विशेष : किसानों की आमदनी दोगुनी करने के मिशन में बाधा न बन जाएं बदहाल कृषि विज्ञान केन्द्र

Divendra SinghDivendra Singh   22 Sep 2017 10:25 PM GMT

विशेष : किसानों की आमदनी  दोगुनी करने के मिशन में बाधा न बन जाएं बदहाल कृषि विज्ञान केन्द्रकेवीके में अधूरे कर्मचारी, कैसे मिले किसानों को लाभ।

लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की वादा लगातार दोहरा रहे हैं। पीएम किसानों ने नई तकनीकें और उन्नत बीज अपनाने की अपील कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र कृषि वैज्ञानिकों की खोजों और विधियों को किसान तक पहुंचाने का प्रमुख जरिया होते हैं। लेकिन इनकी जो हालत है वो सरकार के गणित पर पानी फेर सकती है।

देश में सबसे अधिक किसानों की संख्या कृषि क्षेत्रफल के मामले में सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) कर्मचारी, (कृषि वैज्ञानिकों और स्टॉफ) और सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। प्रदेश के 69 केवीके पर 1104 पद सृजित हैं लेकिन आंकड़ों में भी तैनाती सिर्फ 879 की है। कहीं पांच साल में बिल्डिंग नहीं बन पाई है तो कहीं हर फसल और विषय के वैज्ञानिक ही नहीं हैं। इन केवीके में सैकड़ों एकड़ जमीन होती है, जहां विषय के जानकार वैज्ञानिक फसल और दूसरी जानकारियों की सीधे खेतों में फसल उगाकर प्रदर्शन (डेमो) करते हैं, लेकिन कृषि के मामले में पिछड़े गरीब जिलों अंबेडकरनगर और संतकबीर नगर के केवीके में सिंचाई तक के लिए बोरिंग तक का प्रबंध नहीं है।

ये भी पढ़ें- जमीनी हकीकत : मध्यम वर्ग के ज्यादातर लोगों ने किसान को हमेशा एक बोझ समझा है

एक कृषि विज्ञान केन्द्र पर करीब 16 लोगों का स्टॉफ होना चाहिए, जिसमें छह विषयों के कृषि विशेषज्ञ और दूसरे पद हैं। बागवानी, कृषि विज्ञान, फसल सुरक्षा, मृदा विज्ञान, पशु विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि प्रसार के विशेषज्ञों की नियुक्ति होती है, लेकिन यूपी के 69 कृषि विज्ञान केन्द्रों पर सभी विशेषज्ञ नहीं हैं, कहीं पर फसल सुरक्षा के विशेषज्ञ नहीं तो कहीं पर बागवानी के विशेषज्ञ नहीं हैं और कहीं पर तो एक ही विषय के दो विशेषज्ञ हैं। जबकि सरकार 20 नए केवीके उत्तर प्रदेश में और खोलने की तैयारी में है।

सीतापुर जिले में पांच वर्ष से भी अधिक समय से कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) संचालित है, लेकिन अभी भी मानक के अनुरूप वैज्ञानिकों की नियुक्ति नहीं हो पाई, यही नहीं पिछले पांच वर्ष से बन रही बिल्डिंग अभी तक नहीं पाई। गाँव कनेक्शन के कई जिलों में केवीए के वैज्ञानिकों से बात की।

कृषि विज्ञान केंद्र।

यह भी पढ़ें : कर्ज़माफी में दो रुपये के प्रमाण पत्र का गणित समझिए

लखनऊ के करीब एक कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, "सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना की बात कर रही है, इसमें कृषि विज्ञान केन्द्रों का पूरा सहयोग रहेगा, लेकिन हमारे केन्द्र ही असुविधाओं से जूझ रहे हैं। सरकार को चाहिए कि जो केन्द्र चल रहे हैं, उन्हें पूरी सुविधाएं दें। उसके बाद नए केन्द्र शुरू करने की बात करे।"

केवीके की बदहाली के लिए उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही पिछली सरकारों की नीतियों को जिम्मेदार बताते हैं। शाही कहते हैं, "पिछले दिनों में जो सरकार थी उन्होंने ज्यादातर कृषि वैज्ञानिकों को कृषि विश्वविद्यालयों में लगा दिया था, फैजाबाद और कानपुर विश्वविद्यालय का यही हाल था, लेकिन अब उन वैज्ञानिकों को कृषि विज्ञान केन्द्रों से अटैच कर दिया गया है।"

ये भी पढ़ें : बीमा कंपनियों के फंदे में फंसे किसान

सीतापुर के लहरपुर के किसान मेवालाल वर्मा सब्जियों की खेती करते हैं। मेवालाल बताते हैं, "केवीके में व्यवस्था नहीं है, केवीके पर पता चला कि मृदा वैज्ञानिक नहीं है, केवीके के दूसरे वैज्ञानिक हमारी मदद करते हैं, लेकिन विषय का जानकार तो हो अलग बात है।’

