उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी: सरकार सीटें बढ़ाकर निकालेगी भर्ती का रास्ता
देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों, एम्स और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरों और शिक्षण स्टाफ के हजारों पद वर्षों से खाली पड़े हैं। आरक्षित श्रेणियों में योग्य उम्मीदवारों की कमी के चलते भर्ती प्रक्रिया बार-बार अटक रही है। अब सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कुल स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है, ताकि संस्थानों में न्यूनतम आवश्यक स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके और शिक्षण व्यवस्था प्रभावित न हो।
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गंभीर स्टाफ संकट से गुजर रही है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों (एम्स) और अन्य प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरों और शिक्षण पदों का बड़ा हिस्सा वर्षों से खाली पड़ा है। इन रिक्तियों का सीधा असर न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ रहा है, बल्कि शोध, अकादमिक प्रशासन और छात्रों के मार्गदर्शन जैसी बुनियादी जिम्मेदारियां भी प्रभावित हो रही हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के करीब 5,400 पद खाली हैं। वहीं एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी लगभग 40 फीसदी प्रोफेसर पदों पर नियुक्ति नहीं हो पाई है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यह सामने आता है कि अधिकांश रिक्त पद आरक्षित श्रेणियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े हैं। यह भी पढ़ें: ‘जो परेशानी मेरे साथ हुई वो किसी और माँ को न उठानी पड़े इसलिए ऑटिज़्म बच्चों के लिए शुरू किया स्कूल’
आरक्षण और भर्ती के बीच फंसी व्यवस्था
भर्ती प्रक्रिया के जानकारों का कहना है कि आरक्षित श्रेणियों में पर्याप्त संख्या में योग्य और पात्र उम्मीदवारों का न मिलना इस समस्या की सबसे बड़ी वजह है। कई बार संस्थानों को एक ही पद के लिए बार-बार विज्ञापन निकालने पड़ते हैं, लेकिन फिर भी चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। नतीजतन पद वर्षों तक खाली रहते हैं और शैक्षणिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ता जाता है। स्थिति यह है कि कुछ विभागों में स्वीकृत पदों की तुलना में आधे से भी कम शिक्षक कार्यरत हैं। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्यभार पड़ता है, अस्थायी या अतिथि शिक्षकों पर निर्भरता बढ़ती है और छात्रों को नियमित मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
सरकार का नया फॉर्मूला: कुल पद बढ़ाने की तैयारी
इस संकट से निपटने के लिए अब सरकार एक नए विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही है। प्रस्ताव यह है कि संस्थानों में स्वीकृत कुल पदों की संख्या बढ़ाई जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि यदि आरक्षित श्रेणियों में किसी पद पर उम्मीदवार नहीं मिलते, तब भी सामान्य श्रेणी सहित अन्य श्रेणियों में भर्ती करके न्यूनतम आवश्यक संख्या में शिक्षक उपलब्ध कराए जा सकें। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस कदम से आरक्षण व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा, बल्कि कुल सीटें बढ़ने से सभी श्रेणियों में अवसरों की संख्या भी बढ़ेगी। इससे संस्थानों का अकादमिक कामकाज सुचारु रूप से चल सकेगा और लंबे समय से चली आ रही स्टाफ की कमी दूर करने में मदद मिलेगी।
एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति
देश में 23 एम्स स्वीकृत हैं, जिनमें से 19 पूरी तरह संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों में कुल 6,376 प्रोफेसर पद स्वीकृत हैं, लेकिन अभी केवल लगभग 2,500 पदों पर ही नियुक्ति हो पाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से 90 से 95 फीसदी रिक्तियां आरक्षित श्रेणियों से संबंधित हैं।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी तस्वीर अलग नहीं है। कई विश्वविद्यालयों में विभाग प्रमुखों के पद खाली हैं, जिससे अकादमिक निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। शोध परियोजनाएं, पीएचडी गाइडेंस और नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत जैसी गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं।
भर्ती प्रक्रिया को तेज करने की कोशिशें
सरकार और नियामक संस्थाएं इस समस्या के समाधान के लिए कुछ कदम पहले ही उठा चुकी हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने ‘नेशनल रिक्रूटमेंट पोर्टल’ शुरू किया है, जिसके जरिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भर्ती की प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया गया है। इसके अलावा, संस्थानों को निर्देश दिए गए हैं कि वे खाली पदों को भरने के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाएं। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि अस्थायी और वैकल्पिक व्यवस्थाओं के जरिए शिक्षण कार्य बाधित न हो, इसके लिए तेज़ी से निर्णय लिए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
इस बीच सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में सख्त रुख अपना चुका है। अदालत ने हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को चार महीने के भीतर भरने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस रिपोर्ट के आधार पर की थी, जिसमें कई संस्थानों में 70 प्रतिशत से अधिक पद खाली होने की बात सामने आई थी।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थानों में नेतृत्व से जुड़े पद जैसे कुलपति और रजिस्ट्रार लंबे समय तक खाली रहना शैक्षणिक ढांचे के लिए घातक है।