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हरी मिर्च का काला बाजार: खाने वाले खरीद रहे 40-80 रुपए किलो, थोक भाव 15-20 रुपए, किसान को मिल रहे 3-7 रुपए

शहरों में आप मिर्च भले 40-80 रुपए किलो खरीद रहे हों, लेकिन कई राज्यों में किसान 3 से 7 रुपए किलो मिर्च बेचने पर मजबूर हैं। सरकार चाहती है किसान सिर्फ धान-गेहूं की खेती न करें लेकिन जब वो मिर्च और टमाटर लगाते हैं तो उन्हें मंडियों में वो रेट मिलता है, जिसमें उन्हें मुनाफा तो दूर लागत तक नहीं निकल पा रही है।

Arvind ShuklaArvind Shukla   9 Sep 2021 2:11 PM GMT

हरी मिर्च का काला बाजार: खाने वाले खरीद रहे 40-80 रुपए किलो, थोक भाव 15-20 रुपए, किसान को मिल रहे 3-7 रुपए

बाजार के जानकारों के मुताबिक ज्यादा रकबा, बेहतर उत्पादन और विदेश माल न जाने से थोक भाव में गिरे मिर्च के रेट

पिछले हफ्ते किसानों के व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक पेज पर एक वीडियो खूब शेयर किया गया। वीडियो में एक आदमी मिर्च बेचने के लिए बोली लगा रहा था, 50 किलो की बोरी 100 रुपए की थी। यानी मंडी में मिर्च का रेट 200 रुपए कुंतल था। किसानों के मुताबिक ये वीडियो मध्य प्रदेश में खरगोन जिले की उप मंडी बलवारी था। मध्य प्रदेश में खरगोन और बड़वानी समेत कई जिलों में मिर्च की बड़े पैमाने पर खेती होती है लेकिन इस बार रेट न मिलने से किसान परेशान हैं।

किसान अजय काग (45 वर्ष) के खेतों में इस बार हरी मिर्च की बंपर पैदावार है, लेकिन वो तोड़ाई नहीं करवा रहे हैं। थोक मंडियों में भाव इतना कम कि मुनाफा तो दूर लागत नहीं निकल रही है।

"मिर्च तुड़वाकर कर क्या करेंगे, 3-4 रुपए किलो पर तुड़वाई आती है और मंडी में 3 से 6 रुपए किलो रेट मिल रहा है। पिछले साल इस सीजन में 40-55 रुपए किलो का रेट था। पिछले साल से तुलना करें तो औसतन हर किलो पर 40 रुपए कम रेट है। इस बार की खेती माइनस में है।" अजय काग गांव कनेक्शन को बताते हैं।

उनके मुताबिक 300 रुपए कुंटल की तुड़वाई के अलावा 40 रुपए की पॉलिथीन मिर्च को पैक करने में लगती है।

वो कहते हैं, "मेरा पूरा गांव मिर्च की खेती करता है। अगर आज हमारे यहां से गाड़ियां लोड होनी शुरु हो जाएं तो 15-20 दिन तक रोज कई टन माल जाएगा। लेकिन किसान माल ही नहीं भेज रहा है। कुंटल पर 300 रुपए तुड़ाई 40 रुपए की पन्नी लगाने के बाद 340 रुपए होते हैं मंडी में मिल रहे 300 रुपए, जिसमें खाद, बीज शामिल नहीं है। मिर्च किसान तबाह हो जाएंगे।"

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मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के रेहगुन गांव में अपने खेतों में मिर्च की पैकिंग कराते किसान अजय काग के बच्चे। फोटो अरेजमेंट

अजय काग, मध्य प्रदेश में खरगोन के पड़ोसी जिले बड़वानी के रेहगुन गांव में रहते हैं। उनके पास 20 एकड़ मिर्च लगी है, जिसमें करीब 30 लाख की लागत आई है। कृषि से मास्टर की डिग्री लेने वाले अजय 11 साल से मिर्च की खेती कर रहे हैं और उनके मुताबिक रेहगुन गांव में 90 फीसदी लोग मिर्च की खेती करते हैं। मिर्च की फसल को नकदी फसल माना जाता है। इसमें लागत अच्छी लगती है तो कमाई भी होती है। मिर्च की खेती औसतन 80 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक की लागत आती है।

