भारत में अनावश्यक है सेकुलर - गैर सेकुलर की बहस

Dr SB Misra | Jan 28, 2026, 11:04 IST
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भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।

<p>भारतीय संदर्भ में सेकुलर जीवन शैली बिताने के लिए नास्तिक विचारों के बजाय सर्वधर्म सहिष्णु भाव और ईश्वर अंश जीव अविनाशी में विश्वास रखते हुए मानवता या इंसानियत पर जोर देना होगा।<br></p>

भारत में सेकुलरवादी सोच सनातन है और यहां शक, हूण, यवन, पारसी और न जाने कितने धर्मों के मानने वालों ने सम्मानपूर्वक स्थान पाया है और रह रहे हैं। इस देश में कहा गया है- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया। इससे बेहतर सेकुलर की कल्पना क्या हो सकती है कि यहां पर सारे संसार को बंधुत्व भाव से समाज को देखा गया और मनुष्य चाहे जिस धर्म में, जाति में जन्मा हो, उसे यथोचित स्थान दिया गया। यहां पर वाल्मीकि, जो भंगी या जमादार जाति में जन्मे थे और लुटेरे के रूप में रहते थे, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और रामायण की रचना कर डाली तो वह महर्षि वाल्मीकि कहे गए और हर व्यक्ति के लिए वे पूजनीय हो गए। इसी तरह संत रविदास, तुकाराम साधारण परिवार में जन्मे और पिछड़ी जाति से सम्बन्ध रखते थे, लेकिन जब उन्होंने समाज को रास्ता दिखाना आरम्भ किया और उद्घोष किया कि "हमार मन चंगा तो कठौती में गंगा", तो हर वर्ग ने उनको मान्यता दी। इसी प्रकार विजली पासी पिछड़ी जाति में पैदा हुए थे और एक योद्धा थे। उन्होंने अवध के एक बड़े भू-भाग पर राज्य किया था। आजादी के बाद राजनेताओं ने अपने हिसाब से सेकुलरवाद की परिभाषा बनाई है।



पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में भारत में हिन्दू कोड बिल बनाया और तब के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हस्ताक्षर करने से दो बार मना कर दिया था। मना करने का कारण तो पता नहीं, लेकिन लगता है यह प्रावधान सारे देश के लिए होता तो सेकुलर की परिभाषा में आता। बटवारे के मामले में गांधी जी के और विधान के विषय में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के विचार भारतीय सोच को दर्शाते हैं।



हमारे देश में सेकुलरवाद का एक और अर्थ बताया गया है कि सरकार का कोई धर्म नहीं होगा। यह तो सम्भव है, लेकिन जब कोई नेता सरकार बनाएगा या चलाएगा तो उस समय उसका कोई धर्म नहीं होगा और जब घर आएगा तो धर्म होगा। सोचकर देखिए, यदि कोई व्यक्ति मूर्तिपूजा का घोर विरोधी है तो मूर्तिपूजा करने वालों के प्रति समभाव कैसे रख सकता है। सेकुलरवाद की एक ही परिभाषा सम्भव है - "सर्वधर्म सहिष्णु भाव", यानी सभी धर्मों को बर्दाश्त करना और यही कारण है कि भारत में अनेक धर्मावलम्बी आए और बसते गए। इस धरती से जुड़ा हुआ प्रत्येक भारतीय सेकुलर है, इसलिए सेकुलर-गैरसेकुलर की बहस अनावश्यक है।



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एक प्रांतीय सरकार ने एक बार कहा कि मुसलमानों को 4 प्रतिशत मजहबी आरक्षण दिया जाना चाहिए, जिसे न्यायालय ने अस्वीकार किया। उन्हें पता है कि न्यायालय में धर्म आधारित आरक्षण नामंजूर हो चुका है। इसी तरह करीब 75 साल पहले एक अलग मानसिकता वाले मुहम्मद अली जिन्ना ने आबादी के हिसाब से मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी, देश ने नहीं माना। बाद में भारत का मजहब के आधार पर विभाजन हो गया। देश ने बंटवारे को दिल से स्वीकार नहीं किया और बटवारे के बाद जब वीर सावरकर ने कहा था कि आबादी की अदला-बदली हो जाए, तो देश में समर्थन नहीं मिला था, क्योंकि यह बटवारा भारत की मानवतावादी मानसिकता के खिलाफ था।



