गर्म होती धरती, फैलते कीट: भारत में फ़सलों पर बदलते रोग-कीटों के बढ़ने की चेतावनी
Divendra Singh | Jan 06, 2026, 15:07 IST
जलवायु परिवर्तन खेती पर गंभीर असर डाल रहा है, बीमारी और कीटों का प्रकोप अब समय-सीमा का पालन नहीं करता। बढ़ता तापमान, बदलती बारिश और प्राकृतिक संतुलन से कीटों और रोग-संचरण का तरीका बदल रहा है। इससे किसानों को उत्पादन नुकसान और खाद्य सुरक्षा जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए जलवायु अनुकूल कृषि रणनीतियाँ अपनाना अब ज़रूरी हो गया है।
खेती हमेशा से मौसम के भरोसे चलती रही है। किसान पीढ़ियों से जानता आया था कि किस महीने कौन-सी फ़सल बोनी है, कब किस रोग का डर रहता है और किस समय कौन-सा कीट दिखाई देता है। यही अनुभव खेती की सबसे बड़ी ताक़त था। लेकिन अब यह भरोसा धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम की वही पुरानी घड़ी बिगाड़ दी है, जिसके सहारे खेती का पूरा कैलेंडर चलता था। तापमान लगातार बढ़ रहा है, बारिश कभी ज़्यादा तो कभी बिल्कुल नहीं हो रही और हवा में नमी का व्यवहार भी बदल गया है। इसका सबसे सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है, खासकर उन बीमारियों और कीटों पर, जिनका समय और स्वभाव अब पहले जैसा नहीं रहा।
उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम बारिश और बढ़ते तापमान से खेती में नए-नए रोग और कीट उभर रहे हैं। विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान और पादप रोग विभाग के मुताबिक अब कई बीमारियाँ और कीट ऐसे समय पर हमला कर रहे हैं, जब किसान उनकी उम्मीद भी नहीं करता। इससे फसल को संभालना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है।
पहले गेहूं, धान, मक्का और सब्ज़ियों में कुछ बीमारियाँ तय मौसम में ही आती थीं। किसान को अंदाज़ा रहता था कि किस महीने क्या परेशानी आ सकती है। लेकिन अब कई इलाकों में यह देखने को मिल रहा है कि रोग समय से पहले आ जाते हैं या फिर फसल कटने तक खेत छोड़ने का नाम नहीं लेते। बढ़ता तापमान और छोटी होती सर्दियाँ कीटों और रोग फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों के लिए अनुकूल माहौल बना रही हैं। जिन कीटों को पहले ठंड प्राकृतिक रूप से रोक देती थी, वे अब ज़्यादा समय तक जीवित रह पा रहे हैं और एक ही मौसम में कई पीढ़ियाँ पैदा कर रहे हैं।
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कीट विज्ञान और पादप रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. मुकेश श्रीवास्तव बताते हैं, "जलवायु परिवर्तन के चलते खेती में ऐसे बदलाव दिख रहे हैं, जिनकी पहले कल्पना भी नहीं थी। कीटों में म्यूटेशन यानी आनुवंशिक बदलाव भी सामने आ रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि जो कीटनाशक और दवाइयाँ पहले असरदार थीं, वे अब कई मामलों में काम नहीं कर पा रहीं। इससे किसान का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन नुकसान फिर भी रुक नहीं रहा।"
बारिश का बदला हुआ स्वरूप इस संकट को और गहरा कर रहा है। जब लंबे सूखे के बाद अचानक तेज़ बारिश होती है, तो फसल पर जबरदस्त दबाव पड़ता है। कमजोर पौधे बीमारियों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। दूसरी ओर, जब नमी लगातार बनी रहती है, तो फफूंद और बैक्टीरिया जनित रोगों के लिए यह आदर्श स्थिति बन जाती है। यही वजह है कि अब सब्ज़ियों, दलहनों और तिलहनों में फंगल रोगों का फैलाव तेज़ी से बढ़ रहा है और कई बार किसान समझ ही नहीं पाता कि बीमारी की शुरुआत कहाँ से हुई।
बढ़ती गर्मी कीटों को जल्दी विकसित होने, साल में ज़्यादा बार प्रजनन करने और लंबे समय तक फसलों पर हमला करने का मौका दे रही है। सर्दियाँ छोटी होने से उनका प्राकृतिक नियंत्रण कमजोर पड़ गया है। अब कीट उन इलाकों और ऊँचाई वाले क्षेत्रों तक भी पहुँचने लगे हैं, जहाँ पहले ठंड उन्हें रोक लेती थी। पहाड़ी और अपेक्षाकृत ठंडे इलाके, जो कभी प्राकृतिक सुरक्षा कवच माने जाते थे, अब उतने सुरक्षित नहीं रहे।
वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी एक बड़ी वजह वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी है, जिससे सर्दी की वह प्राकृतिक रोक खत्म हो रही है जो पहले कीटों को सीमित रखती थी। इसके साथ ही जैव विविधता में गिरावट भी एक बड़ा कारण है। खेतों और आसपास के इलाकों में कीटों को खाने वाले प्राकृतिक दुश्मन,जैसे पक्षी, मित्र कीट और सूक्ष्म जीव कम होते जा रहे हैं। इससे कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है और उनका प्रकोप तेज़ी से फैल रहा है।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका नेचर रिव्यूज़ अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि लू और सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाएँ कई बार कीटों के अचानक और अप्रत्याशित प्रकोप को जन्म देती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संकट खासकर उन समशीतोष्ण इलाकों में ज़्यादा बढ़ेगा, जो भूमध्य रेखा से दूर हैं और जहाँ गेहूं, मक्का और धान जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।