महाराष्ट्र के धुले जिले में भी मिर्च की बड़े पैमाने पर खेती होती है। मध्य प्रदेश और गुजरात से जुड़ा ये इलाका नाशिक डिवीजन में आता है और यहां फल और सब्जियों की अच्छी खेती होती है। धुले जिले के शिरपुर में रहने वाले किसान विकी राजपूत (44 वर्ष) के पास 7 एकड़ हरी मिर्च है। वो रोजाना करीब 2 टन माल शिरपुर और नंदुरबार की मंडियों में भेज रहे हैं। लेकिन वहां जो रेट मिलता है वो उन्हें हताश कर रहा है। जबकि देश के एक बड़े हिस्से में मॉनसून सीजन में बाढ़ होने से ऊपरी इलाकों में होने वाली सब्जियों को अच्छा रेट मिलने का अनुमान रहता है।

"नंदूरबार हमारे यहां से करीब 110 किलोमीटर दूर है। एक छोटी गाड़ी 4500 रुपए किराया लेती है, जिसमें 2 टन (20 कुंटल) माल जाता है। मंडी में 600 से 700 रुपए कुंटल का भाव मिल रहा है। यानि 20 कुंटल माल 14000 का बिकता है तो उसमें 4500 रुपए भाड़ा निकल जाता है। अगर तुड़ाई और बाकी हिसाब देखेंगे तो बहुत नुकसान है लेकिन माल लगा है तो पहुंचा रहे हैं।" विकी राजपूत, मिर्च का हिसाब किताब बताते हैं।

पिछले साल उनके आसपास की मंडियों में मिर्च का अच्छा भाव 30 से 50 रुपए किलो (3000-5000 रुपए कुंटल) था। उनके पास पिछले साल भी हरी मिर्च थी, लेकिन रोग लगने से फसल अच्छी नहीं हुई थी, रेट देखकर इस बार ज्यादा फसल लगाई। फसल भी अच्छी है, लेकिन बाजार ने मात दे दी।


एक महीने में थोक मंडियों में गिरे भाव

थोक मंडियों में मिर्च के भाव पिछले एक महीने में 1 तिहाई हो गए हैं। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के मुताबिक मुंबई की मंडी में 1 सितंबर को हरी मिर्च न्यूनतम रेट 1500 रुपए कुंटल था, जबकि अधिकतम भाव 2000 रुपए गया। वहीं 3 अगस्त को न्यूनतम भाव 3000 रुपए कुंटल और अधिकतम 5000 रुपए कुंटल था। जबकि पिछले साल 2 सितंबर 2020 को मुंबई की मंडी में न्यूनतम भाव 3500 और अधिकतम 4200 रुपए था। सरकारी वेबसाइट ही बताती है कि पिछले साल और इस साल के रेट में 53 फीसदी से ज्यादा का अंतर है।

राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के मुताबिक मुंबई में मिर्च का 1 सितंबर और पिछले साल का भाव।

दिल्ली के आजादपुर में स्थित कृषि उत्पाद विपणन समिति (APCM) में 9 सितंबर को बढ़िया क्वालिटी की मिर्च 1800-2000 में बिकी है। जबकि 3 अगस्त को ये रेट अधिकतम 3000 और न्यूनतम 4000 रुपए कुंटल था। इस वक्त मंडी में 247 मीट्रिक टन की आवक थी जो अब घटकर 101 हो गई है।

हालांकि फुटकर बिक्री के भाव में ज्यादा अंतर नहीं है। मुंबई की मंडी में पिछले साल भी रिटेल भाव 6000 कुंटल का रेट था और इस बार भी। लखनऊ की पॉश कॉलोनी गोमती नगर ठेले वाले (फुटकर विक्रेता) मिर्च 20 रुपए पाव (250) ग्राम यानि 80 रुपए किलो बेच रहे हैं तो मध्य प्रदेश में मिर्च के गढ़ खरगौन में फुट भाव 40 रुपए किलो है।

अजय काग के मुताबिक रेट हर जगह डाउन हैं, लेकिन दिल्ली-मुंबई की मंडियों और किसान को मिलने वाले रेट की तुलना नहीं की जा सकती। बड़ी मंडियों में ज्यादातर व्यापारी माल ले जाते हैं। हम लोग आसपास की मंडियों में बेचते हैं। व्यापारी बड़ी मंडी में 1500 पर माल बेचता है तो तो किसान को 500-600 ही मिलते हैं।

हरी मिर्च इतनी सस्ती क्यों बिक रही है?

