पेड़ बचाएँगे खेत: कैसे एग्रोफॉरेस्ट्री बदल रही है छोटे किसानों की किस्मत
Gaon Connection | Jan 10, 2026, 14:35 IST
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ओडिशा के रायगड़ा ज़िले के पहाड़ी इलाक़ों से सामने आया एक वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि ज़मीन की ढलान और पेड़ों का सही चुनाव खेती और जलवायु, दोनों के लिए निर्णायक हो सकता है। Frontiers in Agronomy और ICAR के शोध दिखाते हैं कि छोटे खेतों पर एग्रोफॉरेस्ट्री न सिर्फ़ कार्बन अवशोषण बढ़ाती है, बल्कि मिट्टी को बचाकर किसानों की आमदनी को भी स्थिर बनाती है।
<p>ओडिशा के पहाड़ी इलाक़ों से आई एग्रोफॉरेस्ट्री की सीख<br></p>
भारत के पहाड़ी और आदिवासी इलाक़ों में खेती आज एक गहरे संकट के दौर से गुज़र रही है। बदलता मौसम, अनिश्चित बारिश, लगातार बढ़ता तापमान और मिट्टी का तेज़ कटाव इन क्षेत्रों की खेती को हर साल ज़्यादा असुरक्षित बनाता जा रहा है। जिन इलाक़ों में कभी जंगल, पानी और उपजाऊ ज़मीन जीवन का सहारा हुआ करते थे, वहीं आज वही संसाधन सबसे पहले दबाव में नज़र आते हैं।
ओडिशा का रायगड़ा ज़िला, जो पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, इस बदलाव की की एक साफ तस्वीर पेश करता है। यहाँ ज़मीन ज़्यादातर ढलानदार है, खेत छोटे हैं और खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहती है। थोड़ी सी बारिश कम हो जाए, तो फसल सूखने लगती है और अगर बारिश ज़्यादा हो जाए, तो मिट्टी बह जाती है। ऐसे हालात में खेती को टिकाऊ बनाए रखना और किसानों की आमदनी को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
इसी चुनौती के बीच वैज्ञानिक शोध यह संकेत देने लगे हैं कि समाधान केवल नई तकनीक या ज़्यादा इनपुट्स में नहीं, बल्कि ज़मीन और प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने में छिपा है। इसी संदर्भ में Frontiers in Agronomy पत्रिका में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन एग्रोफॉरेस्ट्री, यानी पेड़ों के साथ खेती, को एक प्रभावी समाधान के रूप में सामने लाता है। यह अध्ययन विशेष रूप से यह समझने की कोशिश करता है कि पहाड़ी इलाक़ों में ज़मीन की ढलान पेड़ों की वृद्धि, जैवभार उत्पादन, कार्बन भंडारण और व्यापक पारिस्थितिक लाभों को किस तरह प्रभावित करती है। यह शोध दिखाता है कि ढलान केवल भूगोल नहीं है, बल्कि खेती और पर्यावरण के भविष्य को तय करने वाला एक अहम कारक है।
अध्ययन के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में ऊपरी, मध्य और निचली ढलान पर स्थित ज़मीन की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। ऊपरी ढलान पर मिट्टी आमतौर पर पतली होती है और बारिश का पानी तेज़ी से नीचे की ओर बह जाता है। इससे नमी ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाती और पोषक तत्व भी मिट्टी में नहीं रुकते। ऐसे हालात में पेड़ों की बढ़त सीमित रहती है। मध्य ढलान पर हालात थोड़े बेहतर होते हैं, लेकिन यहाँ भी पानी और पोषक तत्वों की उपलब्धता पूरी तरह स्थिर नहीं रहती। इसके विपरीत निचली ढलान पर ऊपर से बहकर आई मिट्टी, पानी और जैविक पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे ज़मीन ज़्यादा उपजाऊ बनती है और पेड़ों को बढ़ने के लिए बेहतर वातावरण मिलता है।
