Top

मशरूम की खेती की शुरुआत से लेकर बाजार तक पहुंचाने की पूरी जानकारी

मशरूम की खेती की सबसे अच्छी बात होती है, इसकी अलग-अलग किस्मों की खेती साल भर कर सकते हैं। इससे साल भर कमाई होती रहती है।

मशरूम की खेती की शुरुआत से लेकर बाजार तक पहुंचाने की पूरी जानकारी

पिछले कुछ वर्षों में किसानों का रुझान मशरूम की खेती की तरफ तेजी से बढ़ा है, मशरूम की खेती बेहतर आमदनी का जरिया बन सकती है। बस कुछ बातों का ध्यान रखना होता है, बाजार में मशरूम का अच्छा दाम मिल जाता है।

अलग-अलग राज्यों में किसान मशरूम की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं, कम जगह और कम समय के साथ ही इसकी खेती में लागत भी बहुत कम लगती है, जबकि मुनाफा लागत से कई गुना ज्यादा मिल जाता है। मशरूम की खेती के लिए किसान किसी भी कृषि विज्ञान केंद्र या फिर कृषि विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण ले सकते हैं।


विश्व में मशरूम की खेती हजारों वर्षों से की जा रही है, जबकि भारत में मशरूम के उत्पादन का इतिहास लगभग तीन दशक पुराना है। भारत में 10-12 वर्षों से मशरूम के उत्पादन में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इस समय हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना व्यापारिक स्तर पर मशरूम की खेती करने वाले प्रमुख उत्पादक राज्य है।

साल 2019-20 के दौरान भारत में मशरूम का उत्पादन लगभग 1.30 लाख टन हुआ। हमारे देश में मशरूम का उपयोग भोजन व औषधि के रूप में किया जाता है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण और विटामिन जैसे उच्च स्तरीय खाद्य मूल्यों के कारण मशरूम सम्पूर्ण विश्व में अपना एक विशेष महत्व रखता है। भारत में मशरूम को खुम्भ, खुम्भी, भमोड़ी और गुच्छी आदि नाम से जाना जाता है। देश में बेहतरीन पौष्टिक खाद्य के रूप में मशरूम का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा मशरूम के पापड़, जिम का सप्लीमेन्ट्री पाउडर, अचार, बिस्किट, टोस्ट, कूकीज, नूडल्स, जैम (अंजीर मशरूम), सॉस, सूप, खीर, ब्रेड, चिप्स, सेव, चकली आदि बनाए जाते हैं। ये सभी उत्पाद ऑनलाइन भी प्राप्त किए जा सकते हैं। मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए मशरूम की खेती करने की विधि, मशरूम बीज उत्पादन तकनीक, मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षण, मशरूम उत्पादन और प्रसंस्करण इत्यादि विषयों पर किसानों को कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य प्रशिक्षण संस्थाओं द्वारा पूरे वर्ष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मशरूम की खेती के लिए महिलाओं को अधिक प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत राज्य सरकार प्रदेश के किसानों को मशरूम की खेती के लिए लागत का 50 प्रतिशत अनुदान भी दे रही है।

भारत में उगाई जाने वाली मशरूम की किस्में

विश्व में खाने योग्य मशरुम की लगभग 10000 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 70 प्रजातियां हीं खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। भारतीय वातावरण में मुख्य रुप से पांच प्रकार के खाद्य मशरुमों की व्यावसायिक स्तर पर खेती की जाती है। जिसका वर्णन निम्नलिखित है।

सफेद बटन मशरुम

ढींगरी (ऑयस्टर) मशरुम

दूधिया मशरुम

पैडीस्ट्रा मशरुम

शिटाके मशरुम

सफेद बटन मशरूम

भारत में सफेद बटन मशरुम की खेती पहले निम्न तापमान वाले स्थानों पर की जाती थी, लेकिन आजकल नई तकनीकियों को अपनाकर इसकी खेती अन्य जगह पर भी की जा रही है। सरकार द्वारा सफेद बटन मशरूम की खेती के प्रचार-प्रसार को भरपूर प्रोत्साहन दिया जा रहा है। भारत में अधिकतर सफेद बटन मशरुम की एस-11, टीएम-79 और होर्स्ट यू-3 उपभेदों की खेती की जाती है। बटन मशरूम के कवक जाल के फैलाव के लिए 22-26 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। इस तापमान पर कवक जाल बहुत तेजी से फैलता है। बाद में इसके लिए 14-18 डिग्री सेल्सियस तापमान ही उपयुक्त रहता है। इसको हवादार कमरे, सेड, हट या झोपड़ी में आसानी से उगाया जा सकता है।

ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम

ढ़ींगरी (ऑयस्टर) मशरूम की खेती वर्ष भर की जा सकती है। इसके लिए अनुकूल तापमान 20-30 डिग्री सेंटीग्रेट और सापेक्षित आद्र्रता 70-90 प्रतिशत चाहिए। ऑयस्टर मशरूम को उगाने में गेहूं व धान के भूसे और दानों का इस्तेमाल किया जाता है। यह मशरूम 2.5 से 3 महीने में तैयार हो जाता है। इसका उत्पादन अब पूरे भारत वर्ष में हो रहा है। ढ़ींगरी मशरूम की अलग-अलग प्रजाति के लिए अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है, इसलिए यह मशरुम पूरे वर्ष उगाई जा सकती है। 10 कुंतल मशरूम उगाने के लिए कुल खर्च 50 हजार रुपये आता है। इसके लिए 100 वर्गफीट के एक कमरे में रैक लगानी होती है। वर्तमान में ऑयस्टर मशरूम 120 रुपए प्रति किलोग्राम से लेकर एक हजार रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बाजार में बिक जाता है। मूल्य उत्पाद की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।


दूधिया मशरूम

भारत में दूधिया मशरूम को ग्रीष्मकालीन मशरूम के रूप में जाना जाता है, जिसका आकार बड़ा व आकर्षक होता है। यह पैडीस्ट्रा मशरूम की तरह एक उष्णकटिबंधीय मशरूम है। इसकी कृत्रिम खेती के रुप में शुरुआत 1976 में पश्चिम बंगाल में हुई थी। अब, इस दूधिया मशरूम ने कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में लोकप्रियता हासिल की है। उड़ीसा सहित इन राज्यों की जलवायु स्थिति मार्च से अक्तूबर तक दूधिया मशरूम की खेती के लिए उपयुक्त होती है। हालांकि, कुछ राज्यों में किसानों द्वारा पैडीस्ट्रा मशरूम को वरीयता देने के कारण अभी तक इसका व्यवसायीकरण नहीं किया जा सका। वर्तमान में पैडीस्ट्रा मशरूम और शिटाके मशरूम की तरह भारत में दूधिया मशरूम को लोकप्रिय बनाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

पैडीस्ट्रा मशरूम

पैडीस्ट्रा मशरूम को 'गर्म मशरूम' के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत उच्च तापमान पर तेजी से बढ़ने वाला मशरूम है। अनुकूल परिस्थितियों में इसका फसल चक्र 3-4 सप्ताह में पूरा हो जाता है। पैडीस्ट्रा मशरूम में स्वाद, सुगंध, नाजुकता, प्रोटीन और विटामिन और खनिज लवणों की उच्च मात्रा जैसे सभी गुणों का अच्छा संयोजन है, इस कारण इस मशरूम की स्वीकार्यता बहुत अधिक है, और इसकी लोकप्रियता सफेद बटन मशरूम से कहीं भी कम नहीं है। यह भारत के उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि प्रदेशों में उगाया जाता है। इसकी वृद्धि के लिए अनुकूल तापमान 28-35 डिग्री सेल्सियस तथा सापेक्षित आर्द्रता 60-70 प्रतिशत की आवश्यकता होती है।

