भाजपा का संकल्प पत्र: चुनावी मुद्दों पर असमंजस और बढ़ा

भाजपा ने मतदान शुरू होने के दो दिन पहले अपना घोषणापत्र नुमा संकल्प पत्र जारी करने की रस्म पूरी कर दी, इस दस्तावेज का लब्बोलुआब यह निकल कर आ रहा है कि भाजपा के इस दस्तावेज की प्राथमिकताएं कांग्रेस के घोषणापत्र से अलग तरह की दिख रही हैं

भाजपा का संकल्प पत्र: चुनावी मुद्दों पर असमंजस और बढ़ा

सत्तारूढ़ दल के घोषणापत्र को लेकर मीडिया में बड़ा कुतूहल था। ज्यादा कुतूहल इसलिए था क्योंकि मुख्य विपक्षी दल ने अपना घोषणाप़त्र एक हफ्ते पहले जारी कर दिया था। हफतेभर से कांग्रेस के घोषणापत्र की चर्चा रोके नहीं रूक रही थी। इसीलिए मीडिया में यह अटकल थी कि ऐन मौके पर भाजपा कोई ऐसा धमाका करेगी जो कांग्रेस की 72 हजार वाली न्याय योजना के वायदे को बेअसर कर देगा।

हालांकि यह अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था कि कांग्रेस के न्याय के टक्कर की भाजपाई योजना हो क्या सकती है? इसीलिए भाजपा के घोषणापत्र के जारी होने के दो घंटे पहले जो टीवी चैनल बहस की दुकान सजा कर बैठे उनका अनुमान था कि भाजपा देश के मध्यवर्ग के लिए कोई बड़ा वायदा लेकर आएगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं दिखा।

ये भी पढ़ें: 'बीमार स्वास्थ्य सेवाएं' चुनावी मुद्दा क्यों नहीं ?

अब तक का विश्लेषण यह है कि भाजपा के संकल्प पत्र में किसानों के मुददों के साथ राष्ट्रवाद, कश्मीर, राममंदिर के संकल्पों पर कुछ ज्यादा ही महत्व दिया गया है। वैसे गौर से देखें तो भाजपा ने कांग्रेस के बड़े वायदों से होड़ नहीं की। दरअसल भाजपा के पास बड़ी घोषणाओं का मौका था ही नहीं। क्योंकि वह पांच साल से सत्ता में है और उस पर अपना रिपोर्ट कार्ड देने की भी जिम्मेदारी है। इसीलिए कुछ अखबार, टीवी चैनल और विपक्ष बार बार याद दिला रहा था कि पांच साल पहले भाजपा ने क्या वायदे किए थे और उसके किए कौन से वायदे पूरे हुए?

बहरहाल भाजपा ने मतदान शुरू होने के दो दिन पहले अपना घोषणापत्र नुमा संकल्प पत्र जारी करने की रस्म पूरी कर दी। इस दस्तावेज का लब्बोलुआब यह निकल कर आ रहा है कि भाजपा के इस दस्तावेज की प्राथमिकताएं कांग्रेस के घोषणापत्र से अलग तरह की दिख रही हैं।


यानी अलग अलग राग अलापे जाएंगे

कहने को तो पहले चरण का मतदान होने में 48 घंटे ही बचे हैं। लेकिन गौरतलब है कि इस बार का चुनाव सात चरणों में होना है। चुनाव प्रचार लगातर सवा महीने चलना है। जाहिर है कि इतने लंबे समय तक मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी दलों को लगातार भाषणों का दौर चलाना पड़ेगा। यानी इन घोषणापत्रों में किए ऐलान ही बार बार दोहराए जाएंगे। और यह भी तय है कि वोटर भी यही हिसाब लगाएगा कि आने वाले पांच साल में कौन सा दल क्या काम करने का वायदा कर रहा है।

ये भी पढ़ें:देश में गरीब गिनने के बजाय बालाकोट में आतंकी गिने जा रहे हैं: योगेन्द्र यादव

बहरहाल अब तक की चुनावी बिसात से यह तय हो गया है कि सत्तारूढ़ दल बार बार यह साबित करेगा कि देश की मुख्य समस्या देश की सुरक्षा है, कश्मीर है राममंदिर है और उसके बाद किसानों की आमदनी बढ़ाना और सबको सामाजिक सुरक्षा देना है। वैसे संकल्पपत्र समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण पर गौर करें तो भाजपा की प्राथमिकता राष्ट्रवाद, अंत्योदय और सुशासन है। उधर मुख्य विपक्षी दल कांगेस के मुताबिक इस समय देश के मुख्य संकट आर्थिकतंगी, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और छोटे व्यवसायियों की परेशानियां हैं।