इसी सिद्धांत को ज़मीन पर परखने के लिए रायगड़ा ज़िले के तीन इको-विलेज़ में साल 2015 से एक एकड़ के पारिवारिक खेतों पर एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल लागू किया गया। इस मॉडल में आम, काजू, नीम, सिमारूबा, कैसिया जैसी कुल बारह बहुउद्देशीय पेड़ प्रजातियों को फसलों के साथ लगाया गया। इन पेड़ों को अलग-अलग ढलानों पर लगाया गया और पूरे नौ वर्षों तक उनकी ऊँचाई, तने की मोटाई, फैलाव, जैवभार और कार्बन भंडारण का नियमित अध्ययन किया गया। यह लंबी अवधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पेड़ों के पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ कुछ वर्षों में नहीं, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे सामने आते हैं।
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अध्ययन के नतीजों से यह साफ़ हुआ कि निचली ढलान पर लगाए गए पेड़ों की बढ़त सबसे बेहतर रही। इन पेड़ों की औसत ऊँचाई अधिक पाई गई, उनका छत्र ज़्यादा फैला हुआ था और कुल जैवभार भी अधिक दर्ज किया गया। इसका सीधा अर्थ यह है कि निचली ढलान पर स्थित ज़मीन पेड़ों को बेहतर ढंग से पोषण देती है। इसके उलट ऊपरी ढलान पर पेड़ों की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अगर ढलान को नज़रअंदाज़ करके पेड़ लगाए जाएँ, तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू कार्बन भंडारण से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने पाया कि एक एकड़ के इस एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल में पेड़ों ने बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर संचित किया और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में मदद की। फलदार पेड़ जैसे आम और काजू कार्बन संग्रह के मामले में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुए, जबकि कुछ अन्य प्रजातियों ने तेज़ी से जैवभार बढ़ाकर इस प्रक्रिया को मज़बूत किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि खेती केवल उत्सर्जन का स्रोत नहीं है, बल्कि सही ढंग से की जाए तो वह जलवायु परिवर्तन को कम करने का एक अहम साधन भी बन सकती है।
कार्बन के अलावा इस मॉडल का असर मिट्टी की सेहत पर भी पड़ा। अध्ययन में देखा गया कि एग्रोफॉरेस्ट्री अपनाने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी, जिससे उसकी उर्वरता बेहतर हुई। मिट्टी की संरचना में सुधार हुआ और पानी रोकने की क्षमता बढ़ी। ढलानदार इलाक़ों में यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मिट्टी का कटाव खेती की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मज़बूती से बाँधकर रखती हैं, जिससे बारिश के दौरान बहाव कम होता है और ज़मीन लंबे समय तक खेती के लायक बनी रहती है।
इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल केवल पर्यावरणीय लाभ नहीं देता, बल्कि किसानों की आजीविका को भी मज़बूती देता है। फसलों के साथ-साथ पेड़ों से मिलने वाले फल, लकड़ी और अन्य उत्पाद किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बनते हैं। इससे खेती का जोखिम बँट जाता है और मौसम की मार से होने वाले नुकसान का असर कम होता है। लंबे समय में यह मॉडल किसानों को ज़्यादा स्थिर और सुरक्षित आमदनी की ओर ले जाता है।
इन निष्कर्षों से एक बड़ी तस्वीर उभरकर सामने आती है। पहाड़ी और ढलानदार इलाक़ों में खेती का भविष्य केवल उन्नत बीज या रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रह सकता। वहाँ ज़मीन की बनावट, ढलान और प्राकृतिक जल प्रवाह को समझना उतना ही ज़रूरी है। सही ढलान पर सही पेड़ लगाकर खेती को पेड़ों से जोड़ा जाए, तो इससे मिट्टी बचती है, पानी संरक्षित रहता है, वातावरण से कार्बन कम होता है और किसान को दीर्घकालिक सहारा मिलता है।