1953 में फारूख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला साहब को जेल में डाल दिया गया था और यह काम स्वयं नेहरू जी की सरकार ने किया था। शेख साहब अपने को सेकुलरवादी कहते थे, परन्तु उनका सेकुलरवाद भारत को स्वीकार नहीं था। कश्मीरी पंडितों को 1989 में हिन्दू होने के कारण मुस्लिम बहुल कश्मीर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। ऐसा सेकुलरवाद भी भारतीय सोच के विपरीत है।



हमारे नेता सेकुलरवाद को महत्वपूर्ण कहते हैं, फिर भी इस मुद्दे पर एक मंच पर नहीं आते। यदि देश के समाजवादियों के जीवन में सेकुलरवाद मायने रखता है तो ये सभी एक मंच पर आकर सेकुलरवाद का झंडा बुलंद क्यों नहीं करते। ये सभी राजनेता और दूसरे सेकुलरवादी एक मंच पर आते तो हैं, मगर सत्ता के लिए - जैसे 1967 में संयुक्त विधायक दल के रूप में, 1977 में जनता पार्टी के रूप में और 1989 में जनता दल के रूप में - लेकिन सेकुलरवाद में इन सभी की आस्था नहीं है।



पश्चिमी देशों की परिभाषा के अनुसार सेकुलरवादी किसी धर्म में विश्वास नहीं करता। भारत में ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जो मंदिर या मस्जिद में न जाते हों और ईश्वर में विश्वास न करते हों। इसलिए सेकुलरवाद की नई परिभाषा गढ़ी गई - सर्वधर्म समभाव। लेकिन एक धर्म को मानने वाला दूसरे धर्म के साथ समभाव कैसे रख सकता है। समभाव तभी सम्भव है जब कोई आदमी या तो किसी धर्म में विश्वास न करता हो या फिर सभी धर्मों में विश्वास करता हो।



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सारे देश के लिए सेकुलरवाद या गैर सेकुलरवाद पर चर्चा करने से पहले देश के बहुसंख्य हिन्दू समाज को जातीय भेदभाव से ऊपर उठकर अपने में समरसता लानी होगी। अभी तो हालत यह है कि हिन्दू समाज के कुछ लोगों ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण मजबूरी में इस्लाम स्वीकार किया था। इसी तरह आज भी बहुत से कमजोर वर्ग के लोग कभी लालच में तो कभी विवशता के कारण इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं। मुगल काल में पिछड़ी जातियों के जो हिन्दू सवर्णों के बराबर बैठ नहीं सकते थे और समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं पाते थे, वे इस्लाम धर्म स्वीकार करके बराबर बैठने लगते थे, फिर भी हिन्दू समाज ने कोई कदम नहीं उठाए। अब शुद्धिकरण और घर वापसी के नाम से विघटित समाज को जोड़ने के प्रयास हो रहे हैं, वे कितने सफल होंगे यह समय बताएगा। यह कहना कि मजबूरी में दूसरा धर्म स्वीकार किया था, समझ में आ सकता है, लेकिन बाहरी मजबूरी नहीं, घर के अंदर की मजबूरी। अपमानित जीवन बिता रहे लोग कब तक अपमान सहते। बराबर बैठ नहीं सकते थे, एक साथ भोजन नहीं कर सकते थे, मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते थे, मंदिर के सामने से गाजे-बाजे के साथ नहीं निकल सकते थे, घोड़े पर सवारी नहीं कर सकते थे - सूची बहुत लंबी है। मुसलमान या ईसाई बनते ही समस्या हल हो जाती थी।



