मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हजारों ग्रामीणों को जागरूक करने वाले राजस्थान के एक प्रिंसिपल से मिलिए
Amarpal Singh Verma | Apr 07, 2023, 10:17 IST
महावीर गोस्वामी राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल हैं. उनका काम सिर्फ बच्चों को पढ़ाना और शिक्षा की अलख जगाना नहीं है. उन्होंने राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा और पंजाब के ग्रामीणों के बीच मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने वाले अभियान की बागडोर भी संभाली हुई है।
हनुमानगढ़, राजस्थान। बाल नवजीवन सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रधानाचार्य महावीर गोस्वामी जब स्कूल में नहीं होते हैं, तो उन्हें राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के गाँवों की गलियों और बस्तियों में घूमते देखा जा सकता है। पिछले 12 सालों से गोस्वामी ने गाँव के लोगों को उनकी मानसिक सेहत के बारे में जागरूक करने और नशीली दवाओं से बचे रहने के लिए चलाए जा रहे एक अभियान की बागडोर संभाली हुई है।
स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करना, ग्रामीणों की काउंसलर और मनोवैज्ञानिकों तक पहुंच बनाने में मदद करना उनके काम का हिस्सा नहीं है, लेकिन 48 साल के शिक्षक निस्वार्थ भाव से यह सब करते आए हैं। मानसिक बीमारी की बढ़ती समस्या से लड़ने में लोगों की मदद करना उन्हें अच्छा लगता है। आज जहां वह खड़े हैं, वहां तक पहुंचने का उनका यह सफर आसान तो बिल्कुल नहीं था।
न्होंने गाँवों में अभियान चलाया और लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर किसी को कोई समस्या है तो वे किस तरह से उसे बता सकते हैं।
गोस्वामी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "यह अभियान एक चुनौती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में बहुत से लोग दिमाग से जुड़ी बीमारियों और उनके इलाज से अनजान हैं। उन्हें नहीं पता कि ऐसी भी कोई बीमारियां होती हैं और उनका इलाज भी किया जा सकता है।" उन्होंने आगे कहा, " मानसिक बीमारी से जूझ रहे अपने ही परिवार के सदस्यों को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता है या फिर उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. जब ऐसे परिजनों के पास हम बात करने के लिए जाते हैं, तो वो हमारी सुनते तक नहीं हैं. वो सीधे-सीधे हमें अपना दुश्मन मान बैठते हैं।"
गोस्वामी के प्रयासों को मनोचिकित्सक डॉ धनेश कुमार गुप्ता का साथ मिला हुआ है। गाँव से लगभग 6,500 किलोमीटर दूर सिंगापुर में रह रहे डॉ गुप्ता सरकार की ओर से चलाए जा रहे इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के एक वरिष्ठ सलाहकार हैं और मूल रूप से संगरिया गाँव के रहने वाले हैं। अपने गाँव और आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य संबंधी मसलों को हल करने में उनकी खास दिलचस्पी रही है।
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ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच करने और इलाज में उनकी मदद करने के लिए प्रिंसिपल और मनोचिकित्सक दोनों ने मिलकर जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए हैं।
हनुमानगढ़ में शुरू हुआ मानसिक स्वास्थ्य अभियान अब राजस्थान के चूरू, श्री गंगानगर और बीकानेर जैसे अन्य जिलों तक पहुंच गया है। यह हरियाणा के सिरसा और पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब और फरीदकोट जिलों में भी बदलाव लेकर आ रहा है।
गोस्वामी पांच साल पहले बाल नवजीवन सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल बने थे। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ वह कुछ समाज सेवा भी करना चाहते थे। इसलिए वह संगरिया में एक सामाजिक संस्था ‘समाज सुधार मंच’ के साथ जुड़ गए। इसी सामाजिक संगठन के जरिए उनकी मुलाकात डॉ. गुप्ता के साथ हुई थी।
