बंगाल चुनाव 2026 : 'परिवर्तन' कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक दबी हुई छटपटाहट
लखनऊ से सुंदरबन की खाड़ियों तक का यह सफर केवल एक भौगोलिक दूरी तय करना नहीं था, पश्चिम बंगाल की उस अंतरात्मा को टटोलने की कोशिश थी जो सत्ता के गलियारों और टीवी स्टूडियो की बहसों से कोसों दूर, धूल भरी पगडंडियों और बंद पड़ी मिलों के सन्नाटे में कहीं दबी हुई है। बात पश्चिम बंगाल के चुनाव की आती है, तो एक शब्द बार-बार उभरता— 'परिवर्तन'। यह शब्द किसी राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक दबी हुई छटपटाहट की तरह सुनाई दिया।
पश्चिम बंगाल यात्रा को दौरान लोगों के चेहरे पर एक ऐसी थकावट थी, जैसी उस मुसाफिर के चेहरे पर होती है जो सालों से एक ही रास्ते पर चल रहा हो और अब उसे किसी नए मोड़ की तलाश हो। सिलीगुड़ी पहुँचते-पहुँचते बंगाल की राजनीति के रंग और भी गहरे होने लगे। यहां के दो पत्रकारों, देबाशीष सरकार और इरफान से हुई। देबाशीष सरकार ने बंगाल के 'प्रोज एंड कॉन्स' (पक्ष और विपक्ष) समझाते हुए कहा, एक समय था जब बंगाल को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। यहां संसाधनों की प्रचुरता थी, शिक्षा का स्तर ऊँचा था और औद्योगिक विकास चरम पर था। लेकिन समय के साथ, राजनीतिक उथल-पुथल, लगातार होते रिवॉल्ट और फिर बँटवारे के जख्मों ने बंगाल की कमर तोड़ दी।
देबाशीष सरकार का सबसे बड़ा तर्क 'सीमित संसाधन बनाम बढ़ती आबादी' पर रहा। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि जब आपके पास घर की रोटी गिनी-चुनी हो और बाहर से आने वालों (घुसपैठियों) की तादाद बढ़ती जाए, तो घर के असली हकदारों का हिस्सा कम होना तय है। यही वह भावनात्मक चोट है जो इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनी। जनता को लगता है कि सत्ता ने घुसपैठ पर लगाम कसने के बजाय उसे अपनी राजनीति का औजार बना लिया। कुछ इसी तरह सिलिगुड़ी के वरिष्ठ पत्रकार इरफान ने भी कहा, उत्तर बंगाल में तो हवा पूरी तरह बदलाव की है, लेकिन दक्षिण की राह अभी भी कांटों भरी है।
सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के आस-पास के देहाती इलाकों में जाने पर हकीकत से रूबरू हुए। चाय के उन खूबसूरत बागानों के पीछे एक बेहद कड़वा सच छिपा है। वो महिला मजदूर जो 11-11 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करती हैं, लेकिन दिन के अंत में उनके हाथ में सिर्फ 250 रुपये आते हैं। यह केवल गरीबी नहीं है, यह मानवीय गरिमा का अपमान है। उन बस्तियों में न तो पीने के साफ पानी की व्यवस्था थी और न ही शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा। स्वच्छता के नाम पर वहां सिर्फ धूल और गंदगी का साम्राज्य था। मेडिकल असिस्टेंस तो एक सपना जैसा था। कागजों पर जो 'स्वच्छ भारत' और 'विकसित बंगाल' दिखता है, उसकी असलियत उन मजदूरों की सूजी हुई आँखों और फटी हुई बिवाइयों में दर्ज थी।
मालदा जिले में गंगा के बीच टापुओं पर रहने वाले वो लोग, जिनके घर नदी के कटान में समा गए, आज भी तिरपाल के नीचे रहने को मजबूर हैं। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक 'शून्य' था जैसे- उन्होंने मान लिया हो कि उनकी किस्मत में यही लिखा है।