हम जानते हैं कि हिन्दू धर्म का कोई अकेला धर्मग्रंथ नहीं है और कोई एक धर्माधिकारी नहीं है जो पूरे धर्मावलम्बियों को आदेशित कर सके। वास्तव में सनातन मूल्यों पर आधारित जीवन शैली ही हिन्दू धर्म है। इस तथ्य को वर्षों पहले सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया था। सभी भारतीयों की जीवन शैली एक जैसी है और उन्हें शरिया जैसे कानूनों की आवश्यकता नहीं होती। इस समाज में एक ईश्वर को मानने वाले और अनेक ईश्वरों को मानने वाले, साकार ईश्वर को मानने वाले या निराकार ईश्वर को मानने वाले, मूर्ति पूजा में विश्वास करने वाले अथवा न करने वाले, मंदिर जाने वाले अथवा न जाने वाले, शाकाहारी अथवा मांसाहारीए सभी लोग अपनी इच्छा अनुसार जीवन शैली चुन सकते हैं और वह हिन्दू ही रहेंगे। यही कारण है कि इतिहास के हजारों वर्षों में दुनिया के सभी भागों से लोग यहाँ आए, पले-बसे, कभी हिन्दुओं के साथ उनका संघर्ष नहीं हुआ और हिन्दू धर्म संकट में नहीं पड़ा। इस्लाम एक अपवाद है क्योंकि इस्लाम का विस्तार तलवार के बल पर हुआ है और हिन्दू तथा बौद्ध धर्मों का दुनिया के अनेक भागों में शांति पूर्वक सिद्धांत के आधार पर अहिंसात्मक ढंग से हुआ है। यही कारण है कि हिन्दू और मुस्लिम लोगों के सह-अस्तित्व में कभी-कभी कठिनाइयाँ आती रहती हैं।



यदि भारत में सच्चे सेकुलरवादी की तलाश की जाए तो कबीर से बढ़कर दूसरा व्यक्ति नहीं मिलेगा। उनका जन्म एक विधवा हिन्दू ब्राह्मणी से हुआ था और लालन-पालन एक मुस्लिम जुलाहे के परिवार में हुआ था। कबीर न तो हिन्दू और न ही मुसलमान के पक्ष में बातें करते थे। बहुत ही सपाट बोलने वाले निष्पक्ष कवि और समाजसेवी थे। दोनों ही धर्मों की बुराइयों को खुलकर बोलते थे और उन्होंने कहा था- "हिन्दू तुरुक हटा नहीं माने, आग दुहूँ घर लागी"। लेकिन वह ऐसे राम को मानते थे जो घट-घट में बसा है। उनके जीवन संदेशों में आडंबर नहीं था और उन संदेशों में नर सेवा नारायण सेवा का भाव छुपा है। कबीर की सोच आज जितनी प्रासंगिक है उतनी पहले कभी नहीं रही। वैसे तो अनपढ़ थे कबीर और कहा भी "मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहीं हाथ", लेकिन सीधी-सपाट बे-लाग लपेट बात करते थे। समाज को आज उनकी विचारधारा की बहुत जरूरत है।



