Goat Farming: 5 Star जैसा बकरी फ़ार्म, जहाँ बकरियाँ पीती हैं RO का पानी, पढ़ें पूरी स्टोरी
Gaurav Rai | Jan 16, 2026, 18:12 IST
गाँव कनेक्शन पहुँचा आगरा के एक ऐसे आधुनिक बकरी फ़ार्म में, जहाँ बकरियों को RO का पानी, साफ़ वातावरण और बेहतर देखभाल मिलती है। फ़ार्म में हज़ारों बकरियाँ हैं और हर बकरी का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है। बकरी पालन से दूध, खाद और ट्रेनिंग के ज़रिए रोज़गार और अच्छी आमदनी हो रही है।
क्या आपने कभी देखा है कि बकरियाँ RO का पानी पीती हों, ठंड में उन्हें गर्म पानी दिया जाता हो और हरे लॉन जैसी घास पर वे आराम से टहलती हों? उत्तर भारत में स्थित एक बकरी फ़ार्म ऐसा ही है, जिसे लोग अब भारत का सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक बकरी फ़ार्म कहने लगे हैं। इस फ़ार्म के मालिक हैं डी. के. सिंह, जहाँ करीब 5,000 बकरियाँ हैं और पूरी व्यवस्था को संभालने के लिए 70 लोगों की टीम दिन-रात काम कर रही है। फ़ार्म की कुल क्षमता लगभग 7,000 बकरियों की है।
डी.के.सिंह बताते हैं कि एनिमल हसबेंड्री का काम बहुत ज़िम्मेदारी वाला होता है। “अगर बकरी आज बीमार है तो दवा आज ही देनी होगी। अगर वह गर्भवती है, तो उसी दिन उसके खाने में बदलाव करना पड़ता है। इसे कल पर नहीं छोड़ा जा सकता।” उनका कहना है कि बकरी पालन में ज़्यादातर बीमारियाँ वायरल होती हैं। अगर एक जानवर बीमार हुआ और समय पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वह कई अन्य जानवरों को भी बीमार कर सकता है।
फ़ार्म में मुख्य रूप से तीन नस्लों की बकरियाँ पाली जाती हैं, सोजत नस्ल, अफ़्रीकन बोअर और कोटा नस्ल। डी. के. सिंह ने बताया कि उनकी कोशिश रहती है कि हर जानवर स्वस्थ रहे और उसकी ग्रोथ सही तरीके से हो। फ़ार्म की बकरियाँ 7 से 10 महीने की उम्र में ही 70 से 80 किलो तक वज़न पकड़ लेती हैं। मादा बकरियों की ब्रीडिंग और दूध उत्पादन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
फ़ार्म की आमदनी के कई स्रोत हैं। बकरियों के दूध से घी और चीज़ तैयार की जाती है। हालांकि, ज़्यादातर बकरी का दूध उनके बच्चों को ही पिलाया जाता है ताकि उनकी ग्रोथ बेहतर हो सके। इसके अलावा गोट मैन्योर की भी देशभर में भारी माँग है। खासतौर पर सब्ज़ी और ड्रैगन फ़्रूट उगाने वाले किसान इसे ख़रीदते हैं। डी. के. सिंह बताते हैं कि – “हम साल भर में लगभग 20 से 25 लाख रुपये की खाद बेच लेते हैं।”
फ़ार्म में 10,000 लीटर प्रति घंटे की क्षमता वाला RO प्लांट लगा है। बकरियों को 150 टीडीएस से कम वाला साफ़ पानी दिया जाता है। सर्दियों में बकरियों के लिए बॉयलर से पानी गर्म किया जाता है, जिसमें गुड़ मिलाकर पिलाया जाता है। इससे उनका पाचन सही रहता है और बीमारियाँ कम होती हैं।
फ़ार्म की हर बकरी के कान में नंबर लगा होता है। यह नंबर उसका पूरा रिकॉर्ड बताता है कब बीमार हुई, कब टीका लगा, कितने बच्चे हुए और उसकी ब्रीडिंग हिस्ट्री क्या है। डी. के. सिंह बताते हैं कि अगर कोई किसान यहाँ से बकरी ख़रीदता है, तो उसे भी रिकॉर्ड रखने की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि भविष्य में जेनेटिक समस्याएँ न हों। इसके अलावा बकरियाँ दो साल में तीन बार बच्चे देती हैं। कुल मिलाकर एक बकरी से लगभग पाँच बच्चे मिल जाते हैं।
डी. के. सिंह का एक युवान एग्रो रिसर्च इंस्टिट्यूट भी है, जो एनएसडीसी से अप्रूव्ड है। यहाँ अब तक 700 से 800 प्रगतिशील किसानों को बकरी पालन की ट्रेनिंग दी जा चुकी है। यह सर्टिफ़िकेट लोन और सरकारी योजनाओं में भी मान्य होता है।
डी. के. सिंह ने बताया कि जब उन्होंने बकरी पालन शुरू किया था, तो समाज और परिवार की ओर से काफ़ी विरोध हुआ। “लोग कहते थे कि गाय पालो, बकरी नहीं। लेकिन मेरे अंदर पैशन था और आज वही बकरी पालन मेरी पहचान बन गया है, आज देशभर से लोग इस फ़ार्म को देखने और सीखने आते हैं।”
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बकरी पालन में सबसे ज़रूरी है समय पर देखभाल
तीन नस्लों पर किया जा रहा है काम
दूध, खाद और ट्रेनिंग से होती है कमाई
RO पानी और सर्दियों में गर्म पानी की व्यवस्था
हर बकरी का अलग नंबर, पूरा रिकॉर्ड
किसानों को भी दी जा रही है ट्रेनिंग
समाज का विरोध, फिर भी नहीं छोड़ा सपना
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