दूसरी ओर, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत कानपुर स्थित कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) प्रदेशों के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों के बजट से लेकर नई नियुक्तियों पर काम करता है। संस्थान के निदेशक डॉ. उधम सिंह गौतम बताते हैं, "जल्द ही कृषि विज्ञान केन्द्रों पर नई नियुक्तियां हो जाएंगी, हमने अभी हाल ही में केन्द्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की कमी के बारे में प्रमुख सचिव से बात की गई है। केन्द्र और प्रदेश सरकार भी चाहती है कि किसानों के लिए केन्द्र सही काम करे।"

एक कृषि विज्ञान केन्द्र पर करीब 16 लोगों का स्टॉफ होना चाहिए,जिसमें छह विषयों के कृषि विशेषज्ञ और दूसरे पद हैं। बागवानी, कृषि विज्ञान, फसल सुरक्षा, मृदा विज्ञान, पशु विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि प्रसार के विशेषज्ञों की नियुक्ति होती है, लेकिन 69 कृषि विज्ञान केन्द्रों पर सभी विशेषज्ञ नहीं हैं, कहीं पर फसल सुरक्षा के विशेषज्ञ नहीं तो कहीं पर बागवानी के विशेषज्ञ नहीं हैं और कहीं पर तो एक ही विषय के दो विशेषज्ञ हैं।

किसान।

ये भी पढ़ें : टमाटर मार्केट इंटेलीजेंस परियोजना : 14 साल से हो रही है रिसर्च, क्यों इतनी तेजी से बढ़ते हैं रेट

कृषि विज्ञान केंद्र में वैज्ञानिक खेती के तरीके ढूंढने के अलावा उनकी गुणवत्ता में सुधार, कीट और खरपतवारों पर सुरक्षित और प्रभावी तरीकों से नियंत्रण, मृदा और जल संरक्षण में सुधार के लिए किए गए अनुसंधान का किसानों को आसानी से लाभ मिल सकें।

अंबेडकरनगर केवीके के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रवि प्रकाश मौर्य बताते हैं, "हमें किसानों को केवीके फार्म पर खेती नयी तकनीक के बारे में दिखाना होता है, पिछले पांच साल में ट्यूबवेल नहीं लग पाया, किसानों के ट्यूबवेल से सिंचाई हो पाती है, न ही बाउंड्री वॉल बन पायी है, यही हाल संत कबीरनगर के केवीके की भी है, न तो अपना इंजन है और न ही बाउंड्री।"

बरेली जिले के पिथरी चैनपुर ब्लॉक के केशरपुर गाँव के किसान हरीश तंवर कृषि विज्ञान केन्द्र की मदद से खेती कर रहे हैं। वो बताते हैं, "मैं ग्रीन हाउस में सब्जियों की खेती करता हूं, मगर केवीके में फसल सुरक्षा और पशु विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं। दूसरे विशेषज्ञ भले ही हमारी मदद करने की कोशिश करते हैं।“ हरीश आगे कहते हैं, “उनके पास खुद ही स्टॉफ की कमी है, जिससे कई बार जिस काम के लिए जाओ वो वैज्ञानिक नहीं मिलते हैं।“

ये भी पढ़ें : सरकारी रिपोर्ट : किसान की आमदनी 4923 , खर्चा 6230 रुपए

बहराइच कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम समन्यवक डॉ. ओम प्रकाश वर्मा बताते हैं, "प्रदेश के सबसे पुराने कृषि विज्ञान केन्द्रों में से बहराइच का केंद्र एक है। पिछले कुछ वर्षों में महंगाई बढ़ गई, कृषि विज्ञान केन्द्र के लिए बजट अभी भी वही है। सरकार जितनी आपक्षाएं करती है,उतनी सुविधाएं नहीं मिलती। दस साल पहले जो बजट था, अब भी वही है। 2004 में डीजल का जितना बजट मिलता था, आज 2017 में भी वही बजट है।"

लखीमपुर कृषि विज्ञान केन्द्र में भी पिछले पांच वर्षों से अपना भवन नहीं तैयार हो पाया, केन्द्र प्रभारी डॉ. संतोष कुमार विश्वकर्मा कहते हैं, "हमारे यहां तो अभी सिर्फ चार लोगों का स्टाफ है, कई बार हमने इसके बारे में कहा होगा लेकिन अब तक नहीं हो पाया।"

प्रतापगढ़ जिले में कालाकांकर में कृषि विज्ञान केन्द्र है, वहां से करीब 60 किमी. दूर पट्टी ब्लॉक के धौरहरा गाँव के किसान रमेश यादव ने इस बार कृषि विज्ञान केन्द्र की मदद से खस की खेती की है। रमेश बताते हैं, "हमारे यहां केवीके की दूरी 60 किमी. इतनी दूरी पर है कि कृषि वैज्ञानिक दो-तीन महीने में एक बार आ पाते हैं, वहां पर सभी विशेषज्ञ हैं, लेकिन पशुपालन के नहीं है, दूसरे लोग ही पशुपालन की जानकारी देते हैं।"