शिटाके मशरूम

शिटाके मशरूम एक शानदार खाद्य एवं महत्वपूर्ण औषधीय मशरूम है। इसे व्यावसायिक और घरेलू उपयोग के लिए आसानी से उगाया जा सकता है। यह दुनिया में कुल मशरूम उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर आता है। सफेद बटन मशरूम की तुलना में शिटाके मशरूम एक अति स्वादिष्ट और बनावट के अनुसार एक बेशकीमती मशरूम है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और विटामिन (विशेष रूप से विटामिन बी) भरपूर मात्रा में होते हैं। इसमें वसा और शर्करा नहीं होती है इसलिए यह मधुमेह और हृदय रोगियों के उपभोग के लिए बेहतरीन समझा जाता है। इसे सागवान, साल और भारतीय किन्नु वृक्ष की ठोस भूसी पर आसानी से उगा सकते है।

सफेद बटन मशरूम उत्पादन की प्रौद्योगिकी

उत्तरी भारत में सफेद बटन मशरुम की मौसमी खेती करने के लिए अक्तूबर से मार्च तक का समय उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान मशरूम की दो फसलें ली जा सकती हैं। बटन मशरूम की खेती के लिए अनुकूल तापमान 15-22 डिग्री सेंटीग्रेट एवं सापेक्षित आद्रता 80-90 प्रतिशत होनी चाहिए।

मशरूम उत्पादन के लिए सेड/झोपड़ी/हट तैयार करना

सफेद बटन मशरुम की खेती के लिए स्थाई व अस्थाई दोनों ही प्रकार के सेड का प्रयोग किया जा सकता है। जिन किसानों के पास धन की कमी है, वह बांस व धान की पुआल से बने अस्थाई सेड/झोपड़ी का प्रयोग कर सकते हैं। बांस व धान की पराली से 30 Χ22Χ12 (लम्बाई Χचौड़ाई Χऊंचाई) फीट आकार के सेड/झोपड़ी बनाने का खर्च लगभग 30 हजार रुपए आता है, जिसमें मशरूम उगाने के लिए 4 Χ25 फीट आकार के 12 से 16 स्लैब तैयार की जा सकती हैं।


कम्पोस्ट बनाने की विधि

सफेद बटन मशरूम (खुम्ब) की खेती के लिए कम्पोस्ट तैयार करने की दो विधियां प्रचलित हैं। इन दोनों ही विधियों में कम्पोस्ट मिश्रण को बाहर फर्श पर सड़ाया जाता है, जिनमें से एक लघु विधि है, जिसका प्रयोग बड़े फार्मों पर किया जाता है। इस लघु विधि में लगभग दस दिनों बाद कम्पोस्ट मिश्रण को एक खास किस्म के कमरे में भर दिया जाता है, जिसे निर्जीवीकरण चैम्बर या टनल के नाम से जाना जाता है। निर्जीवीकरण चैम्बर का फर्श जालीदार बना होता है, उसमें ब्लोअर (पंखा) द्वारा नीचे से हवा प्रवाहित की जाती है जो समस्त कम्पोस्ट से गुजरती हुई ऊपर की ओर निकल जाती है।

इसी तरह कम्पोस्ट में ब्लोअर द्वारा हवा को लगातार 6-7 दिन तक घुमाया जाता है। इस कम्पोस्ट की उत्पादन क्षमता लम्बी अवधि द्वारा बनाए गए कम्पोस्ट से लगभग दो गुनी होती है। अधिकतर किसानों के पास चैम्बर की सुविधा नहीं है, जो किसान छोटे स्तर पर मशरूम की खेती करते हैं, वह किसान दीर्घ विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने की तकनीक को ही अपनाते हैं। इस विधि से कम्पोस्ट तैयार करना आसान व सस्ता पड़ता है। दीर्घ विधि से कम्पोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया को तीन चरणों में पूरा किया जाता है, जो इस प्रकार है।

दीर्घ अवधि से कम्पोस्ट (खाद) तैयार करने की विधि

कम्पोस्ट बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला नया भूसा जो बारिश में भीगा हुआ न हो प्रयोग में लाया जाना चाहिए। धान की पराली अथवा गेहूं के भूसे के स्थान पर सरसों का भूसा भी प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन सरसों के भूसे के साथ मुर्गी खाद का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। अधिक कम्पोस्ट बनाने के लिए सभी सामग्रियों की मात्रा अनुपात में बढ़ाई जा सकती हैं। किसान खाद (कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट) उपलब्ध न होने की अवस्था में यूरिया की मात्रा अनुपात के अनुसार बढ़ाई जा सकती है। लेकिन ताजे या कच्चे कम्पोस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग 1.6-1.7 प्रतिशत होनी चाहिए। वैज्ञानिक विधि से कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए निम्नलिखित तीन फॉर्मूले विकसित किए गए हैं।