एक बेहद डरावने वाला पहलू दिखा, भारत-नेपाल की खुली सरहद पर। जहां से बेरोक-टोक लोग एक-दूसरे के देश में दाखिल होते हैं। सवाल उठता है कि अगर नेपाल से आना और जाना इतना आसान है, तो बांग्लादेशी घुसपैठ को रोक पाना कितना मुमकिन होगा? न कोई फेंसिंग, न कोई मुस्तैद सिपाही और न ही कोई सख्त चेकिंग।
नक्सलबाड़ी, जिसका नाम सुनते ही कभी रोंगटे खड़े हो जाते थे, वहां पहुँचकर एक अलग ही अनुभव हुआ। पुराने किस्सों को याद कर मन में एक आशंका थी कि शायद हम वहां से सलामत वापस न आ पाएं, लेकिन जमीनी हकीकत बदली हुई थी। वहां अब खौफ का माहौल नहीं है, चीजें काफी हद तक नियंत्रण में हैं।
कोलकाता का मिजाज बिल्कुल अलग था। राजनीति का शोर सड़कों पर था। हर नुक्कड़ पर पोस्टर और चुनावी गानों की गूँज थी। यहाँ एक अलग तरह की आक्रामकता दिखी। यहाँ भाषा एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा है। लोग हिंदी समझते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से बांग्ला का इस्तेमाल उनकी क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा है। कोलकाता की गलियों में यह महसूस हुआ कि लोग 'परिवर्तन' तो चाहते हैं, लेकिन साथ ही सत्ता की पकड़ और 'दीदी' के प्रभाव को नकारना उनके लिए इतना आसान भी नहीं है।
सफर का एक बेहद संवेदनशील पड़ाव था वह बंद पड़ी जूट मिल। मिल के एक अधिकारी ने दबी जुबान में कहा, " इस मुद्दे को हाथ मत लगाइए। अगर आपने यहाँ की बेरोजगारी और इस बंद मिल की हकीकत दिखाई, तो चुनाव का पूरा गणित पलट सकता है।" यह डर साफ़ बताता है कि रोजगार का अभाव बंगाल की सबसे बड़ी दुखती रग है, जिसे सत्ता छिपाना चाहती है और विपक्ष कुरेदना।
सुंदरबन, जहाँ प्रकृति का सौंदर्य चरम पर है लेकिन इंसान की मजबूरी भी उतनी ही गहरी है। यह दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा है, चारों तरफ पानी का अगाध भंडार है, लेकिन विडंबना देखिए कि लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं है। टैंकरों का इंतज़ार करती वे महिलाएं और चूल्हे के धुएँ में अपनी आँखों की रोशनी गँवाते वे बुजुर्ग, बंगाल की उस विकास यात्रा का हिस्सा हैं जो अभी तक शुरू ही नहीं हुई। सुंदरबन के लोगों ने बड़ी सरलता से कहा- "हम थक चुके हैं, हमें बदलाव चाहिए।"
चुनाव सिर्फ मतों का गणित भर नहीं, यह करोड़ों लोगों के स्वाभिमान, असुरक्षा और उम्मीदों का एक जटिल मिश्रण है। बंगाल आज एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहाँ एक तरफ उसका सुनहरा अतीत आवाज़ दे रहा है और दूसरी तरफ एक अनिश्चित भविष्य उसे डरा रहा है। यह चुनाव संसाधनों की लड़ाई नहीं, यह अपनी जमीन पर अपने हक की लड़ाई, और सबसे बढ़कर यह उस 'पहचान' को बचाने की लड़ाई है जो धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही है। टक्कर निश्चित रूप से तगड़ी थी, लेकिन जीत उसी की हुई, जिसने बंगाल की इस 'भावनात्मक टूटन' और 'बुनियादी जरूरतों' के बीच के पुल को मजबूती से थाम लिया।