जलवायु परिवर्तन का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती की पूरी संरचना को चुनौती दे रहा है। एक ही फसल, एक ही किस्म और बड़े-बड़े खेत, यह मॉडल उत्पादन तो बढ़ाता है, लेकिन कीटों और बीमारियों के लिए भी आसान रास्ता खोल देता है। जब मौसम अस्थिर होता है और खेतों में जैव विविधता कम होती है, तो एक बार रोग या कीट फैल जाए, तो पूरा इलाका उसकी चपेट में आ जाता है। इसका असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसान की आमदनी, कर्ज और मानसिक स्वास्थ्य तक पहुँच जाता है।
वैश्विक स्तर पर किए गए शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण फसल कीटों का प्रकोप तेज़ी से बढ़ रहा है। गर्मी बढ़ने से कीटों का भौगोलिक दायरा फैल रहा है, उनका जीवन चक्र तेज़ हो रहा है और साल में उनकी पीढ़ियों की संख्या बढ़ रही है। अनुमान है कि यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो गेहूं, धान और मक्का की पैदावार में क्रमशः 46%, 19% और 31% तक अतिरिक्त नुकसान हो सकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बढ़ते नेटवर्क के कारण नए-नए कीट एक देश से दूसरे देश तक पहुँच रहे हैं, जिससे वैश्विक कृषि को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
इन सबका मतलब यह नहीं है कि खेती का भविष्य अंधकारमय है, बल्कि यह संकेत है कि खेती को अब बदलना होगा। केवल रासायनिक दवाओं और कीटनाशकों पर निर्भर रहना अब समाधान नहीं है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ कीट और रोग भी खुद को ढाल रहे हैं। ज़रूरत इस बात की है कि किसान मौसम को नए सिरे से समझे, विज्ञान और तकनीक के साथ। फसल विविधता बढ़ाना, मिट्टी की सेहत सुधारना, प्राकृतिक दुश्मनों को संरक्षण देना और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियाँ अपनाना अब खेती का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है।
असल में, जलवायु परिवर्तन हमें यह याद दिला रहा है कि खेती सिर्फ उत्पादन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन का रिश्ता है। जब मौसम बदलता है, तो कीट और रोग बदलते हैं, और जब वे बदलते हैं, तो खेती के तरीके भी बदलने पड़ते हैं। आने वाले वर्षों में वही किसान टिक पाएगा, जो इस बदलाव को सिर्फ खतरे की तरह नहीं, बल्कि सीखने और खुद को ढालने की चुनौती की तरह देखेगा।
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उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम बारिश और बढ़ते तापमान से खेती में नए-नए रोग और कीट उभर रहे हैं। विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान और पादप रोग विभाग के मुताबिक अब कई बीमारियाँ और कीट ऐसे समय पर हमला कर रहे हैं, जब किसान उनकी उम्मीद भी नहीं करता। इससे फसल को संभालना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है।
पहले गेहूं, धान, मक्का और सब्ज़ियों में कुछ बीमारियाँ तय मौसम में ही आती थीं। किसान को अंदाज़ा रहता था कि किस महीने क्या परेशानी आ सकती है। लेकिन अब कई इलाकों में यह देखने को मिल रहा है कि रोग समय से पहले आ जाते हैं या फिर फसल कटने तक खेत छोड़ने का नाम नहीं लेते। बढ़ता तापमान और छोटी होती सर्दियाँ कीटों और रोग फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों के लिए अनुकूल माहौल बना रही हैं। जिन कीटों को पहले ठंड प्राकृतिक रूप से रोक देती थी, वे अब ज़्यादा समय तक जीवित रह पा रहे हैं और एक ही मौसम में कई पीढ़ियाँ पैदा कर रहे हैं।
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कीट विज्ञान और पादप रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. मुकेश श्रीवास्तव बताते हैं, "जलवायु परिवर्तन के चलते खेती में ऐसे बदलाव दिख रहे हैं, जिनकी पहले कल्पना भी नहीं थी। कीटों में म्यूटेशन यानी आनुवंशिक बदलाव भी सामने आ रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि जो कीटनाशक और दवाइयाँ पहले असरदार थीं, वे अब कई मामलों में काम नहीं कर पा रहीं। इससे किसान का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन नुकसान फिर भी रुक नहीं रहा।"