हरी मिर्च के भाव इतने गिरे क्यों? गांव कनेक्शन से ये सवाल किसान, व्यापारियों, किसान संगठनों और एग्री स्टार्टअप से जुड़े लोगों से किया। अजय काग इसके लिए उत्पादन ज्यादा होने, कई राज्यों में मिर्च की खेती होने और माल विदेश न जाने (एक्सपोर्ट कम या न) को जिम्मेदार मानते हैं।

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विकास अधिकारी पी. एस बारचे के मुताबिक इस साल फसल और पैदावार दोनों बहुत अच्छी है, क्योंकि मिर्च में रोग नहीं लगा है।

"ये सही है कि मिर्च का रेट नहीं है। यहां की थोक मंडियों में 2-4 रुपए किलो का भाव है। मिर्च में अक्सर एक रोग लगता है जिसे वायरस कहा जाता है। ये रोग लगने पर मिर्च की पत्तियां सूख कर कटोरी जैसी हो जाती हैं। इस साल ये रोग नहीं है। इसलिए पैदावार काफी ज्यादा है।"

वेजिटेबल ग्रोवर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट श्रीराम गढ़वे हरी मिर्च और टमाटर के रेट से परेशान हैं। उन्हें आगे भी कोई रेट बढ़ने की उम्मीद नहीं दिख रही है।

गढ़वे पुणे से फोन पर मार्केट डाउन होने की वजह बताते हैं। "सब्जियां बाहर जा नहीं पा रही है। तालिबान की वजह से पाकिस्तान बॉर्डर भी बंद हैं। मिडिल ईस्ट देशों में सामान जाने में भी दिक्कत है। सरकार को चाहिए सब्जियों के एक्सपोर्ट पर ध्यान दे।"


जलवायु परिवर्तन से बढ़े रोग और किसान का खर्च?

गढ़वे रेट गिरने की दूसरी वजहों में बढ़ा रकबा और जलवायु परिवर्तन मानते है। वो कहते हैं, "सिर्फ मिर्च ही नहीं कई लगभग सभी सब्जियों का रकबा बढ़ा है। क्योंकि देश में 2-3 वर्षों से बारिश ठीक हुई है। ग्राउंड वाटर भी है। इसलिए लोग सिंचाई कर पा रहे हैं। लेकिन समस्या ये है कि रकबा बढ़ा लेकिन प्रति एकड़ उत्पादन कम हुआ है, क्योंकि क्लाइमेट चेंज के चलते रोग बहुत लग रहे हैं। फसल सुरक्षा खर्च (पेस्टीसाइड आदि) बहुत बढ़ गया है। इसलिए थोड़ा रेट कम होने पर किसान को नुकसान हो जाता है।"

किसानों और ट्रेडर को मोबाइल एप के जरिए एक मंच पर लाने वाले एग्री डिजिटल प्लेटफार्म हार्वेस्टिंग फार्मर नेटवर्क के फाउंडर और सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) रुचित गर्ग इसके पीछे कोविड महामारी को भी एक वजह मानते हैं। वो कहते हैं, "मेरे पास कोई रिपोर्ट तो नहीं है लेकिन एक्सपोर्ट पर असर है। दुबई वगैरह को भारत से अक्सर सामान जाता है। लेकिन कोविड और स्टॉपेज की वजह से लोग फ्री आ जा नहीं पा रहे। कोविड से पहले मेरे पास अमेरिका से 50-60 हजार पैकेट हल्दी का आर्डर था। लेकिन कोविड के चलते लॉजिस्टिक 5 गुना महंगा होने से वो माल नहीं गया। वो डील खराब हो गई। ऐसा बहुत जगह हुआ होगा।"

अजय काग अपने मिर्च के खेत में।

देश फल और सब्जियों की खेती का रकबा बढ़ा

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बागवानी फसलों के लिए क्षेत्र (रकबा) और उत्पादन का वर्ष 2020-21 के लिए 15 जुलाई को दूसरा अग्रिम अनुमान जारी किया, जिसके मुताबिक पूरे देश में सब्जियों का उत्पादन 196.27 मिलियन टन होने का अनुमान है जो पिछले साल के 188.28 मिलियन टन से 4.42 फीसदी ज्यादा है।

तीखा और चटपटा खाने के शौकीन भारत में मिर्च के बिना शायद ही कोई सब्जी बन पाए इसलिए मिर्च की पूरे साल मांग रहती है। भारत में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत 29 राज्यों में हरी मिर्च की खेती होती है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के साथ ही मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष 10 राज्यों में हैं। दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक देश में 399.31 हजार हेक्टेयर में मिर्च की खेती हुई है और 4392.88 हजार मीट्रिक टन उत्पादन अनुमानित है। साल 2017-18 में देश में 309 हजार हेक्टेयर में हरी मिर्च की खेती हुई थी और 3592 हजार मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ था।

