आवारा बैल बना रहा बिजली! एक बैल से महीने में ऐसे हो सकती है ₹50 हजार तक कमाई, बस करना होगा ये आसान काम
देश के कई राज्यों में छुट्टा और निराश्रित पशु किसानों के लिए बड़ी समस्या बने हुए हैं। खेतों में फसल बर्बाद होने से लेकर गौशालाओं पर बढ़ते खर्च तक, गांवों में यह मुद्दा लगातार चर्चा में रहता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में लाखों आवारा पशुओं को संभालना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। लेकिन अब लखनऊ के एक इनोवेटिव किसान ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें यही “आवारा बैल” बिजली पैदा कर रहा है, पानी निकाल रहा है, आटा चक्की चला रहा है और कमाई का जरिया बन रहा है।
लखनऊ के किसान और इनोवेटर शैलेंद्र सिंह ने “नंदी ऊर्जा” नाम का एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जिसमें बैल की ताकत को बिजली और मशीनों की ऊर्जा में बदला जा रहा है। उनका दावा है कि एक बैल और 2 किलोवाट सोलर सिस्टम मिलकर गांव की कई जरूरतों की बिजली पैदा कर सकते हैं।
कैसे बनती है बैल से बिजली?
इस मॉडल की सबसे खास बात यही है कि इसमें बैल की सामान्य चलने की ताकत को “मैकेनिकल पावर” माना गया है। शैलेंद्र सिंह ने इसके लिए खास गियर बॉक्स और फ्लाईव्हील सिस्टम तैयार किया है।
पूरा सिस्टम ऐसे काम करता है: बैल एक गोलाकार ट्रैक पर धीरे-धीरे चलता है और उसके चलने से गियर घूमते हैं। ये गियर उसकी धीमी गति को कई गुना बढ़ा देते हैं जिससे 1200 से 1500 RPM तक स्पीड तैयार होती है। इसी स्पीड से अल्टरनेटर और मोटर चलती है और फिर बिजली पैदा होती है। यानी जिस तरह डीजल इंजन पंप चलाता है, उसी तरह बैल की ताकत यहां मशीनों को चला रही है। शैलेंद्र सिंह के मुताबिक, “बैल के पास मैकेनिकल पावर है। हमने उसे गियर बॉक्स के जरिए इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल ऊर्जा में बदल दिया।”
सिर्फ बिजली नहीं, पानी और मशीनें भी चला रहा बैल
यह सिस्टम सिर्फ बल्ब जलाने तक सीमित नहीं है। फार्म पर 3 HP के दो बड़े मोनोब्लॉक पंप, आटा चक्की, कोल्ड प्रेस तेल निकालने वाला कोल्हू और सिंचाई का सिस्टम भी इसी ऊर्जा से चलाया जा रहा है। उनका दावा है कि एक बैल + 2 किलोवाट सोलर मिलकर करीब 10 से 12 किलोवाट तक ऊर्जा उत्पादन कर सकते हैं। भविष्य में इसकी क्षमता 15 से 20 किलोवाट तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है।
“10 साल से फार्म पर बिजली कनेक्शन नहीं”
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शैलेंद्र सिंह का दावा है कि उनके फार्म पर पिछले 10 साल से बाहर की बिजली का कोई कनेक्शन नहीं है। फार्म पर ट्यूबवेल, पानी की सप्लाई, मशीनें और लाइट सब कुछ बैल और सोलर आधारित सिस्टम से चल रहा है। उन्होंने एक “वॉटर स्टोरेज मॉडल” भी तैयार किया है। इसमें बैल पानी को ऊंचाई पर बनी टंकी में चढ़ाता है। बाद में वही पानी टरबाइन की तरह इस्तेमाल होकर बिजली पैदा करता है। यानी बिना बैटरी के बिजली स्टोर करने जैसा सिस्टम तैयार किया गया है।
“एक बैल 8 घंटे में ₹800 की बिजली बना सकता है”
शैलेंद्र सिंह का दावा है कि अगर औद्योगिक बिजली की कीमत करीब ₹10 प्रति यूनिट मानी जाए, तो एक बैल करीब 10 यूनिट प्रति घंटा ऊर्जा के बराबर काम कर सकता है। यानी 8 घंटे में करीब ₹800 की बिजली उत्पादन क्षमता बनती है। अगर इसी मॉडल के साथ आटा चक्की, तेल निकालने वाला कोल्हू, चारा मशीन और ग्रामीण प्रोसेसिंग यूनिट जोड़ दिए जाएं, तो एक बैल महीने में 40 से 50 हजार रुपये तक की कमाई करा सकता है।
“आवारा बैल को मिली इज्जत की जिंदगी”
शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि उनके मॉडल में इस्तेमाल हो रहा बैल पहले छुट्टा घूम रहा था। खेतों से भगाया जाता था और उसके पास खाने तक की व्यवस्था नहीं थी। अब वही बैलआराम से चलता है, काम करता है, चारा खाता है और ऊर्जा पैदा करता है। उन्होंने बैल के चलने के लिए कुशन वाला स्लोप ट्रैक बनाया है ताकि जानवर पर ज्यादा दबाव न पड़े।
यूपी में लाखों निराश्रित पशु, हजारों गौशालाएं
शैलेंद्र सिंह का कहना है कि अगर बड़े गौ आश्रय केंद्रों में इस तरह के ऊर्जा यूनिट लगाए जाएं तो गौशालाएं खुद कमाई कर सकती हैं और गांवों को बिजली मिल सकती है। किसानों को जैविक खाद मिल सकती है और ग्रामीण रोजगार भी बढ़ सकता है।
पेटेंट और रिसर्च पर भी काम
शैलेंद्र सिंह का दावा है कि उन्होंने इस तकनीक से जुड़े कई पेटेंट कराए हैं। उनका कहना है कि इस मॉडल को लगातार बेहतर बनाया जा रहा है ताकि भविष्य में इसकी एफिशिएंसी 80% तक पहुंच सके।