्मीरी मानना चाहिए। कश्मीर घाटी कों भी अलग प्रान्त बनाकर साल भर पूरे समय उसका प्रशासन श्रीनगर से ही आसान रहेगा।

जितनी जल्दी सम्भव हो धारा 370 को समाप्त करके वहां पर दिल्ली का सीधा नियंत्रण होना चाहिए। मोदी सरकार में भारत के इस भू भाग को बचाने की इच्छाशक्ति तो है क्योंकि जम्मू कश्मीर को प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय में लाकर एक कदम आगे बढ़ाया है। लेकिन यदि हम वहां सभी भारतीयों को स्वतंत्र रूप से बसने की इजाज़त नहीं दे सकते और भारत की धरती पर पाकिस्तानी मानसिकता को बर्दाश्त करते रहना चाहते हैं तो अपने सैनिकों को शहीद कराने का कोई मतलब नहीं है।

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