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अगस्त 2010 में इस सामाजिक संगठन ने गाँव में एक नशामुक्ति शिविर का आयोजन किया था। कई जाने-माने मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों ने इस शिविर में भाग लिया था। सिंगापुर से आए मनोचिकित्सक डॉ. गुप्ता भी इनमें शामिल थे। गुप्ता उस समय मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों की मदद करने के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच करने और इलाज में उनकी मदद करने के लिए प्रिंसिपल और मनोचिकित्सक दोनों ने मिलकर जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए हैं।
संगरिया के ग्रामीण इलाकों में मानसिक रूप से बीमार लोगों का जिस तरह से इलाज किया जा रहा था, डॉ गुप्ता उसे लेकर खासे चिंतित थे। उन्होंने देखा था कि कैसे उन्हें कभी-कभी बस जंजीरों में जकड़ कर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था। उसी दौरान उन्हें हफरी एलुमनाई अवार्ड के तहत 20 लाख रुपये की फेलोशिप मिली। तब गुप्ता ने संगरिया में एक मानसिक स्वास्थ्य अभियान चलाने का फैसला किया।
जब वह अभियान की योजना शुरू करने के लिए संगरिया गए, तो उनकी मुलाकात गोस्वामी से हुई। उन्होंने गोस्वामी से अपने अभियान के साथ जुड़ने के लिए कहा और वह तुरंत सहमत हो गए।
डॉ. गुप्ता ने जनवरी 2011 में ‘निष्काम फाउंडेशन’ के तले अपना अभियान शुरू किया था। यह गुड़गाँव, हरियाणा में स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो मानसिक स्वास्थ्य और नशीली दवाओं के बारे में लोगों को जागरूक करने का काम करता है।
जिन लोगों को मानसिक बीमारियों के चलते इलाज की दरकार होती है, उनके लिए डॉ. गुप्ता सिंगापुर से हर महीने दो दिवसीय मानसिक स्वास्थ्य शिविर के लिए संगरिया आते हैं. प्रिंसीपल गोस्वामी ही इस दो दिवसीय शिविर को सफल बनाने की सारी व्यवस्था संभाल हुए हैं।
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दरअसल गोस्वामी 2011 से ही अभियान से जुड़े हुए हैं और इससे जुड़ी सभी जरूरतों का ध्यान रखते हैं। वह मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक टीम के साथ राज्य के दूरदराज के गांवों का दौरा भी करते रहे हैं। उन्होंने गाँवों में अभियान चलाया और लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर किसी को कोई समस्या है तो वे किस तरह से उसे बता सकते हैं।
यह शिक्षक का अथक प्रयास था जिसने पहले जागरूकता अभियान को ही एक बड़ी सफलता बना दिया। उनके इस अभियान में कई लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आए, जो किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारियों से जूझ रहे थे।
‘निष्काम फाउंडेशन’ द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियानों में से एक अभियान उन सभी लोगों को आजाद कराना भी है, जिन्हें उनकी मानसिक समस्याओं के चलते जानवरों की तरह जंजीरों में बांध कर रखा जाता है। उनके इस अभियान का नाम मुक्ति अभियान है और इसे फरवरी 2014 में शुरू किया गया था।
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गोस्वामी ने कई इलाकों का दौरा किया और उन घरों की पहचान की जहां यह सब हो रहा था। उसके बाद उन्होंने ऐसे मरीजों के बारे में पर्याप्त जानकारी जुटाई और सुनिश्चित किया कि मरीज का सही इलाज किया जा सके। अब तक दिमागी बीमारियों के चलते जंजीरों में कैद ऐसे 120 लोगों को छुड़ाया जा चुका है।
गोस्वामी ने बताया कि उनमें से कई ने अपने पीड़ित परिवार के सदस्यों को ठीक करने के लिए टोने-टोटके का सहारा लिया था। वह कहते हैं, “चूरू जिले के एक गाँव में एक व्यक्ति को 15 साल तक जंजीरों से बांधकर रखा गया। उनकी मां का मानना था कि जादू-टोना ही इसका एकमात्र इलाज है, जबकि उसका भाई अन्य रास्ते तलाशने के लिए तैयार था। इसी तरह, हमें एक लड़की के परिवार के सदस्यों से बात करने तक के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। उसे भी जंजीरों में बांध कर रखा गया था। ”
उन्होंने कहा, "निष्काम फाउंडेशन ने अब तक 163 मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता शिविर आयोजित किए हैं। मानसिक बीमारियों से जूझ रहे 7,500 से अधिक लोगों ने इन शिविरों में भाग लिया। उन्हें सभी को काउंसलिंग दी गई और उनका उपचार किया गया।”