चित्रः प्राकृतिक स्थिति में दीर्घ विधि के तहत तैयार की जा रही कम्पोस्ट खाद

गेहूं का भूसा 300 किलोग्राम, गेहूं की चोकर 30.0 किलोग्राम, जिप्सम 30.0 किलोग्राम, किसान खाद (कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट) 9.0 किलोग्राम, यूरिया 3.6 किलोग्राम, पोटाश 3.0 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट 3.0 किलोग्राम, शीरा (राला) 5.0 किलोग्राम।

गेहूं का भूसा-300 किलोग्राम, मुर्गी खाद-60 किलोग्राम, गेहूं का छानस-7.5 किलोग्राम, जिप्सम-30 किलोग्राम, किसान खाद (कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट) 6 किलोग्राम, यूरिया -2 किलोग्राम, पोटाश-2.9 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट-2.9 किलोग्राम, शीरा-5 किलोग्राम।

सरसों का भूसा -300 किलोग्राम, मुर्गी खाद-60 किलोग्राम, गेहूं का छानस-8 किलोग्राम, जिप्सम-20 किलोग्राम, यूरिया-4 किलोग्राम, सुपर फास्फेट-2 किलोग्राम, शीरा-5 किलोग्राम।


कम्पोस्ट बनाने की समय सूची

सर्वप्रथम भूसे को पक्के फर्श पर अन्यथा किसी साफ स्थान पर लगभग एक फीट मोटी तह के रूप में फैलाकर दो दिन तक पानी से अच्छी तरह से गीला किया जाता है। भूसे पर पानी डालने के साथ-साथ तांगली (जैली) से पलटते रहना चाहिए। इसके बाद नीचे दिए कार्यक्रम के अनुसार कम्पोस्ट बनानी चाहिए।

0-दिन

पहले दिन गीले भूसे को एक फीट मोटी तह में बिछाकर रसायन उर्वरक जैसे 6.0 किलोग्राम किसान खाद, 2.4 किलोग्राम यूरिया, 3.0 किलोग्राम सुपर फास्फेट, 3.0 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश तथा 15 किलोग्राम गेहूं की छानस (चोकर) बिखेर कर अच्छी तरह से मिला दें। इसके बाद भूसे का 5 फीट ऊंचा, 5 फीट चौड़ा और सुविधानुसार लम्बाई में ढ़ेर बना दें। भूसे का ढेर बनाने के 24 घण्टे बाद ही ढेर के अन्दर का तापमान बढ़ने लगता है। ढेर के मध्य भाग में तापमान 70 से 80 डिग्री सेल्शियस और बाहरी हिस्से में तापमान 50 से 60 डिग्री सेल्शियस तक हो जाता है।

6वें दिन (पहली पलटाई)

ढेर के बाहरी भाग हवा में खुले रहने के कारण सूख जाता है जिससे खाद अच्छी तरह से नहीं सड़ती है। खाद की सामग्री के हिस्से को सही तापमान पर पहुंचाने के लिए खाद की पलटाई की जाती है। ढेर की पलटाई करते समय यह ध्यान अवश्य रखें कि ढेर के बाहर का भाग अन्दर तथा अन्दर का भाग बाहर आ जाए तथा बाहर के सूखे भाग पर पानी का हल्का छिड़काव कर दें। इस पलटाई के समय शेष 3.0 किलोग्राम किसान खाद, 1.2 किलोग्राम यूरिया तथा 15 किलोग्राम चोकर मिलाने के बाद ढेर को दोबारा से 0 दिन जैसे आकार में बना दें।

10वें दिन (दूसरी पलटाई)

