सोने से कम कीमती नहीं होती हैं यहाँ के मछुआरों के लिए ये मछलियाँ

Aishwarya Tripathi | Aug 24, 2023, 10:55 IST
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सुंदरबन के सोनागर गाँव के मछुआरे एक बड़ी मछली की उम्मीद में मैंग्रोव की संकरी खाड़ियों में एक लंबी यात्रा पर निकलते हैं। 15 दिन पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं।
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सोने से कम कीमती नहीं होती हैं यहाँ के मछुआरों के लिए ये मछलियाँ
तपती दोपहरी में सोनागर की सड़क पर मछुआरे अपनी मछली पकड़ने की जाल को सुलझाने में लगे हैं। वे मैंग्रोव जंगलों में एक लंबी यात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे हैं, जहाँ नदियों की संकरी खाड़ियों में बड़ी मछली पकड़ने की उम्मीद में जाते हैं।

ये धाराएँ कई तरह के जलीय प्रजातियों का घर हैं, इसलिए मछुआरे यहाँ जाते हैं, लेकिन वे सिर्फ इतना जानते हैं कि जहाँ वे जा रहे हैं वह बंगाल टाइगर्स का शिकारगाह भी है। मछुआरे और उनकी छोटी नावें आसान निशाना बनती हैं।

सोनागर भारतीय सुंदरबन द्वीपसमूह का हिस्सा है - जो बंगाल की खाड़ी में बहने वाली गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के संगम पर स्थित दुनिया के सबसे बड़े मैंग्राेव जंगल का ठिकाना है।

दो मछुआरे मछली पकड़ने का एक बड़ा जाल खोलते हैं। इसके बाद, एक ताज़ा पेंट किया हुआ हरा आइस-बॉक्स सूखने के लिए बाहर रखा जाता है। आगे कुछ और लोगों ने अपना 180 फीट गुणा 25 फीट का जाल फैलाकर छोटे गेंद जैसे नारंगी लंगर को उनके साथ जोड़ लिया। ये मछली पकड़ने के जाल के एक सिरे की मदद से नदियों की सतह पर तैरते रहते हैं। जाल के दूसरे सिरे पर बंधी ईंटें जाल को पानी में डुबा देती हैं।

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एक मछुआरे गुरुपदो मोंडल ने गाँव कनेक्शन को बताया, "सुंदरबन की मछली मानो सोना है।"

पूर्णिमा से छह दिन पहले मोंडल दूसरे लोगों के साथ, जाल तैयार करने के लिए हर दिन 12 घंटे काम कर रहे हैं। उन्हें कम से कम ऐसे 30 जाल तैयार करने होंगे और हर एक को इकट्ठा करने में उन्हें तीन दिन लगेंगे। अमावस्या और पूर्णिमा के बीच ज्वार-भाटे ऊँचे होते हैं। ऐसा तब होता है जब पूर्णिमा का चंद्रमा ढलने लगता है और निम्न ज्वार का संकेत देता है, तभी मछुआरे निकल पड़ते हैं।

“हम तेलेभोला और जावाभोला जैसी बड़ी मछलियों के इंतज़ार में हैं। उनमें से कुछ का वजन लगभग 20 किलो होता है और हमें लगभग 40,000 रुपये मिल सकते हैं, ”मोंडल ने कहा।

मछली पकड़ने के लिए बहुत से लोग यात्रा करते हैं। मछुआरे अपनी नाव बनाने के लिए साल की लकड़ी खरीदने में दो लाख रुपये तक खर्च करते हैं। फिर उन्हें मछली पकड़ने के जाल, रस्सी, चारा और मछली पकड़ने के दूसरे सामान पर भी खर्च करना पड़ता है। उन्हें लागत निकालनी होती है। नाव 15 साल तक चलती है और हर साल छोटी-मोटी मरम्मत की ज़रूरत होती है, जिसकी लागत फिर से 15,000 रुपये से 25,000 रुपये के बीच होती है।