रायगड़ा ज़िले में किया गया यह अध्ययन इस बात का ठोस प्रमाण देता है कि छोटे खेत, जिन्हें अक्सर सीमित संसाधनों वाला माना जाता है, सही योजना और वैज्ञानिक समझ के साथ जलवायु समाधान का अहम हिस्सा बन सकते हैं। यह शोध बताता है कि टिकाऊ खेती का रास्ता प्रकृति से टकराने में नहीं, बल्कि उसे समझने और उसके साथ तालमेल बिठाने में है। जब पेड़, ढलान और किसान एक साथ आते हैं, तो वे न केवल अपनी ज़मीन और आजीविका बचाते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अधिक सुरक्षित और संतुलित भविष्य की नींव रखते हैं।
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ओडिशा का रायगड़ा ज़िला, जो पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, इस बदलाव की की एक साफ तस्वीर पेश करता है। यहाँ ज़मीन ज़्यादातर ढलानदार है, खेत छोटे हैं और खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहती है। थोड़ी सी बारिश कम हो जाए, तो फसल सूखने लगती है और अगर बारिश ज़्यादा हो जाए, तो मिट्टी बह जाती है। ऐसे हालात में खेती को टिकाऊ बनाए रखना और किसानों की आमदनी को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
इसी चुनौती के बीच वैज्ञानिक शोध यह संकेत देने लगे हैं कि समाधान केवल नई तकनीक या ज़्यादा इनपुट्स में नहीं, बल्कि ज़मीन और प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने में छिपा है। इसी संदर्भ में Frontiers in Agronomy पत्रिका में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन एग्रोफॉरेस्ट्री, यानी पेड़ों के साथ खेती, को एक प्रभावी समाधान के रूप में सामने लाता है। यह अध्ययन विशेष रूप से यह समझने की कोशिश करता है कि पहाड़ी इलाक़ों में ज़मीन की ढलान पेड़ों की वृद्धि, जैवभार उत्पादन, कार्बन भंडारण और व्यापक पारिस्थितिक लाभों को किस तरह प्रभावित करती है। यह शोध दिखाता है कि ढलान केवल भूगोल नहीं है, बल्कि खेती और पर्यावरण के भविष्य को तय करने वाला एक अहम कारक है।
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अध्ययन के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में ऊपरी, मध्य और निचली ढलान पर स्थित ज़मीन की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। ऊपरी ढलान पर मिट्टी आमतौर पर पतली होती है और बारिश का पानी तेज़ी से नीचे की ओर बह जाता है। इससे नमी ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाती और पोषक तत्व भी मिट्टी में नहीं रुकते। ऐसे हालात में पेड़ों की बढ़त सीमित रहती है। मध्य ढलान पर हालात थोड़े बेहतर होते हैं, लेकिन यहाँ भी पानी और पोषक तत्वों की उपलब्धता पूरी तरह स्थिर नहीं रहती। इसके विपरीत निचली ढलान पर ऊपर से बहकर आई मिट्टी, पानी और जैविक पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे ज़मीन ज़्यादा उपजाऊ बनती है और पेड़ों को बढ़ने के लिए बेहतर वातावरण मिलता है।
इसी सिद्धांत को ज़मीन पर परखने के लिए रायगड़ा ज़िले के तीन इको-विलेज़ में साल 2015 से एक एकड़ के पारिवारिक खेतों पर एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल लागू किया गया। इस मॉडल में आम, काजू, नीम, सिमारूबा, कैसिया जैसी कुल बारह बहुउद्देशीय पेड़ प्रजातियों को फसलों के साथ लगाया गया। इन पेड़ों को अलग-अलग ढलानों पर लगाया गया और पूरे नौ वर्षों तक उनकी ऊँचाई, तने की मोटाई, फैलाव, जैवभार और कार्बन भंडारण का नियमित अध्ययन किया गया। यह लंबी अवधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पेड़ों के पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ कुछ वर्षों में नहीं, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे सामने आते हैं।