कांग्रेस की दूसरी प्राथमिकताओं में शिक्षा और स्वास्थ्य है। यानी दोनों दलों के मुद्दों की लिस्ट में भले ही किसान और गांव शामिल हों लेकिन प्राथमिकताओं के लिहाज़ से साफ साफ फर्क है। भाजपा का जोर राष्ट्रवाद, कश्मीर और राममंदिर जैसे भावनात्मक मुददो पर ज्यादा है और कांग्रेस का जोर किसान और बेरोजगारी पर ज्यादा है। इसी आधार पर अनुमान है कि इस बार के चुनाव में सत्ता और विपक्ष अलग अलग राग अलाप रहे होंगे।


किसानों के लिए क्या है दोनों घोषणापत्रों में

भाजापा के घोषणपत्र में सभी किसानों के लिए पांच सौ रूप्ए महीना यानी छह हजार रूप्ए सालाना की सीधी मदद का एलान है। हालांकि एनडीए सरकार ने चुनाव की तारीख का एलान होने के पहले छोटे किसानों के लिए ऐसी योजना का एलान कर दिया था। लेकिन संकल्प पत्र में नई बात यह है कि उस योजना की पांच सौ रुपए महीने की रकम अब सभी किसानों को दिए जाने का वायदा है।

ये भी पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट: मुद्दों से इतर जाट राजनीति तक सीमित रह गया मुजफ्फरनगर चुनाव

जबकि पहले वाले एलान में यह रकम सिर्फ दो हेक्टेअर से कम जमीन वाले किसानों के लिए ही थी। उधर हफ्ते भर पहले आए कांग्रेस के घोषणापत्र में गरीबों के लिए सालाना 72 हजार रुपए की न्याय योजना की घोषणा की गई थी। इस योजना में गांव और शहरी सभी गरीबों को शामिल किया गया था।

गौरतलब है कि गांवों में रोजगारी गारंटी वाली मनरेगा में 100 दिन के रोज़गार मिलने के प्रावधान को कांग्रेस ने 150 दिन करने की घोषणा की थी। मनरेगा के बारे में भाजपा के संकल्पपत्र में कोई जिक्र नहीं है। अलबत्ता भाजपा ने अपने संकल्पपत्र में एक लाख रूपए तक के किसान क्रेडिट कार्ड से लिए गए लोन पर पांच साल तक ब्याज न लगाने का वादा ज़रूर किया है। कांग्रेस के घोषणापत्र का ब्योरेवार विश्लेषण गांव कनेक्शन के इसी स्तंभ में किया जा चुका है।

लिहाज़ा उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। इसीलिए यहां सिर्फ भाजपा के संकल्प पत्र की मुख्य बातों की चर्चा ही की जा रही है। और मुख्य रूप से किसानों से किए कुछ वायदों को ही देखा जा रहा है।


पांच साल में कृषि क्षेत्र पर 25 लाख करोड़ का खर्च?

भाजपा के संकल्प पत्र में कृषि उत्पादन बढाने के लिए पांच साल में कृषि क्षेत्र में 25 लाख करोड़ रुपए लगाने का संकल्प किया है। यानी हर साल पांच लाख करोड़ रुपए खर्च करने का संकल्प। अब ये हिसाब लगाना आसान नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था में कृषि क्षेत्र में सरकारी खर्च हो कितना रहा है? इसके आलावा भाजपा के घोषणा पत्र में किसानों को साठ साल की उम्र के बाद पेंशन का वादा किया गया है।

ये भी पढ़ें: पहाड़, नदी, जंगल की हत्या कभी चुनावी मुद्दा बनेंगे ?

भंडारण की सुध दोनों घोषणापत्रों में

कांग्रेस की तरह ही भाजपा ने भी खाद्य भंडारण की व्यवस्था को दुरूस्त करने का संकल्प जताया है। भाजपा का वायदा है कि राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे वेयरहाउसिंग ग्रिड बनाए जाएंगे। और ग्राम भंडारण व्यवस्था बनाई जाएगी। यानी इतना तो तय हो गया है कि सवा महीने बाद चाहे किसी की भी सरकार बने, किसानों को भंडारण का आश्वासन मिल चुका है।

मछुआरों पर गौर

भाजपा ने मछुआरों के लिए मत्स्य संपदा योजना चालू करने का वायदा किया है। इसमें मछुआरों को आइस बॉक्स कोल्ड स्टोरेज और आइस प्लांट मुहैया कराने जैसे लुभावने वायदे किए हैं। इसके अलावा 20 लाख हैक्टेअर जमीन पर जैविक खेती को बढ़ावा देने का जि़क्र भी संकल्प पत्र में है। हालांकि इतने बड़े पैमाने पर जैविक खेती की व्यावहार्यता के बारे में सोच विचार बाद में ही हो पाएगा।