मनोचिकित्सक डॉ गुप्ता निष्काम फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, “गोस्वामी पिछले 12 सालों से इस अभियान पर निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं। वह एक समर्पित, मेहनती और टीम के एक निष्ठावान सदस्य का एक बेहतरीन उदाहरण है।"
उनके मुताबिक, अभियान से जुड़ी टीम में लगभग 200 सदस्य हैं। डॉ. गुप्ता ने कहा, “टीम का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। जब घर तैयार करते हैं तो उसमें लगने वाली एक-एक ईंट अमूल्य होती है। गोस्वामी वह स्तंभ हैं जिन्होंने पूरी इमारत को थामे हुआ है।”
गोस्वामी 200 लोगों की मजबूत टीम के साथ कोऑर्डिनेट करने का भी काम करते हैं। वह इस कवायद में शामिल 25 डॉक्टरों से लगातार संपर्क में हैं। वह तीन राज्यों में सात जिलों के बीच बेहतर तरीके से संपर्क बनाए रखते हैं. वह कार्यक्रम के 100 से अधिक दानदाताओं और समर्थकों के साथ लगातार संपर्क में है। डॉ गुप्ता ने कहा, "यह एक बड़ी जिम्मेदारी है जिसे गोस्वामी निभा रहे हैं।"
गोस्वामी ने 22 साल पहले एक स्थानीय स्कूल में अपना टीचिंग का करियर शुरू किया था। उन्होंने पहले अंग्रेजी में मास्टर्स पूरा किया और उसके बाद बीएड की डिग्री ली।
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स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करना, ग्रामीणों की काउंसलर और मनोवैज्ञानिकों तक पहुंच बनाने में मदद करना उनके काम का हिस्सा नहीं है, लेकिन 48 साल के शिक्षक निस्वार्थ भाव से यह सब करते आए हैं। मानसिक बीमारी की बढ़ती समस्या से लड़ने में लोगों की मदद करना उन्हें अच्छा लगता है। आज जहां वह खड़े हैं, वहां तक पहुंचने का उनका यह सफर आसान तो बिल्कुल नहीं था।
गोस्वामी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "यह अभियान एक चुनौती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में बहुत से लोग दिमाग से जुड़ी बीमारियों और उनके इलाज से अनजान हैं। उन्हें नहीं पता कि ऐसी भी कोई बीमारियां होती हैं और उनका इलाज भी किया जा सकता है।" उन्होंने आगे कहा, " मानसिक बीमारी से जूझ रहे अपने ही परिवार के सदस्यों को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता है या फिर उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. जब ऐसे परिजनों के पास हम बात करने के लिए जाते हैं, तो वो हमारी सुनते तक नहीं हैं. वो सीधे-सीधे हमें अपना दुश्मन मान बैठते हैं।"
गोस्वामी के प्रयासों को मनोचिकित्सक डॉ धनेश कुमार गुप्ता का साथ मिला हुआ है। गाँव से लगभग 6,500 किलोमीटर दूर सिंगापुर में रह रहे डॉ गुप्ता सरकार की ओर से चलाए जा रहे इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के एक वरिष्ठ सलाहकार हैं और मूल रूप से संगरिया गाँव के रहने वाले हैं। अपने गाँव और आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य संबंधी मसलों को हल करने में उनकी खास दिलचस्पी रही है।
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ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच करने और इलाज में उनकी मदद करने के लिए प्रिंसिपल और मनोचिकित्सक दोनों ने मिलकर जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए हैं।
हनुमानगढ़ में शुरू हुआ मानसिक स्वास्थ्य अभियान अब राजस्थान के चूरू, श्री गंगानगर और बीकानेर जैसे अन्य जिलों तक पहुंच गया है। यह हरियाणा के सिरसा और पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब और फरीदकोट जिलों में भी बदलाव लेकर आ रहा है।
एक साथ मिलकर काम करना
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अगस्त 2010 में इस सामाजिक संगठन ने गाँव में एक नशामुक्ति शिविर का आयोजन किया था। कई जाने-माने मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों ने इस शिविर में भाग लिया था। सिंगापुर से आए मनोचिकित्सक डॉ. गुप्ता भी इनमें शामिल थे। गुप्ता उस समय मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों की मदद करने के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।
संगरिया के ग्रामीण इलाकों में मानसिक रूप से बीमार लोगों का जिस तरह से इलाज किया जा रहा था, डॉ गुप्ता उसे लेकर खासे चिंतित थे। उन्होंने देखा था कि कैसे उन्हें कभी-कभी बस जंजीरों में जकड़ कर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था। उसी दौरान उन्हें हफरी एलुमनाई अवार्ड के तहत 20 लाख रुपये की फेलोशिप मिली। तब गुप्ता ने संगरिया में एक मानसिक स्वास्थ्य अभियान चलाने का फैसला किया।
