एक ऐसा बायो-स्प्रे जिसको छिड़कते ही खेत के पास भी नहीं आते हैं छुट्टा पशु

तमिलनाडु का एक स्टार्टअप बायो-लिक्विड स्प्रे लेकर आया है जो उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के किसानों को आवारा पशुओं को फसलों को नुकसान पहुंचाने से बचाने में मदद कर रहा है। हर्बोलिव+ पूरी तरह से प्राकृतिक उत्पादों से बना है, इसके इस्तेमाल से जंगली और आवारा जानवर फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

Ashish AnandAshish Anand   29 Sep 2022 9:01 AM GMT

एक ऐसा बायो-स्प्रे जिसको छिड़कते ही खेत के पास भी नहीं आते हैं छुट्टा पशु

हर्बोलिव+ एक बायो-लिक्विड है जिसका निर्माण तमिलनाडु स्थित MIVIPRO नामक स्टार्टअप द्वारा किया गया है और कोयंबटूर स्थित तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) द्वारा परीक्षण और प्रमाणित किया गया है। सभी फोटो: अरेंजमेंट

पिछले साल से पहले, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक 20 वर्षीय किसान नितेश कुमार को आवारा पशुओं और जंगली जानवरों के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ता था। लेकिन जबसे उन्होंने हर्बोलिव+ स्प्रे का इस्तेमाल करना शुरू किया, उनका नुकसान बिल्कुल कम हो गया है।

"मुझे जंगली जानवरों जैसे नीलगाय, शाही, जंगली सूअर, मोर के मेरे खेतों में घुसने और चरने के कारण 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता था। फिर मैंने अपने खेत में हरबोलिव+ का छिड़काव किया और परिणाम से हैरान रह गया, "नितेश कुमार, जो बस्ती जिले के बनकटी ब्लॉक के घुघसा गाँव में अपनी 1.5 बीघा [0.3 हेक्टेयर] भूमि पर गेहूं और धान की खेती करते हैं, ने गाँव कनेक्शन को बताया।

"हर्बोलिव+ ने मेरे खेत को जानवरों के नुकसान से बचाया। साथ ही, अनाज का उत्पादन भी अच्छा हुआ और यूरिया और अन्य उर्वरकों की जरूरत कम हो गई, "उन्होंने कहा।

कुमार उन पहले कुछ किसानों में से थे, जिन्हें देश भर में ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाले दिल्ली स्थित गैर-सरकारी संगठन ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन (TRIF) द्वारा बायो-स्प्रे प्रदान किया गया था।एक ऐसा बायो-स्प्रे जिसको छिड़कते ही खेत के पास भी नहीं आते हैं छुट्टा पशु।


किसान नितेश कुमार ने आगे कहा, "मैंने सोचा कि स्प्रे एक बेहतरीन स्प्रे है जो हमारी समस्याओं को खत्म करने का एक अच्छा उपाय है और किसानों को इसके बारे में पता होना चाहिए, इसलिए मैंने लोगों को इसका इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया और उन्हें इसके उपयोग के बारे में भी प्रशिक्षित किया।"

बहुत कारगर है हर्बोलिव+ स्प्रे

हर्बोलिव+ एक बायो-लिक्विड है जिसका निर्माण तमिलनाडु स्थित MIVIPRO नामक स्टार्टअप द्वारा किया गया है और कोयंबटूर स्थित तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) द्वारा परीक्षण और प्रमाणित किया गया है।

उत्तर प्रदेश में MIVIPRO के क्लस्टर डेवलपमेंट मैनेजर गौरव मिश्रा ने गाँव कनेक्शन को बताया कि हर्बोलिव+ स्प्रे पूरी तरह से प्राकृतिक उत्पादों से बना हुआ है।"

मिश्रा ने आगे कहा, "यह फसलों की खुशबू को कम कर देता है करता है और उन्हें बिना नुकसान पहुंचाए और फसल की गुणवत्ता और पर्यावरण को प्रभावित किए बिना जंगली और आवारा जानवरों से फसलों को बचाता है।"

"यह फसलों को कीटों, कीड़ों और कवक रोगों से भी बचाता है, फसलों की जैविक प्रकृति को बनाए रखता है, और मिट्टी की उर्वरता और अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता और स्वाद में सुधार करता है, "उन्होंने कहा।

प्रायोगिक परीक्षण चरण के दौरान, ड्रोन की मदद से हर्बोलिव+ का छिड़काव किया जाता है, जिसके बाद किसान खुद से छिड़काव करते हैं।

किसानों को भा रहा बायो-स्प्रे

नितेश कुमार को 'कृषि उद्यमी' के रूप में नामित किया गया है, जिन्हें बायो-स्प्रे तरल Herboliv+ के वितरण और बिक्री के लिए सम्मानित किया गया है।

"मैंने किसानों के बीच इस स्प्रे की काफी मांग देखी, किसान इसे काफी पसंद कर रहे हैं, इसलिए मैंने इसकी मार्केटिंग एजेंसी ले ली। मुझे पचास रुपये प्रति लीटर की कीमत पर स्प्रे मिलता है और इसे सत्तर रुपये प्रति लीटर बेचता हूं। मेरे गाँव और उसके आसपास इस स्प्रे की लगभग 500 लीटर की मांग है।"