हरी मिर्च का उपयोग सब्जी के अलावा मसालों के रूप में भी होता है। सूखी मिर्च को मसालों की कैटेगरी में रखा जाता है। दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक 2020-21 में पूरे देश में 732.21 हजार हेक्टेयर में फसल से 1884.78 हजार मीट्रिक टन का उत्पादन अनुमानित था। जिसमें सबसे ज्यादा उत्पादन आंध्र प्रदेश 836 हजार मीट्रिक टन (180 हजार एकड़) अनुमानित था। जो देश सूखे मिर्च कुल पैदावार से 40 फीसदी से ज्यादा है। आंध्र प्रदेश के बाद तेलंगाना 407.27 हजार मीट्रिक टन (90.30 क्षेत्रफल) जबकि मध्य प्रदेश में 292.62 हजार मीट्रिक टन (113.37 हजार एकड़) का उत्पादन अनुमानित है।

टमाटर का भाव से भी किसान हैं परेशान

2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा कर चुकी केंद्र सरकार चाहती है कि किसान धान-गेहूं के बजाए फल और सब्जियों की खेती करें। इसके लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में बागवानी फसलों का रकबा बढ़ा भी है। लेकिन हरी सब्जियों का जो मार्केट है वो किसानों को परेशान कर रहा है।

मंडी और मार्केट तंत्र के मुद्दे पर अजय काग कहते हैं, "कई सारे लोगों को लगता है कि किसान सब माल खुद से क्यों नहीं बेच रहा? तो पहला तो किसान के पास इतना वक्त नहीं होता कि वो रोज मंडी जाए। दूसरा ये कच्चा माल है, जिसे ज्यादा समय तक रोक नहीं सकते वो सड़ जाएगा। मंडी से लेकर बाजार तक इसी का फायदा उठाया जाता है।"

वो आगे कहते हैं ऐसा नहीं है कि हम लोग कभी सीधे मंडी में बेचने की कोशिश नहीं करते, किया है। पहला तो कच्चे माल का बाहर की मंडियों में पैसा फंसने का डर रहता है, दूसरा कमीशन एजेंट (आढ़तिये) और व्यापारी का इतना तगड़ा नेटवर्क है कि वो किसान को आसानी से बेचने नहीं देते। पिछले दिनों हमारे यहां से एक गाड़ी माल भोपाल मंडी गया था, वहां के कारोबियों ने उसे बेहद कम दाम दिए।

खरगोन में मेनगांव के किसान सुरेश पाटीदार (45 वर्ष) कहते हैं। "4 एकड़ में मिर्च लगी है। खर्च नहीं निकल रहा है, लेकिन तुड़वाना तो पड़ेगा ही। लाल मिर्च भी मार्केट में आनी शुरू हुई है उसका रेट तो अच्छा है, यहां 160 रुपए किलो का रेट खुला है। लेकिन जिस हिसाब हरी मिर्च का भाव है, लाल मिर्च से भी उम्मीद नहीं है।

हरी मिर्च की खेती के लिए किसान मई-जून में अगैती फसल लगाते हैं, जबकि सिर्फ सूखी मिर्च के लिए किसान जुलाई में रोपाई करते हैं। मई-जून में रोपाई के बाद किसान जुलाई से लेकर अक्टूबर तक हरी मिर्च की तोड़ाई करते हैं और मानसून के बाद मौसम साफ होने पर मिर्च को पकाना शुरु कर देते हैं। हरी मिर्च पकने और सूखने के बाद लाल हो जाती है। जिन किसानों के खेत में फसल में लगी है वो अभी लाल मिर्च तैयार नहीं कर सकते हैं क्योंकि मिर्च की तोड़ाई नहीं की गई तो नए फल नहीं आएंगे और इस मौसम में सुखाने के जोखिम हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में हरी की बजाए सूखी मिर्च की खेती ज्यादा होती है, क्योंकि वहां की मिट्टी-जलवालु उसके अनूकूल है, दूसरा वहां मिर्च समेत दूसरी मसाला वाली फसलों के लिए बाजार का नेटवर्क बहुत सशक्त है।

अजय के मुताबिक मिर्च की खेती में इस साल उनकी लागत करीब डेढ़ लाख रुपए प्रति एकड़ की है। यानि पूरे खेत में करीब 30 लाख रुपए की लागत आई है। पिछले साल उन्हें ढाई लाख प्रति एकड़ का औसत मुनाफा हुआ था। लेकिन इस बार उनके माथे पर बल पड़े हैं।

अजय कहते हैं, "अभी मैं ये सोचकर परेशान हूं कि अगर आगे भी यही रेट रहा तो खाद-पेस्टीसाइड के लाखों रुपए जो दुकानदारों और एजेंसियों के बाकी हैं वो कहां से दूंगा।"

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