खाद के ढेर के बाहरी भाग के एक फीट भाग को अलग निकाल कर इस पर पानी का छिड़काव करके पलटाई करते समय ढेर के बीच में डाल दें। इस पलटाई के समय खाद में 5.0 किलोग्राम शीरा 10 लीटर पानी में घोलकर सारे खाद में भली-भांति मिलाकर पहले की तरह ही पुनः ढेर बना दें।

13वें दिन (तीसरी पलटाई)

खाद की दूसरी पलटाई की तरह ही तीसरी पलटाई करें। खाद के बाहर के सूखे भाग पर पानी का हल्का छिड़काव अवश्य करें। खाद में नमी की मात्रा न तो कम और नहीं अधिक होनी चाहिए। इस पलटाई पर खाद में 30.0 किलोग्राम जिप्सम को भी मिला देना चाहिए। खाद के ढेर को ठीक उसी तरह से तोड़ना चाहिए जैसे कि 10वें दिन दूसरी पलटाई पर तोड़ा गया था और फिर पुनः वैसे ही आकार का ढेर बना देना चाहिए।

16वें दिन (चौथी पलटाई)

खाद के ढेर को पलटाई देकर फिर से पहले जैसा ढेर बना देना चाहिए तथा खाद में नमी की उचित मात्रा बनाएं रखें।

19वें दिन (पांचवीं पलटाई), 22वें दिन (छठी पलटाई) एवं 25वें दिन (सातवीं पलटाई)

पांचवी, छठी एवं सातवीं पलटाई में भी चैथी पलटाई की तरह ही खाद के ढेर को पलटाई देकर फिर से पहले जैसा ढेर बनाएं तथा खाद में नमी की उचित मात्रा बनाए रखने का ठीक से ध्यान रखें।

28वें दिन

सातवीं पलटाई के तीन दिन बाद खाद का परीक्षण अमोनिया तथा नमी के लिए किया जाता है। यदि खाद में अमोनिया गैस की बदबू नहीं आ रही है और नमी की मात्रा भी उचित है, तो खाद बीजाई के लिए तैयार समझी जाती है। बीजाई से पहले खाद के ढेर को ठण्डा होने के लिए खोल देना चाहिए। यदि किसी विशेष परिस्थिति में अमोनिया गैस की बदबू खाद में रह गई हो तो हर तीसरे दिन पलटाई दे सकते हैं। मुर्गी की बीट वाली खाद में अमोनिया गैस रहने की सम्भावना रहती है। अमोनिया गैस मशरुम के कवक जाल अथवा बीज के लिए हानिकारक होती है। जब खाद बनकर तैयार हो जाय तो थोड़ी सी खाद को मुट्ठी में लेकर दबा कर देखें। यदि पानी की बंूदें अंगुलियों के बीच से बाहर आती हैं तो समझा जा सकता है कि खाद में नमी की मात्रा पर्याप्त है। यदि अंगुलियों के बीच से पानी बूंदों के बजाय धार के रुप में नीचे गिरता है तो पानी की मात्रा आवश्यकता से अधिक है। ऐसी स्थिति में खाद को खोलकर हवा लगानी चाहिए।


अच्छी मशरूम खाद की पहचान

तैयार की गई कम्पोस्ट खाद गहरे भूरे रंग की दिखाई देती है।

खाद में नमी की मात्रा 60-65 प्रतिशत होनी चाहिए।

खाद में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग 1.75-2.25 प्रतिशत होनी चाहिए।

खाद पूर्णतः अमोनिया गैस की बदबू रहित होनी चाहिए।

खाद कीट एवं रोगाणु रहित होनी चाहिए।

खाद का पीएच मान 7.2-7.8 के बीच होना चाहिए।



यहां से ले सकते हैं स्पॉन (मशरूम का बीज)