"अगर कोई किसान मुझसे इसे खरीदता है तो मैं इसे पहली बार अपने खेत में स्प्रे करता हूं और उन्हें इसके बारे में सिखाता हूं। किसान और मैं दोनों इससे लाभ कमाते हैं, "कुमार ने कहा।

28 वर्षीय किसान अनीता उन 225 गाँवों के किसानों में शामिल हैं, जो वर्तमान में बनकटी में हरबोलिव+ स्प्रे का उपयोग कर रहे हैं।

प्रायोगिक परीक्षण चरण के दौरान, ड्रोन की मदद से हर्बोलिव+ का छिड़काव किया जाता है, जिसके बाद किसान खुद से छिड़काव करते हैं।

"मैंने अपने कुल 8 बीघे में से एक बीघा खेत पर स्प्रे किया, जिस पर मैं खेती करता हूं। मैंने हर्बोलिव+ छिड़काव वाले खेत में अधिक हरियाली देखी और एक भी फसल को जानवरों ने बर्बाद नहीं की। अन्य खेतों की तुलना में, मुझो स्प्रे की मदद से डेढ़ क्विंटल [100 किलोग्राम] अधिक गेहूं का उत्पादन मिला। अच्छे परिणाम मिलने के बाद, मैंने हर दीदी (महिला किसान) को इसके बारे में बताया और उन्हें अपने खेत दिखाए, "अनीता ने गाँव कनेक्शन को बताया।

"इस खरीफ [गर्मी] के मौसम में, मैंने दो बीघा धान के खेतों में छिड़काव किया। कम बारिश के बाद इस मानसून में स्प्रे के उपयोग से मेरी फसलें अभी भी हरी है। साथ ही अब तक जानवरों और कीड़ों ने नष्ट नहीं किया गया है। मुझे पिछले साल की तुलना में इस साल अच्छी फसल मिलेगी।"

हर्बोलिव + स्प्रे मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाता है, उत्पादन में भी बढ़िया मिलता है।

MIVIPRO के गौरव मिश्रा के अनुसार, स्प्रे का इस्तेमाल एक महीने से अधिक की सभी फसलों के लिए किया जा सकता है। "एक एकड़ खेत के लिए औसत उपयोग चौदह लीटर हर्बोलिव+ है। पहले महीने में, हर हफ्ते एक स्प्रे और उसके बाद हर 15 दिनों में एक स्प्रे की जरूरत होती है। एक फसल के लिए कम से कम चार स्प्रे की जरूरत होती है। स्प्रे केवल सुबह या शाम में करना चाहिए। हमारी जानकारी में हर्बोलिव से कोई नुकसान नहीं हुआ है, "उन्होंने कहा।

बायो-स्प्रे उत्पादक स्टार्ट-अप के पदाधिकारी ने बताया कि परियोजना के प्रारंभिक चरण में, उन्होंने उत्तर प्रदेश के उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जो आवारा और जंगली जानवरों से गंभीर रूप से प्रभावित हैं और फिर उस संगठन की तलाश शुरू कर दी उस क्षेत्र के किसानों को जमीनी स्तर पर जो सीधे काम कर रहा है।

"इस दौरान हम टीआरआईएफ के पास आए और उत्तर प्रदेश में बस्ती के बनकटी ब्लॉक में अपना पहला ऑपरेशन शुरू किया। फिर हमने लखीमपुर और बहराइच में भी अपने ऑपरेशन का विस्तार किया। वर्तमान में हम लगभग 1,000 किसानों के साथ काम कर रहे हैं, "मिश्रा ने कहा।


टीआरआईएफ ने स्वयं सहायता समूह के सदस्यों और स्टार्ट-अप के लिए एक बैठक मंच प्रदान किया है। क्लस्टर स्तर का महासंघ अब जागरूकता कार्यक्रमों का नेतृत्व करता है और किसानों को हर्बोलिव+ का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें उपयोग और स्प्रे के लिए भी प्रशिक्षित करता है।

"पायलट परीक्षण के दौरान जिसमें हमने एक ड्रोन का इस्तेमाल किया, हमने देखा कि जिन खेतों में हर्बोलिव+ का छिड़काव किया जाता है, वे जानवरों से अछूते थे, फसलें हरी दिखती थीं, और तनों की संख्या 30 से 50 अधिक थी। बगल के खेत में जहां हर्बोलिव+ का छिड़काव नहीं किया गया था, जानवरों ने चर ली थी, कम हरा था, और तनों की संख्या 12 से 15 थी, "बनकटी में टीआरआईएफ के ब्लॉक मैनेजर शेखर आनंद ने गाँव कनेक्शन को बताया।

बनकटी के रौता गाँव की 50 वर्षीय किसान किस्मती देवी आनंद की बात से सहमत थीं। "पिछले साल मैंने जानवरों के कारण तीन से चार क्विंटल खोने के बाद एक बीघा में पांच से छह क्विंटल धान की कटाई की थी। सूखे जैसी स्थिति के बाद इस बार मुझे एक बीघा में लगभग 10 से 11 क्विंटल अच्छी फसल की उम्मीद है। इससे मुझे 5,000 से 7,000 रुपये का फायदा होगा। मैंने अपने खेत में चार बार 12 लीटर स्प्रे किया, "उन्होंने कहा।

यह कहानी ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से प्रकाशित की गई है।


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