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हिन्दू-मुस्लिम आस्थाओं के सामंजस्य के लिए और नेहरू जी के सेकुलरवाद को बचाने के लिए गांधी और नेहरू के विचारों के साथ कबीर के संदेशों की जरूरत है। स्कूल की किताबों में उनके कहे गए दोहे छाप देते हैं और साखी, रमयनी और सबद पर रिसर्च करते हैं - बस हो गई कबीर सेवा। हमारे देश में सेकुलरवाद की नास्तिकता पर आधारित पश्चिमी परिभाषा कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें सर्वधर्म का त्याग होता है, लेकिन भारतीय सेकुलरवाद कबीर में है, जिसमें सर्वधर्म समभाव होता है। ऐसा नहीं कि कबीर हमारे देश को रातों-रात सेकुलर बना देंगे या फिर मजहबी आग बुझा देंगे, लेकिन यदि हमारे देश के बच्चे और विशेषकर विद्यार्थीगण कबीर को समझकर पढ़ेंगे तो उनके मन पर तर्कसंगत विचारों का समावेश होगा। मुसलमानों को उनके अनुकूल कुछ सुझाव लगेंगे जो मूर्ति पूजा के खिलाफ हैं। कबीर को जहाँ कहीं बात तर्कसंगत नहीं लगी, बेबाक कह दी। जब अवगुणों पर बात करनी हुई तो निष्पक्ष भाव से अपने बेटे तक को नहीं छोड़ा, बोले "बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल"। कबीर का हर शब्द सीधे दिल तक पहुँचता है। हर स्कूल और मदरसे में कबीर पढ़ाए जाने चाहिए।



दलित समाज में आज भी कबीर लोकप्रिय हैं। वे लोग कबीर पंथ को मानते हैं और कबीर के पदों को बड़े आनंद से गाते हैं। मैं नहीं कहता कि दलित समाज अधिक सेकुलर है, लेकिन उस समाज में सवर्णों का धर्माडंबर और इस्लाम की कट्टरता नहीं है। दलित समाज के लोग यदि भ्रमित न किए जाएँ तो एक-दूसरे से मिलते बुजुर्ग लोग "राम-राम" या "जय राम जी की" कहते आए हैं। कबीर भी राम की बातें करते थे, लेकिन घट-घट में जो राम रमा है उसकी बात करते थे। गांधी भी उसी निर्गुण निराकार राम के उपासक थे।



भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।



भारतीय संदर्भ में सेकुलर जीवन शैली बिताने के लिए नास्तिक विचारों के बजाय सर्वधर्म सहिष्णु भाव और ईश्वर अंश जीव अविनाशी में विश्वास रखते हुए मानवता या इंसानियत पर जोर देना होगा। हिन्दू-मुस्लिम सह-अस्तित्व की यह कठिनाई है कि मुसलमान हिन्दुओं को काफिर मानते हैं और कई बार विद्वानों ने मुस्लिम धर्मगुरुओं से निवेदन भी किया कि हिन्दुओं को काफिर न मानने का आदेश जारी करें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तब भला बताइए कि एक मुसलमान और एक काफिर क्या भाई-भाई हो सकते हैं — शायद नहीं। इसके बाद भी हिन्दुओं ने कभी भी यह नहीं कहा कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते, जबकि मुहम्मद अली जिन्ना ने पूरा जोर देकर यही कहा था और यही आधार था विभाजन का कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। पूर्ण विश्वास है कि विभाजित भारत में वह सोच नहीं रहेगी। यदि सह-अस्तित्व पर जोर देना है तो फिर हिन्दू राष्ट्र या इस्लामी राष्ट्र जैसी बातें ठीक नहीं हैं। लेकिन जरूरत इस बात की है कि सभी देशवासियों का एक ही कानून हो, अर्थात समान नागरिक संहिता जितनी जल्दी हो लागू होनी चाहिए। यह कदम संविधान सम्मत होगा और इस पर न्यायालय की सहमति निश्चित रूप से मिलेगी।



सनातन परम्पराओं में यही भाव रहा है और इसलिए इसमें दुनिया की सभी आस्थाओं का समावेश है और मनुष्य को स्वयं तर्कसंगत मार्ग खोजने की आजादी है। यही एक उपाय है विश्वबंधुत्व और सर्वे भवन्तु सुखिनः के मार्ग पर चलते हुए सुख-शांति प्राप्त करने का, फिर चाहे वह मुसल्लम ईमान की बात हो या फिर ईश्वर अंश जीव अविनाशी की मान्यता हो। इसलिए भारत में सेकुलर-गैर सेकुलर का विवाद न छेड़कर सनातन जीवन शैली को मान्यता मिलनी चाहिए।



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