WHO की नई HIV गाइडलाइन: भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
WHO की 2025 की नई HIV clinical management गाइडलाइन इलाज को सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे मरीजों की ज़िंदगी, सामाजिक हालात और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जोड़कर देखती है। भारत जैसे देश में, जहाँ HIV के साथ गरीबी, पलायन, टीबी और कलंक भी जुड़े हैं, ये नई सिफारिशें इलाज को ज्यादा सरल, सुरक्षित और इंसान-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़ा संकेत देती हैं।
भारत में HIV आज सिर्फ एक मेडिकल स्थिति नहीं है, बल्कि यह समाज, गरीबी, लैंगिक असमानता और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 24 लाख लोग HIV के साथ जी रहे हैं। बीते एक दशक में इलाज की पहुँच बढ़ी है, नई दवाएँ आई हैं और मौतों में कमी भी दर्ज हुई है, लेकिन इसके बावजूद लाखों लोगों की ज़िंदगी अब भी रोज़मर्रा की चुनौतियों से भरी हुई है।
दवा समय पर न मिलना, काम के दबाव में गोली भूल जाना, परिवार और समाज से बीमारी छिपाना और टीबी जैसी दूसरी बीमारियों से जूझना, ये सब HIV के इलाज का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे समय में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2025 की नई HIV clinical मैनेजमेंट गाइडलाइंस सिर्फ दवाओं की सूची नहीं, बल्कि यह बताने की कोशिश हैं कि इलाज को लोगों की ज़िंदगी के ज्यादा करीब कैसे लाया जाए
WHO का कहना है कि दुनिया भर में लगभग 4 करोड़ लोग HIV के साथ जी रहे हैं और इनमें से 3 करोड़ से ज़्यादा लोग इलाज पर हैं। इलाज की यह पहुँच एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन चुनौती अब इलाज को लंबे समय तक जारी रखने, साइड इफेक्ट कम करने और उन लोगों तक पहुँचने की है जो अब भी सिस्टम से बाहर हैं। भारत जैसे देश में यह चुनौती और गहरी हो जाती है, क्योंकि यहाँ HIV के साथ अक्सर गरीबी, पलायन, असंगठित मज़दूरी और सामाजिक कलंक भी जुड़ा होता है।
नई गाइडलाइन का एक बड़ा फोकस HIV इलाज की दवाओं को बेहतर और सुरक्षित बनाना है। भारत में ज़्यादातर मरीज आज Dolutegravir (DTG) आधारित इलाज पर हैं, जिसे WHO अब भी सबसे प्रभावी विकल्प मानता है। लेकिन हर मरीज की स्थिति एक जैसी नहीं होती। कई बार दवा समय पर न लेने, पुरानी दवाओं के असर या शरीर में बनी प्रतिरोधक क्षमता की वजह से इलाज विफल हो जाता है। ऐसे मामलों में पहले विकल्प सीमित थे और कई दवाओं के साइड इफेक्ट भी ज़्यादा थे। WHO ने अब साफ तौर पर कहा है कि अगर DTG आधारित इलाज काम नहीं करता, तो Darunavir/ritonavir (DRV/r) सबसे बेहतर विकल्प होना चाहिए। यह दवा वायरस को ज्यादा मजबूती से दबाती है, लंबे समय तक असरदार रहती है और इसके साइड इफेक्ट अपेक्षाकृत कम हैं।
भारत के संदर्भ में यह बदलाव इसलिए अहम है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में दवाओं की कीमत और उपलब्धता बहुत मायने रखती है। Darunavir के जनरिक संस्करण अब कम कीमत पर उपलब्ध हो रहे हैं, जिससे इसे राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम में शामिल करना आसान हो सकता है। इसका मतलब यह है कि उन मरीजों को भी बेहतर इलाज मिल सकता है, जिनके लिए पहले विकल्प सीमित थे। यह बदलाव सीधे तौर पर उन लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करता है, जो सालों से HIV के साथ जी रहे हैं और बार-बार दवाएँ बदलने की थकान झेल चुके हैं।