ज्यादा बड़ा है अधूरी सिंचाई परियोजनाएं पूरी करने का वायदा

कई भारीभरकम वायदों की लिस्ट में एक वायदा अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने का भी है. हालांकि अभी यह पता नहीं है कि बड़ी तादात में अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने में कितना समय लगेगा। हालांकि इसी संकल्पपत्र में दावा किया गया है कि सरकार ने अधूरी पड़ी 31 सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने का काम किया है और 68 अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को इसी साल दिसंबर तक पूरा कर लिया जाएगा।

ये भी पढ़ें: प्याज की राजनीति- 'किसानों के आंसुओं में वो दम नहीं कि सरकार हिला सके'

यह सवाल भी बाकी है कि अधूरी पडी या मजूरी के बाद शुरू ही नहीं हो पाई कितनी योजनाओं पर कुल कितनी रकम खर्च होगी? और वह रकम कहां से जुगाड़ी जाएगी? सिंचाई के मामले में एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य एक करोड़ हैक्टेअर भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के तहत लाने का है। बेशक वर्षानिर्भर खेती की समस्याओं से जूझ रहे देश में यह लक्ष्य भी बहुत आकर्षक है।

फसल बीमा को स्वैच्छिक बनाने की बात

किसानों के लिए फसल बीमा को स्वैच्छिक कर देने का वादा भी किया जा रहा है। यह वायदा ठीक ही है क्योंकि ये आरोप लगने लगे थे कि इस बीमा योजना से फायदा बीमा कंपनियों को ही हो रहा है। एक वायदा ज़मीन का डिजिटल रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था का है.

ग्रामीण रोज़गार पर उतना गौर नहीं

गैर कृषि ग्रामीण आबादी के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में पंचायती स्तर पर नए दस लाख रोज़गार पैदा करने का वादा किया गया था। कांग्रेस के ऐसे वायदे को बेअसर करने के लिए भाजपा की तरफ से किसी बड़े वायदे का जिक्र दिख नहीं रहा है। हालांकि भाजपा के घोषणापत्र में राष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार बढाने की यह बात ज़रूर है कि मुख्य 22 क्षेत्रों में रोज़गार पैदा करने के लिए सरकारी मदद दी जाएगी लेकिन इस वायदे का रूप् उतना स्पष्ट नहीं है।


घोषणापत्रों को जांचने की कसौटी क्या हो?

देश के कई राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र अब जनता के सामने हैं. मीडिया और विद्वानों के पास एक काम आ गया है कि इन घोषणापत्रों की तुलना करें और इनकी व्यावहारिकता का विश्लेषण भी करें. हालांकि घोषणापत्रों में किए वायदों के महत्व और उसकी व्यावहार्यता जांचना जरा पेचीदा काम है। फिर भी इस काम के लिए प्रबंधन प्रौद्योगिकी में लक्ष्य प्रबंधन का पाठ उपलब्ध है।

ये भी पढ़ें: कांग्रेस का घोषणापत्र पाकिस्तानी साजिशों का दस्तावेज: पीएम मोदी

इस पाठ में बाकायदा एक पैमाना उपलब्ध है। अंग्रेजी में इसे स्मार्ट गोल्स कहा जाता है। जिसमें स्मार्ट यानी एस एम ए आर टी। यहां एस से मतलब है स्पेसिफिक, एम से मेज़ेरेबल, ए से अचिवेबल, आर से रिलाएबल और टी से टाइम बाउंड है। इस तरह से आधुनिक प्रौद्योगिकी सुझाती है कि किसी घोषणा या वायदे या लक्ष्य को बनाते समय यह जरूर देख लेना चाहिए कि वह विशिष्ट और स्पष्ट है या नहीं? उस वायदे या लक्ष्य की नामतोल हो सकती है या नहीं? वह लक्ष्य हासिल होने लायक है या नहीं? विश्वसनीय है या नही? और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक निश्चित समय का भी वायदा किया गया है या नहीं। इस कसौटी पर किसी भी घोषणापत्र को जांचा परखा जा सकता है।

अगर किसी कारण से मीडिया और विशेषज्ञ लोग घोषणापत्रों को जांचने में इस कसौटी का इस्तेमाल न कर पा रहे हों तो पढ़ेलिखे युवा भी यह काम कर सकते हैं। और चुनाव की बेला में जागरूकता बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

Share it
Top