भारत में अवसाद के कारण बढ़ रही आत्महत्याएं 

भारत में अवसाद के कारण बढ़ रही आत्महत्याएं अवसाद के कारण बढ़ रही आत्महत्याएं

लखनऊ। मानसिक रोग इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि वह दिन दूर नहीं, जब विश्व में अवसाद के सबसे ज्यादा मरीज होंगें। अवसाद के कारण लोग तेज़ी से आत्महत्या भी कर रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान संस्थान (एनसीआरबी) के आंकड़ों से पता चलता है कि एक साल में भारत में पैरालिसिस और मानसिक रोगों से प्रभावित 8409 लोगों ने आत्महत्या की। सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र में (1412) में हुईं। देश में वर्ष 2001 से 2015 के बीच के 15 वर्षों में कुल 126166 लोगों ने मानसिक रोगों से पीड़ित होकर आत्महत्या की है।

पश्चिम बंगाल में 13932, मध्य प्रदेश में 7029, उत्तर प्रदेश में 2210, तमिलनाडु में 8437, महाराष्ट्र में 19601, कर्नाटक में 9554 आत्महत्याएं मानसिक तनाव को कारण हुई हैं। भारत में 16.92 करोड़ लोग मानसिक, स्नायु विकारों और गंभीर नशे की गिरफ्त में हैं, जबकि जनगणना-2011 के मुताबिक मानसिक रोगों से केवल 22 लाख लोग प्रभावित हैं। 99 प्रतिशत मानसिक रोगी उपचार जरूरी नहीं मानते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2020 तक अवसाद विश्व में दूसरा सबसे बड़ा रोग होगा।

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मानसिक रोगियों की इतनी बढ़ी हुई संख्या का उपचार विकासशील ही नहीं, विकसित देशों की क्षमताओं से भी परे होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों और मानसिक रोगों की रोकथाम व इलाज के लिए उपलब्ध संसाधनों के बीच एक बड़ी खाई है। ऐसे में मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या भारत ही नहीं, विश्व भर में चिंता का बड़ा विषय है।

वर्ष 2015 में 7.88 लाख लोगों ने आत्महत्या की और इससे कई गुना ज्यादा ने आत्महत्या का प्रयास किया। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों की मानें तो देश में कुल 6-7 फीसदी लोगों को किसी ना किसी तरह की दिमागी समस्या है, जबकि 1-2 फीसदी रोगियों को गंभीर समस्या है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 5 करोड़ से ज्यादा लोग डिप्रेशन यानी अवसाद के शिकार हैं। इसके अलावा 3 करोड़ से ज्यादा लोग एंग्जाइटी डिसऑर्डर से ग्रस्त हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया भर में मानसिक, न्यूरोलॉजिकल व नशे की लत से जितने लोग पीिड़त हैं, उसमें से करीब 15 फीसद मरीज़ भारत में हैं। राष्ट्रीय मेंटल हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि देश में 18 से अधिक उम्र वाले 5.25 फीसद लोग अवसाद से पीिड़त हैं यानी हर 20 में से एक व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त है। बच्चों में भी मानसिक तनाव बड़ी समस्या बन रही है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या राष्ट्रमंडल देशों के प्रति एक लाख की आबादी पर 5.6 मनोचिकित्सक से 18 गुना कम है। इस आंकड़े के हिसाब से भारत में 66,200 मनोचिकित्सकों की कमी है। इसी तरह वैश्विक औसत के आधार पर 100,000 लोगों पर मनोरोगियों की देखभाल के लिए 21.7 नर्सों की जरूरत के हिसाब से भारत को 2,69,750 नर्सों की जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2020 तक यह बीमारी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार विश्व में डिप्रेशन के मरीजों की संख्या 322 मिलियन है,जिसमें लगभग आधे मरीज भारत और चीन के हैं। विश्व की कुल जनसंख्या के 4.5 प्रतिशत लोग डिप्रेरशन के शिकार हैं। आंकड़ों में यह बात भी सामने आयी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ज्यादा है जो डिप्रेशन की शिकार होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों में डिप्रेशन के मरीजों में 18.4 प्रतिशत मरीजों की वृद्वि हुई है।

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