WHO की नई गाइडलाइन का दूसरा अहम पहलू इलाज को मरीज-केंद्रित बनाना है। यह पहली बार इतने स्पष्ट रूप से माना गया है कि हर मरीज के लिए तीन दवाओं वाला इलाज जरूरी नहीं। जिन लोगों की हालत स्थिर है और जिनका वायरल लोड नियंत्रित है, उनके लिए दो दवाओं वाला इलाज भी एक विकल्प हो सकता है। यह बदलाव कागज़ पर छोटा लग सकता है, लेकिन ज़मीन पर इसका असर बड़ा है। भारत में लाखों लोग रोज़ मज़दूरी करते हैं, लंबे समय तक काम पर रहते हैं और हर दिन दवा लेने की नियमितता बनाए रखना उनके लिए आसान नहीं होता। कम गोलियाँ न सिर्फ शरीर पर बोझ कम करती हैं, बल्कि मानसिक दबाव भी घटाती हैं।
नई गाइडलाइन में एक और बड़ा प्रयोग है, लॉन्ग-एक्टिंग इंजेक्शन। इसका मतलब है कि कुछ मरीजों को रोज़ दवा लेने की बजाय कुछ महीनों में एक बार इंजेक्शन दिया जा सकता है। WHO मानता है कि यह विकल्प उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है, जिन्हें रोज़ गोली लेने में दिक्कत होती है या जिनके जीवन की परिस्थितियाँ इसकी इजाज़त नहीं देतीं। हालांकि भारत जैसे देश में यह सवाल भी उठता है कि क्या यह सुविधा शहरों से बाहर, ज़िला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुँच पाएगी। WHO भी इसे सार्वभौमिक समाधान नहीं मानता, बल्कि चुनिंदा परिस्थितियों में एक अतिरिक्त विकल्प के तौर पर देखता है।
नई गाइडलाइन का सबसे संवेदनशील और मानवीय हिस्सा मां से बच्चे में HIV संक्रमण को लेकर है। भारत में हर साल हजारों HIV पॉज़िटिव महिलाएँ गर्भवती होती हैं। बीते वर्षों में गर्भावस्था के दौरान संक्रमण को काफी हद तक रोका गया है, लेकिन WHO के मुताबिक अब भी कई नए संक्रमण स्तनपान के दौरान होते हैं। भारत जैसे देश में स्तनपान सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, बल्कि गरीबी, पोषण और सामाजिक संरचना से जुड़ा सवाल है। ऐसे में WHO का यह कहना कि अगर मां इलाज पर है और वायरस नियंत्रित है, तो वह स्तनपान कर सकती है।
WHO की सिफारिश है कि हर HIV-एक्सपोज़्ड बच्चे को जन्म के बाद कम से कम छह हफ्ते तक रोकथाम की दवा दी जाए और जिन मामलों में जोखिम ज्यादा हो, वहाँ तीन दवाओं का प्रोफिलैक्सिस दिया जाए। इसका मतलब यह है कि मां को डर और अपराधबोध में जीने की बजाय, सही जानकारी और समर्थन दिया जाए। यह सोच भारत जैसे समाज में बेहद जरूरी है, जहाँ HIV से जुड़ा कलंक आज भी महिलाओं और बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
भारत में HIV से जुड़ी एक और बड़ी चुनौती टीबी है। HIV से पीड़ित लोगों की मौत की सबसे बड़ी वजहों में टीबी आज भी शामिल है। WHO की नई गाइडलाइन में टीबी से बचाव के लिए तीन महीने का छोटा इलाज (3HP regimen) सबसे बेहतर विकल्प बताया गया है। यह इलाज न सिर्फ कम समय का है, बल्कि इसे पूरा करने की संभावना भी ज्यादा है। भारत में, जहाँ मरीज अक्सर लंबे इलाज के बीच ही छूट जाते हैं, यह बदलाव हजारों जानें बचा सकता है।
WHO बार-बार इस बात पर जोर देता है कि HIV का इलाज सिर्फ दवा देना नहीं है। यह मानवाधिकार, गरिमा और विकल्प की आज़ादी से जुड़ा मसला है। नई गाइडलाइन कहती है कि मरीजों को जानकारी दी जाए, उन्हें निर्णय में शामिल किया जाए और इलाज को उनकी ज़िंदगी के मुताबिक ढाला जाए।