बच्चों के बैंक में मिलता है खुशियों का लोन

बरेली भोजीपुरा ब्लॉक के प्राथमिक स्कूल पिपरिया में बच्चों की स्टेशनरी की जरूरत पूरी करता है स्कूल बैंक, बच्चे खुद संभालते हैं जिम्मेदारी

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   5 Feb 2019 12:04 PM GMT

बच्चों के बैंक में मिलता है खुशियों का लोन

बरेली। छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं, इसकी नजीर पेश की है बरेली भोजीपुरा ब्लॉक के प्राथमिक स्कूल पिपरिया के सहायक अध्यापक सौरभ शुक्ला ने।

पेंसिल, रबर, कॉपी, पेन आदि के लिए परेशान रहने वाले गरीब बच्चों के लिए उन्होंने स्कूल बैंक की शुरुआत कर डाली। बच्चों को स्कूल बैंक से पेन, कटर, क्राफ्ट का सामान और कॉपी लोन के रूप में दिया जाता है। स्कूल बैंक की खास बात है कि इस बैंक का संचालन पूरी तरह से स्कूल के छात्र ही करते हैं।

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सहायक अध्यापक सौरभ ने बताया, "तीन वर्ष पहले मेरी नियुक्ति इस विद्यालय में हुई थी। स्कूल में बच्चों की संख्या बहुत कम थी। जो बच्चे पंजीकृत थे वे भी कम आते थे। इसके साथ ही स्कूल में आए दिन बच्चे छोटी-छोटी चीजों के लिए परेशान होते थे। किसी के पास पेंसिल नहीं होती थी तो किसी के पास कॉपी की समस्या थी। बच्चों की परेशानी और उनकी जरूरतों को देखकर हमने ऐसा बैंक खोलने की सोची, जहां पेंसिल, रबर, कटर, कॉपी, टेप समेत अन्य जरूरी सामान मिलते हों।"


सौरभ बताते हैं, "मैंने स्कूल बैंक खोलने की बात प्रधानाध्यापिका गायत्री यादव को बताई। उन्हें आइडिया बहुत पसंद आया। हम सभी अध्यापकों ने अपनी सैलरी से पेंसिल, रबर, कटर, कॉपी, टेप और फेविकोल खरीद कर स्कूल बैंक में रख दिया। अब छात्र अपनी जरूरत के हिसाब से सामान लेते हैं।"

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बच्चे खुद करते हैं स्कूल बैंक का संचालन

स्कूल बैंक का संचालन स्कूल के छात्र करते हैं। स्कूल बैंक के लिए मैनेजर का चयन कक्षावार किया जाता है। नियमित छात्रों में से उनका चुनाव होता है। स्कूल बैंक से छात्रों को दी गई वस्तुओं का विवरण मैनेजर रजिस्टर में दर्ज करता है। प्रत्येक माह के अंत में रजिस्टर और स्टॉक का मिलान किया जाता है।

अब खुद बच्चों को छोड़ने आते हैं स्कूल

विद्यालय की प्रधानाध्यापिका गायत्री यादव बताती हैं, "जब मेरी निुयक्ति इस विद्यालय में हुई थी तो स्थिति बहुत खराब थी। विद्यालय की बाउंड्री तक नहीं थी, बच्चे भाग जाते थे। लेकिन प्रधान ने अपने निधि से खर्च कर विद्यालय की तस्वीर बदल दी। जहां पहले बच्चे स्कूल आने से कतराते थे आज वहीं अभिभावक खुद बच्चों को स्कूल छोड़ने आते हैं।"

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ऐसे काम करता है स्कूल बैंक

- किसी भी कक्षा का छात्र सुविधाओं का लाभ ले सकता है।

- स्टेशनरी सम्बन्धी कोई भी चीज न होने पर वह वस्तु बैंक से छात्रों को दी जाती है।

- विद्यालय बन्द होने से पहले छात्रों को उस वस्तु को स्कूल बैंक में फिर जमा करना होता है।

- छात्र द्वारा वस्तु खो जाने पर 30 दिनों के अन्दर वह वस्तु स्कूल बैंक में जमा करना होता है।

- स्कूल बैंक के लिए कक्षा मैनेजर का चयन कक्षावार प्रत्येक कक्षा के नियमित छात्रों में से किया जाता है।

- स्कूल बैंक मैनेजर का चयन विद्यालय के होनहार छात्रों में से किया जाता है, जो कक्षा मैनेजरों का नेतृत्व करता है।

- स्कूल बैंक से छात्रों को दी गई वस्तुओं का विवरण 'स्कूल बैंक मैनेजर'द्वारा रजिस्टर में अंकित किया जाता है।

- प्रत्येक माह के अंत में कक्षाध्यापक द्वारा रजिस्टर से स्टॉक का निरीक्षण व मिलान किया जाता है।

- स्कूल बैंक के लिए ग्रीन काउन्टर प्रधानाध्यापक कक्ष में स्थापित किया जाता है।

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स्कूल में पंजीकरण

315 बच्चे पंजीकृत

158 छात्र

157 छात्राएं हैं।

शिक्षण प्रक्रिया में गतिरोध को करना है खत्म

प्रधानाध्यापिका गायत्री यादव ने बताया, " स्कूल बैंक का मुख्य मकसद शिक्षण प्रक्रिया में आने वाले गतिरोध को खत्म करना है। छात्रों में अनुशासन, स्वावलम्बन, जिम्मेदारी, सहभागिता, सामंजस्य की भावना विकसित करना है। इसके अलावा स्कूल बैंक छात्रों में सहकारिता, बैंकिंग एवं लेखा रख-रखाव जैसे दैनिक जीवन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण गुणों एवं कौशल का विकास करता है।"

बच्चों को बात समझ आई

सहायक अध्यापक सौरभ शुक्ला ने बताया, " बच्चों को अभिभावक जेब खर्च के लिए कुछ न कुछ पैसा जरूर देते हैं। इससे बच्चे मिठाई, चाट और चूरन खरीदते थे, जो नुकसानदायक हैं। हमने बच्चों से कहा कि वो जेब खर्च से अपनी इच्छा से जितना हो सके स्कूल बैंक में सामान खरीदने के लिए दे सकते हैं। बच्चों को बात समझ आ गई। इस प्रयास से बच्चों में बचत का गुण विकसित हो रहा है।"

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