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अध्ययन के नतीजों से यह साफ़ हुआ कि निचली ढलान पर लगाए गए पेड़ों की बढ़त सबसे बेहतर रही। इन पेड़ों की औसत ऊँचाई अधिक पाई गई, उनका छत्र ज़्यादा फैला हुआ था और कुल जैवभार भी अधिक दर्ज किया गया। इसका सीधा अर्थ यह है कि निचली ढलान पर स्थित ज़मीन पेड़ों को बेहतर ढंग से पोषण देती है। इसके उलट ऊपरी ढलान पर पेड़ों की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अगर ढलान को नज़रअंदाज़ करके पेड़ लगाए जाएँ, तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू कार्बन भंडारण से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने पाया कि एक एकड़ के इस एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल में पेड़ों ने बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर संचित किया और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में मदद की। फलदार पेड़ जैसे आम और काजू कार्बन संग्रह के मामले में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुए, जबकि कुछ अन्य प्रजातियों ने तेज़ी से जैवभार बढ़ाकर इस प्रक्रिया को मज़बूत किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि खेती केवल उत्सर्जन का स्रोत नहीं है, बल्कि सही ढंग से की जाए तो वह जलवायु परिवर्तन को कम करने का एक अहम साधन भी बन सकती है।
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कार्बन के अलावा इस मॉडल का असर मिट्टी की सेहत पर भी पड़ा। अध्ययन में देखा गया कि एग्रोफॉरेस्ट्री अपनाने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी, जिससे उसकी उर्वरता बेहतर हुई। मिट्टी की संरचना में सुधार हुआ और पानी रोकने की क्षमता बढ़ी। ढलानदार इलाक़ों में यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मिट्टी का कटाव खेती की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मज़बूती से बाँधकर रखती हैं, जिससे बारिश के दौरान बहाव कम होता है और ज़मीन लंबे समय तक खेती के लायक बनी रहती है।
इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल केवल पर्यावरणीय लाभ नहीं देता, बल्कि किसानों की आजीविका को भी मज़बूती देता है। फसलों के साथ-साथ पेड़ों से मिलने वाले फल, लकड़ी और अन्य उत्पाद किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बनते हैं। इससे खेती का जोखिम बँट जाता है और मौसम की मार से होने वाले नुकसान का असर कम होता है। लंबे समय में यह मॉडल किसानों को ज़्यादा स्थिर और सुरक्षित आमदनी की ओर ले जाता है।
इन निष्कर्षों से एक बड़ी तस्वीर उभरकर सामने आती है। पहाड़ी और ढलानदार इलाक़ों में खेती का भविष्य केवल उन्नत बीज या रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रह सकता। वहाँ ज़मीन की बनावट, ढलान और प्राकृतिक जल प्रवाह को समझना उतना ही ज़रूरी है। सही ढलान पर सही पेड़ लगाकर खेती को पेड़ों से जोड़ा जाए, तो इससे मिट्टी बचती है, पानी संरक्षित रहता है, वातावरण से कार्बन कम होता है और किसान को दीर्घकालिक सहारा मिलता है।
रायगड़ा ज़िले में किया गया यह अध्ययन इस बात का ठोस प्रमाण देता है कि छोटे खेत, जिन्हें अक्सर सीमित संसाधनों वाला माना जाता है, सही योजना और वैज्ञानिक समझ के साथ जलवायु समाधान का अहम हिस्सा बन सकते हैं। यह शोध बताता है कि टिकाऊ खेती का रास्ता प्रकृति से टकराने में नहीं, बल्कि उसे समझने और उसके साथ तालमेल बिठाने में है। जब पेड़, ढलान और किसान एक साथ आते हैं, तो वे न केवल अपनी ज़मीन और आजीविका बचाते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अधिक सुरक्षित और संतुलित भविष्य की नींव रखते हैं।
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