जब वह अभियान की योजना शुरू करने के लिए संगरिया गए, तो उनकी मुलाकात गोस्वामी से हुई। उन्होंने गोस्वामी से अपने अभियान के साथ जुड़ने के लिए कहा और वह तुरंत सहमत हो गए।
मानसिक स्वास्थ्य के लेकर जागरूकता फैलाना
जिन लोगों को मानसिक बीमारियों के चलते इलाज की दरकार होती है, उनके लिए डॉ. गुप्ता सिंगापुर से हर महीने दो दिवसीय मानसिक स्वास्थ्य शिविर के लिए संगरिया आते हैं. प्रिंसीपल गोस्वामी ही इस दो दिवसीय शिविर को सफल बनाने की सारी व्यवस्था संभाल हुए हैं।
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दरअसल गोस्वामी 2011 से ही अभियान से जुड़े हुए हैं और इससे जुड़ी सभी जरूरतों का ध्यान रखते हैं। वह मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक टीम के साथ राज्य के दूरदराज के गांवों का दौरा भी करते रहे हैं। उन्होंने गाँवों में अभियान चलाया और लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर किसी को कोई समस्या है तो वे किस तरह से उसे बता सकते हैं।
यह शिक्षक का अथक प्रयास था जिसने पहले जागरूकता अभियान को ही एक बड़ी सफलता बना दिया। उनके इस अभियान में कई लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आए, जो किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारियों से जूझ रहे थे।
‘निष्काम फाउंडेशन’ द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियानों में से एक अभियान उन सभी लोगों को आजाद कराना भी है, जिन्हें उनकी मानसिक समस्याओं के चलते जानवरों की तरह जंजीरों में बांध कर रखा जाता है। उनके इस अभियान का नाम मुक्ति अभियान है और इसे फरवरी 2014 में शुरू किया गया था।
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गोस्वामी ने कई इलाकों का दौरा किया और उन घरों की पहचान की जहां यह सब हो रहा था। उसके बाद उन्होंने ऐसे मरीजों के बारे में पर्याप्त जानकारी जुटाई और सुनिश्चित किया कि मरीज का सही इलाज किया जा सके। अब तक दिमागी बीमारियों के चलते जंजीरों में कैद ऐसे 120 लोगों को छुड़ाया जा चुका है।
गोस्वामी ने बताया कि उनमें से कई ने अपने पीड़ित परिवार के सदस्यों को ठीक करने के लिए टोने-टोटके का सहारा लिया था। वह कहते हैं, “चूरू जिले के एक गाँव में एक व्यक्ति को 15 साल तक जंजीरों से बांधकर रखा गया। उनकी मां का मानना था कि जादू-टोना ही इसका एकमात्र इलाज है, जबकि उसका भाई अन्य रास्ते तलाशने के लिए तैयार था। इसी तरह, हमें एक लड़की के परिवार के सदस्यों से बात करने तक के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। उसे भी जंजीरों में बांध कर रखा गया था। ”
मानसिक स्वास्थ्य शिविर
मनोचिकित्सक डॉ गुप्ता निष्काम फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, “गोस्वामी पिछले 12 सालों से इस अभियान पर निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं। वह एक समर्पित, मेहनती और टीम के एक निष्ठावान सदस्य का एक बेहतरीन उदाहरण है।"
उनके मुताबिक, अभियान से जुड़ी टीम में लगभग 200 सदस्य हैं। डॉ. गुप्ता ने कहा, “टीम का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। जब घर तैयार करते हैं तो उसमें लगने वाली एक-एक ईंट अमूल्य होती है। गोस्वामी वह स्तंभ हैं जिन्होंने पूरी इमारत को थामे हुआ है।”
गोस्वामी 200 लोगों की मजबूत टीम के साथ कोऑर्डिनेट करने का भी काम करते हैं। वह इस कवायद में शामिल 25 डॉक्टरों से लगातार संपर्क में हैं। वह तीन राज्यों में सात जिलों के बीच बेहतर तरीके से संपर्क बनाए रखते हैं. वह कार्यक्रम के 100 से अधिक दानदाताओं और समर्थकों के साथ लगातार संपर्क में है। डॉ गुप्ता ने कहा, "यह एक बड़ी जिम्मेदारी है जिसे गोस्वामी निभा रहे हैं।"
गोस्वामी ने 22 साल पहले एक स्थानीय स्कूल में अपना टीचिंग का करियर शुरू किया था। उन्होंने पहले अंग्रेजी में मास्टर्स पूरा किया और उसके बाद बीएड की डिग्री ली।
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