बारिश का बदला हुआ स्वरूप इस संकट को और गहरा कर रहा है। जब लंबे सूखे के बाद अचानक तेज़ बारिश होती है, तो फसल पर जबरदस्त दबाव पड़ता है। कमजोर पौधे बीमारियों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। दूसरी ओर, जब नमी लगातार बनी रहती है, तो फफूंद और बैक्टीरिया जनित रोगों के लिए यह आदर्श स्थिति बन जाती है। यही वजह है कि अब सब्ज़ियों, दलहनों और तिलहनों में फंगल रोगों का फैलाव तेज़ी से बढ़ रहा है और कई बार किसान समझ ही नहीं पाता कि बीमारी की शुरुआत कहाँ से हुई।
पहले गेहूं, धान, मक्का और सब्ज़ियों में कुछ बीमारियाँ तय मौसम में ही आती थीं।
बढ़ती गर्मी कीटों को जल्दी विकसित होने, साल में ज़्यादा बार प्रजनन करने और लंबे समय तक फसलों पर हमला करने का मौका दे रही है। सर्दियाँ छोटी होने से उनका प्राकृतिक नियंत्रण कमजोर पड़ गया है। अब कीट उन इलाकों और ऊँचाई वाले क्षेत्रों तक भी पहुँचने लगे हैं, जहाँ पहले ठंड उन्हें रोक लेती थी। पहाड़ी और अपेक्षाकृत ठंडे इलाके, जो कभी प्राकृतिक सुरक्षा कवच माने जाते थे, अब उतने सुरक्षित नहीं रहे।
वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी एक बड़ी वजह वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी है, जिससे सर्दी की वह प्राकृतिक रोक खत्म हो रही है जो पहले कीटों को सीमित रखती थी। इसके साथ ही जैव विविधता में गिरावट भी एक बड़ा कारण है। खेतों और आसपास के इलाकों में कीटों को खाने वाले प्राकृतिक दुश्मन,जैसे पक्षी, मित्र कीट और सूक्ष्म जीव कम होते जा रहे हैं। इससे कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है और उनका प्रकोप तेज़ी से फैल रहा है।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका नेचर रिव्यूज़ अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि लू और सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाएँ कई बार कीटों के अचानक और अप्रत्याशित प्रकोप को जन्म देती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संकट खासकर उन समशीतोष्ण इलाकों में ज़्यादा बढ़ेगा, जो भूमध्य रेखा से दूर हैं और जहाँ गेहूं, मक्का और धान जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।
जलवायु परिवर्तन का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती की पूरी संरचना को चुनौती दे रहा है। एक ही फसल, एक ही किस्म और बड़े-बड़े खेत, यह मॉडल उत्पादन तो बढ़ाता है, लेकिन कीटों और बीमारियों के लिए भी आसान रास्ता खोल देता है। जब मौसम अस्थिर होता है और खेतों में जैव विविधता कम होती है, तो एक बार रोग या कीट फैल जाए, तो पूरा इलाका उसकी चपेट में आ जाता है। इसका असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसान की आमदनी, कर्ज और मानसिक स्वास्थ्य तक पहुँच जाता है।
वैश्विक स्तर पर किए गए शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण फसल कीटों का प्रकोप तेज़ी से बढ़ रहा है। गर्मी बढ़ने से कीटों का भौगोलिक दायरा फैल रहा है, उनका जीवन चक्र तेज़ हो रहा है और साल में उनकी पीढ़ियों की संख्या बढ़ रही है। अनुमान है कि यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो गेहूं, धान और मक्का की पैदावार में क्रमशः 46%, 19% और 31% तक अतिरिक्त नुकसान हो सकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बढ़ते नेटवर्क के कारण नए-नए कीट एक देश से दूसरे देश तक पहुँच रहे हैं, जिससे वैश्विक कृषि को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
इन सबका मतलब यह नहीं है कि खेती का भविष्य अंधकारमय है, बल्कि यह संकेत है कि खेती को अब बदलना होगा। केवल रासायनिक दवाओं और कीटनाशकों पर निर्भर रहना अब समाधान नहीं है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ कीट और रोग भी खुद को ढाल रहे हैं। ज़रूरत इस बात की है कि किसान मौसम को नए सिरे से समझे, विज्ञान और तकनीक के साथ। फसल विविधता बढ़ाना, मिट्टी की सेहत सुधारना, प्राकृतिक दुश्मनों को संरक्षण देना और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियाँ अपनाना अब खेती का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है।
असल में, जलवायु परिवर्तन हमें यह याद दिला रहा है कि खेती सिर्फ उत्पादन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन का रिश्ता है। जब मौसम बदलता है, तो कीट और रोग बदलते हैं, और जब वे बदलते हैं, तो खेती के तरीके भी बदलने पड़ते हैं। आने वाले वर्षों में वही किसान टिक पाएगा, जो इस बदलाव को सिर्फ खतरे की तरह नहीं, बल्कि सीखने और खुद को ढालने की चुनौती की तरह देखेगा।
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