मोटापा सिर्फ वजन नहीं, संक्रमण का तीन गुना बढ़ा रहा ख़तरा
हम में से अधिकतर लोग मोटापे को बस एक दिखने की समस्या या ज्यादा से ज्यादा शुगर और ब्लड प्रेशर से जोड़कर देखते हैं। लेकिन फिनलैंड और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने मिलकर जो शोध किया है, वह हमें एक नई और चिंताजनक सच्चाई से रूबरू कराता है। मोटापा आपको संक्रमण के प्रति कहीं ज्यादा कमजोर बना देता है, चाहे वह संक्रमण किसी भी प्रकार का हो।
शोध की बुनियाद: पांच लाख से ज्यादा लोग, दशकों का डेटा
यह अध्ययन कोई छोटा सर्वे नहीं था। इसमें फिनलैंड के दो बड़े अध्ययनों से करीब 67,766 लोग और ब्रिटेन के UK Biobank से 4,79,498 लोग शामिल थे। यानी कुल मिलाकर पांच लाख से ज्यादा वयस्कों का डेटा लिया गया। इन सभी लोगों को कई वर्षों तक देखा गया और यह समझने की कोशिश की गई कि किसे कब और कौन सा संक्रमण हुआ, कितने लोग अस्पताल में भर्ती हुए और कितनों की मृत्यु हुई।
शोधकर्ताओं ने 925 अलग अलग तरह के संक्रामक रोगों का अध्ययन किया। इसमें बैक्टीरियल, वायरल, फंगल और परजीवी जनित संक्रमण शामिल थे। यह अब तक का सबसे व्यापक अध्ययन है जो मोटापे और संक्रमण के रिश्ते को एक साथ देखता है।
नतीजे जो चौंकाते हैं
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि जिन लोगों का BMI 40 या उससे अधिक था, जिसे Class III Obesity कहा जाता है, उनमें संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा सामान्य वजन वाले लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक था। मृत्यु का खतरा भी लगभग उतना ही अधिक पाया गया। UK Biobank के डेटा के अनुसार यह जोखिम 3.54 गुना तक था।
यह सिर्फ कोविड की बात नहीं है। कोविड महामारी ने दुनिया को दिखा दिया था कि मोटे लोगों को SARS CoV 2 से ज्यादा खतरा है, लेकिन इस नए शोध ने साबित किया है कि यह जोखिम हर तरह के संक्रमण में बढ़ जाता है। चाहे वह फेफड़ों का बैक्टीरियल संक्रमण हो, त्वचा का फंगल इन्फेक्शन हो या पेट का वायरल रोग।
शरीर के अंदर क्या होता है, समझें आसान भाषा में
यह समझना जरूरी है कि मोटापा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कैसे कमजोर करता है। इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली एक सेना है। मोटापे की स्थिति में यह सेना हर समय एक हल्की लेकिन लगातार चलने वाली अंदरूनी सूजन से जूझती रहती है। इसे क्रॉनिक लो ग्रेड इन्फ्लेमेशन कहा जाता है।
जब कोई असली दुश्मन यानी बैक्टीरिया या वायरस शरीर में प्रवेश करता है, तो यह पहले से थकी हुई सेना पूरी ताकत से लड़ नहीं पाती।
इसके अलावा मोटापे में टी सेल्स और एन के सेल्स ठीक से काम नहीं कर पातीं। ये वही कोशिकाएं हैं जो वायरस को खत्म करती हैं। न्यूट्रोफिल्स जो बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करते हैं, उनकी कार्यक्षमता भी कम हो जाती है। शरीर में जमा अतिरिक्त वसा एक ऐसा वातावरण बना देती है जहां रोगाणुओं को पनपने का बेहतर मौका मिलता है।
इंसुलिन प्रतिरोध और उच्च रक्त शर्करा भी संक्रमण के खतरे को बढ़ाते हैं क्योंकि कई रोगाणु ज्यादा शर्करा वाले वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं।
वैश्विक असर: दुनिया पर कितना बोझ
शोधकर्ताओं ने इन नतीजों को वैश्विक आंकड़ों पर भी लागू किया। उन्होंने Global Burden of Disease अध्ययन के डेटा का विश्लेषण किया और यह अनुमान लगाया कि दुनिया भर में संक्रमण से होने वाली कितनी मौतें मोटापे से जुड़ी हैं।
नतीजे चिंताजनक हैं। कोविड महामारी से पहले 2018 में संक्रमण से होने वाली मौतों में से 8.6 प्रतिशत मौतों में मोटापा एक कारण था। महामारी के दौरान 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया। यानी हर छह से सात संक्रमण संबंधी मौतों में से एक मौत में मोटापे की भूमिका थी।
2023 में महामारी के बाद भी यह आंकड़ा 10.8 प्रतिशत रहा। सीधे शब्दों में कहें तो दुनिया में हर दस संक्रमण संबंधी मौतों में से एक मौत के पीछे मोटापा एक महत्वपूर्ण कारण है।
HIV और टीबी के मामले अलग क्यों
एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि HIV और तपेदिक यानी टीबी के मामलों में मोटापे का बढ़ा हुआ जोखिम उतना स्पष्ट नहीं दिखा। इसका कारण यह हो सकता है कि इन बीमारियों में अक्सर कुपोषण और कम वजन भी एक बड़ा कारक होता है। इसलिए इन मामलों में मोटापा और संक्रमण का संबंध अलग और जटिल हो सकता है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह शोध
भारत में मोटापे की दर तेजी से बढ़ रही है, खासकर शहरों में। दूसरी ओर भारत अभी भी संक्रामक रोगों का बड़ा बोझ उठाता है जैसे डेंगू, मलेरिया, टाइफॉइड और निमोनिया। जब मोटापा और संक्रमण का खतरा एक साथ मौजूद हो, तो परिणाम ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। इस शोध का संदेश साफ है। मोटापे को नियंत्रित करना सिर्फ शुगर और दिल की बीमारी से बचने के लिए नहीं, बल्कि संक्रमण से सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मोटापे की बढ़ती वैश्विक दर को देखते हुए आने वाले वर्षों में संक्रमण संबंधी मौतों में इसका योगदान और बढ़ सकता है। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और समय पर डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है। मोटापे को हल्के में लेना अब सुरक्षित विकल्प नहीं रहा। यह सिर्फ शरीर का वजन नहीं, बल्कि हमारी प्रतिरक्षा और जीवन दोनों से जुड़ा सवाल है।