ये भी पढ़ें : बैंक का नोटिस : वसूलीनामा यानि कर्ज़दार किसानों की आत्महत्या का बुलावा

आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर नाम न बताने की शर्त पर बताते हैं, "कई वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जिनकी नियुक्ति केवीके में है, लेकिन काम विश्वविद्यालय में काम कर रहे हैं। ऐसा ज्यादातर कृषि विश्वविद्यालयों में हो रहा है।"

नए कृषि विज्ञान केन्द्र शुरु होने के बारे में कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, अटारी कानपुर के निदेशक डॉ. उधम सिंह गौतम बताते हैं, " 12वीं पंच वर्षीय योजना के तहत नए केवीके खुलने थे,दुर्भाग्य की बात है कि हमने पिछली सरकार को लिखा भी था, लेकिन स्वीकृति नहीं मिल पायी थी, नयी सरकार आने के बाद 20 केवीके शुरु होने की स्वीकृति मिल गई है।"

पिछली सरकारों ने ज्यादातर कृषि वैज्ञानिकों को कृषि विश्वविद्यालयों में लगा दिया था। लेकिन अब उन वैज्ञानिकों को कृषि विज्ञान केन्द्रों से अटैच कर दिया गया है।
सूर्य प्रताप शाही, कृषि मंत्री, उत्तर प्रदेश

"कृषि विज्ञान केन्द्र के बजट की हम अलग-अलग मॉनिटरिंग करते हैं,केन्द्र की बिल्डिंग और दूसरे काम होते हैं, यहीं से विश्वविद्यालय को बजट देते हैं, हमारी पूरी कोशिश रहती है कि सभी केन्द्रों पर पूरी सुविधाएं हो।" उन्होंने आगे बताया।

उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही कहते हैं, "पिछले दिनों में जो सरकार थी उन्होंने ज्यादातर कृषि वैज्ञानिकों को कृषि विश्वविद्यालयों में लगा दिया था, फैजाबाद और कानपुर विश्वविद्यालय का यही हाल था,लेकिन अब उन वैज्ञानिकों को कृषि विज्ञान केन्द्रों से अटैच कर दिया गया है।"

जल्द ही कृषि विज्ञान केन्द्रों पर नई नियुक्तियां हो जाएंगी, हमने अभी हाल ही में केन्द्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की कमी के बारे में प्रमुख सचिव से बात की गई है। केन्द्र और प्रदेश सरकार भी चाहती है कि किसानों के लिए केन्द्र सही काम करे।
डॉ. उधम सिंह गौतम, निदेशक, कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कानपुर

शाही आगे बताते हैं, "जहां पर अभी बिल्डिंग और दूसरी सुविधाएं नहीं हैं वहां पर विश्वविद्यालयों से बजट के लिए कह दिया गया है, अभी जो 20 नए केवीके शुरू होने हैं, उनमें से 17 की सहमति मिल गई, इनकी जमीन भी मिल गई है, आईसीएआर को लिखा जा चुका है, बजट मिलते ही काम शुरू हो जाएगा।" केवीए सरकार के लिए कितना महत्वपूर्ण ये है आप हाल में चलाए गए अभियान से समझ सकते हैं, किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में केंद्र सरकार के संकल्प से सिद्धि अभियान की जमीनी कमान इन्ही केवीए के हाथ में थी।

केवीके में जानकारी लेते हैं किसान।

केवीके में वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की कमी

औरैया में फसल सुरक्षा के वैज्ञानिक नहीं है, बागपत में मृदा व पशु विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं, आगरा में पशु विज्ञान, अलीगढ़ में पशु विज्ञान, गाजीपुर में फसल सुरक्षा, बस्ती में मृदा विज्ञान, बरेली में फसल सुरक्षा व पशु विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं। इटावा में पशु विज्ञान,फतेहपुर में फसल सुरक्षा के वैज्ञानिक नहीं हैं। यहीं नहीं कई कृषि विज्ञान केन्द्रों पर तो एक ही विषय के दो-दो विशेषज्ञ हैं।

1104 में से सिर्फ 879 पदों पर ही नियुक्ति

नियमानुसार प्रदेश के 69 कृषि विज्ञान केन्द्रों पर 1104 पद हैं, लेकिन अटारी की वेबसाइट के अनुसार 879 पदों पर ही नियुक्ति हुई है। वेबसाइट पर अभी कई ऐसे वैज्ञानिकों के नाम हैं, जिनकी नियुक्ति किसी दूसरे केवीके में हो गई है।

ये भी पढ़ें : जलवायु परिवर्तन के कारण सब्जियों की खेती हो रही प्रभावित

पढ़िए कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के 7 सूत्र, जिनसे 2022 तक किसानों की आमदनी हो सकती है दोगुनी

ये भी पढ़ें - भारत समेत दुनिया के कई देशों में होने वाला है खाने का संकट, ये है वजह

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top