मशरुम की खेती में प्रयोग होने वाले बीज को स्पॉन कहते हैं। मशरुम की अधिक पैदावार लेने के लिए बीज शुद्ध व अच्छी किस्म का होना चाहिए। मशरुम की चयनित प्रभेदों के फलने वाले सम्वर्धन (कल्चर) से उत्पन्न स्पॉन का उत्पादन जीवाणु रहित वातावरण में किया जाता है। उच्चतम उत्पादन देने वाले संवर्धन को अन्य स्थानों से मंगवाकर अपने यहां प्रयोगशाला में स्पॉन तैयार कर सकते हैं। स्पॉन की अधिकतम मात्रा कम्पोस्ट के ताजे भार के 0.5-0.75 प्रतिशत पर्याप्त होती है। निम्न स्तर की कम्पोस्ट में माइसीलियम का फैलाव कम होता है। अच्छी किस्म का बीज प्राप्त करने के लिए कम से कम एक माह पहले विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग में बुकिंग करा देनी चाहिए, जिससे समय पर बीज तैयार करके आपको दिया जा सके। उन्नति किस्म के स्पॉन को सुविधा अनुसार निम्नलिखित प्रयोगशालाओं से प्राप्त किया जा सकता है।

खुम्ब अनुसंधान निदेशालय, सोलन, हिमाचल प्रदेश, डॉ यशवंत सिंह परमार बागवानी व वानिकी विश्वविद्यालय, सोलन (हिमाचल प्रदेश), पादप रोग विज्ञान विभाग, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा), बागवानी निदेशालय, मशरूम स्पॉन प्रयोगशाला, कोहिमा, कृषि विभाग, मणिपुर, इम्फाल, सरकारी स्पॉन उत्पादन प्रयोगशाला, बागवानी परिसर, चाउनी कलां, होशियारपुर (पंजाब), विज्ञान समिति, उदयपुर (राजस्थान), क्षेत्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला, सीएसआईआर, श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर), कृषि विभाग, लालमंडी, श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर), पादप रोग विज्ञान विभाग, जवाहर लाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्य प्रदेश), पादप रोग विज्ञान विभाग, असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहट (असम), क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान केन्द्र, धौलाकुआं (हिमाचल प्रदेश), हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय स्पॉन प्रयोगशाला, पालमपुर (हिमाचल प्रदेश), इन सरकारी स्पॉन उत्पादन केन्द्रों के अलावा बहुत से निजी व्यक्ति भी मशरूम बीज उत्पादन से जुड़े हैं जो सोलन, हिसार, सोनीपत, कुरूक्षेत्र (हरियाणा), दिल्ली, पटना (बिहार), मुम्बई (महाराष्ट्र) इत्यादि जगहों पर स्थित हैं।

मशरूम की बीजाई (स्पॉनिंग)

मशरुम उत्पादन के लिए तैयार की गई सेड/झोपड़ी में बनी स्लेबों या बेडों पर पॉलिथीन सीट रखने के बाद 6-8 इंच मोटी कम्पोस्ट खाद की परत बिछा देते हैं, इसके बाद कम्पोस्ट खाद के ऊपर मशरुम के बीज/स्पॉन को मिला देते हैं। सौ किलोग्राम कम्पोस्ट खाद की बीजाई के लिए 500-750 ग्राम बीज पर्याप्त रहता है। स्पॉन की बीजाई करने के बाद पॉलिथीन सीट से ढक देना चाहिए।

खाद के ऊपर स्थापित स्पॉन का कवक जाल

बीज रखने में सावधानियां

मशरुम का बीज 40 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक तापमान पर 48 घंटे में मर जाता है, तथा बीज में सड़ने की बदबू भी आने लगती है। गर्मियों के समय में बीज को रात्रि में लेकर आना चाहिए। यदि सम्भव हो सके तो थर्मोकोल के बने डिब्बे में बीज की बोतलों या लिफाफों के साथ बर्फ के टुकड़ों को रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर आएं। बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए वातानुकूल वाहन को इस्तेमाल में लाया जाए तो अधिक तापमान से होने वाली हानि से बचा जा सकता है।

बीज का भण्डारण

मशरुम का ताजा बना हुआ बीज कम्पोस्ट में शीघ्रता से फैलता है और मशरुम शीघ्र निकलने शुरू हो जाने के कारण पैदावार में वृ़द्धि होती है। फिर भी किसी परिस्थिति के कारण बीज का भंडारण करना आवश्यक हो जाता है तो मशरुम के बीज को 15-20 दिन के लिए रेफ्रीजरेटर में भंडारण करके खराब होने से बचाया जा सकता है।