मोंडल, जो ओडिशा में एक इस्पात कारखाने में मजदूर के रूप में काम कर रहे थे, एक दुर्घटना में अपनी एक आँख खोने के बाद सुंदरबन लौट आए।

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“मुझे कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया। मैंने मछली पकड़ने और अपने घर परिवार के करीब रहने का फैसला किया, ”उन्होंने कहा।

बाघ के हमले के ख़तरे के बारे में उन्होंने पल्ला झाड़ते हुए कहा, "बाघ का खतरा तो है, जीवन की वैसे भी क्या गारंटी है।

शहर में बस से भी तो एक्सीडेंट हो सकता है, एक दूसरे मछुआरे कार्तिक जाना ने आगे कहा।

लेकिन उन्हें जंगल की देवी और रक्षक बोनबीबी पर पूरा भरोसा है। वे वन देवी की पूजा करते हैं, उनके लिए खीर बनाते हैं और उन्हें एक नई लाल साड़ी चढ़ाते हैं। मैंग्रोव के अंदर सुंदरी पेड़ पर माला चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लेकर मछली पकड़ने जाते हैं। इनके अनुसार सुंदरी पेड़ पर बोनबीबी का वास होता है।

लेकिन इस बीच एक और प्रथा भी है, जाना की पत्नी रेखा उनके वापस लौटने तक सिंदूर नहीं लगाती हैं।

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“महिलाएँ सिन्दूर लगाना बंद कर देती हैं, क्योंकि किसी को यक़ीन नहीं होता कि उनके पति वापस आएँगे या नहीं। यह प्रथा यह दिखाने के लिए है कि वे पूरी तरह से जानती हैं कि वे अपने पतियों को दोबारा नहीं देख सकेंगी", मछुआरे भूपाल साहू ने गाँव कनेक्शन को बताया। एक और भी नियम यह है कि जब तक मछुआरे घर वापस और सुरक्षित नहीं आ जाते, तब तक उनका परिवार सूरज डूबने के बाद खाना नहीं खाएगा।

मोंडल, जाना और दूसरे लोगों को उम्मीद है कि वे अपनी यात्रा से एक दिन पहले 14 जुलाई तक अपनी नाव ठीक कर लेंगे। इस उम्मीद में हैं कि उन्हें एक बढ़िया मछली मिलेगी जिससे उनमें से हर एक को कम से कम 10,000 रुपये मिलेंगे। वे पाँच बर्फ के बक्से पेंट करते हैं, गोसाबा में स्थानीय बाजार से बर्फ की व्यवस्था करते हैं और 15 दिनों तक चलने के लिए राशन भी ले जाते हैं।

मोंडल और उनके साथी अपने साथ 40 किलो चावल, दाल, आठ किलो आलू और प्याज, पाँच लीटर खाना पकाने का तेल, गैस सिलेंडर चूल्हा और 300 लीटर पीने का पानी ले जाएँगे।

जंगलों में मछली पकड़ने के दौरान वन अधिकारियों को दिखाए जाने वाले नाव लाइसेंस प्रमाणपत्र (बीएलसी) को सावधानी से रखा जाता है। वन विभाग स्थानीय मछुआरों को मैंग्रोव मछली पकड़ने वाले जगह पर जाने के लिए नए लाइसेंस जारी नहीं करता है। मछुआरे बीएलसी मालिकों से अपना लाइसेंस किराए पर लेते हैं जिसके लिए वे उन्हें लगभग एक लाख रुपये का भुगतान करते हैं।

यह सुनिश्चित करने के बाद कि नाव उनके 15 दिनों की यात्रा के लिए आरामदायक हो, मछुआरे अपने घरवालों के साथ समय बिताने के लिए जल्दी से घर लौट जाते हैं। बीच में परिवार से संपर्क नहीं हो पाएगा क्योंकि नाव में कोई नेटवर्क नहीं होता है। उनके होठों पर बस एक प्रार्थना है और बोनबीबी में विश्वास है कि वे सुरक्षित और अच्छी तरह से और मछली पकड़ के साथ वापस आ जाएँगे।

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