केसिंग मिश्रण

वह कोई भी पदार्थ जो पानी को शीघ्र ही अवशोषित करके धीरे-धीरे छोड़े और भुरभुरा हो, केसिंग के लिए उपयुक्त समझा जाता है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के अनुसंधान से पता चला है कि चावल के छिलके की राख (बायलर की राख) एवं जोहड़ की मिट्टी को 1ः1 भार के अनुपात में तैयार किया गया मिश्रण एक अच्छी गुणवत्ता की केसिंग होती है। केसिंग मिश्रण का निर्जीवीकरण करने के लिए 2-3 प्रतिशत फॉर्मलीन के घोल से तर करके पॉलिथीन सीट से 3-4 दिन के लिए ढक देना चाहिए। केसिंग मिश्रण से पॉलिथीन सीट को हटाकर इसे पलटना चाहिए, जिससे फॉर्मलीन की गंध बाहर निकाल जाय। जब खाद के ऊपर स्पॉन का कवक जाल पूरी तरह से स्थापित हो जाए तो उसके ऊपर केसिंग की 1.0-1.5 इंच मोटी परत बिछाई जाती है। केसिंग मशरुम की वानस्पतिक वृद्धि में सहायक होती है। केसिंग करने के बाद खाद में उचित मात्रा में नमी बनी रहती है। केसिंग न करने की स्थिति में मशरुम बहुत ही कम मात्रा में निकलते हैं जिससे आर्थिक हानि होती है।

हवा का संचालन

कम्पोस्ट खाद में कवकजाल फैलते समय एक या दो बार शुद्ध हवा का देना आवश्यक होता है, तथा कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। पिन हेड बनने के लिए कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा 0.08 प्रतिशत से ज्यादा न हो तथा मशरुम निकलते समय इसकी मात्रा 0.08-0.1 प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि पिन बनने के समय तथा बाद में हवा का संचालन अच्छी प्रकार होना चाहिए। सफेद बटन मशरुम की खेती करने के लिए अच्छे कम्पोस्ट के अतिरिक्त फसल का अच्छा प्रबन्धन किया जाए तो अच्छी गुणवत्ता वाला अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

फ्रूटिंग और तुड़ाई

केसिंग की परत चढ़ाने के 12-15 दिन बाद कम्पोस्ट खाद के ऊपर मशरुम की छोटी-छोटी कलिकाऐं दिखाई देने लगती हैं जो 4-5 दिन में विकसित होकर छोटी-छोटी श्वेत बटन मशरुम में परिवर्तित हो जाती हैं। जब इन श्वेत बटन मशरुमों का आकार 4-5 सेंटीमीटर का हो जाए तो इन्हें परिपक्व समझते हुए थोड़ा सा घुमाकर तोड़ लेना चाहिए। तुड़ाई के पश्चात् सफेद बटन मशरुम को शीघ्र ही उपयोग में ले लेना चाहिए क्योंकि यह जल्दी ही खराब होने लगती है। सबसे प्रमुख बात यह है कि प्रयोग किए गए 10.00 किलोग्राम सूखे भूसे से बनी कम्पोस्ट खाद से लगभग 5.00 किलोग्राम श्वेत बटन मशरुम प्राप्त की जा सकती है।

(मंगल सिंह, अनुज कुमार, रनबीर सिंह टाया , ओम प्रकाश अहलावत, सत्यवीर सिंह एवं रमेश चन्द, भाकृअनुप-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल, राज्य बागवानी सलाहकार (मशरूम), हरियाणा)

ये भी पढ़ें: मशरूम उत्पादन का हब बन रहा यूपी का ये जिला, कई प्रदेशों से प्रशिक्षण लेने आते हैं किसान

ये भी पढ़ें: उत्तराखंड में पलायन को रोकने के लिए दिव्या रावत बनीं 'मशरूम गर्ल'






Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.