इस बीमारी से बर्बाद हो जाती है केले की खेती, वैज्ञानिकों ने खोजा बचाव का जैविक तरीका
केले की खेती को तबाह करने वाली TR-4 (Fusarium Wilt) बीमारी से जूझ रहे किसानों के लिए ICAR ने एक वैज्ञानिक समाधान पेश किया है। ICAR-FUSICONT नाम की जैव-आधारित तकनीक से रोग का फैलाव 40% से घटकर 5-10% तक पहुंच गया है, जिससे हज़ारों किसानों की फसल और आमदनी बची है।
पिछले कुछ सालों में कई राज्यों में इस बीमारी ने देखते ही देखते केले की पूरी फ़सल तबाह कर दी, किसानों के सामने केले की खेती छोड़ने के अलावा कुछ विकल्प नहीं बचा था, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसका भी हल निकाल लिया है।
इस बीमारी से ख़ासकर G9 जैसी किस्म Fusarium Wilt से अधिक प्रभावित होती है, इससे यूपी और बिहार के कई जिलों में 40–50% तक फसल नष्ट हो गई, जिसका असर आर्थिक रूप से ग्रामीण समुदायों पर भारी पड़ा। लेकिन जब से किसानों ने जैव-आधारित तकनीक ICAR-FUSICONT का इस्तेमाल करना शुरू किया, अब किसानों की अच्छी पैदावार हो रही है।
ICAR-FUSICONT को केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने विकसित किया है।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले के कतरौली गाँव के किसान आनंद कुमार पिछले कई वर्षों से केले की खेती कर रहे हैं, लेकिन बीमारी से परेशान होकर उन्होंने खेती छोड़ने का फैसला कर लिया था। तब ICAR-CSSRI और ICAR-CISH के वैज्ञानिकों ने उनकी मदद की कि कैसे केले की फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है।
Fusarium Wilt फंगस से फैलने वाली बीमारी है, जिसमें फंगस पौधे की जड़ पर हमला करते हैं। एक बार संक्रमित होने के बाद पौधे को पानी और दूसरे पोषक नहीं मिल पाते। इससे धीरे-धीरे पत्तियाँ मुरझाने लगती हैं और तना काला पड़ने लगता है। इसके बाद पौधा मर जाता है। अगर एक पौधे को यह रोग लग गया तो सभी पौधे इसकी चपेट में आ सकते हैं।
सीआईएसएच के प्रधान वैज्ञानिक डॉ मनीष मिश्रा बताते हैं, "एक समय था जब देश के ज़्यादातर हिस्सों में किसान इस बीमारी से परेशान थे, लेकिन फ्यूजीकॉन्ट के इस्तेमाल से न सिर्फ़ बीमारी से बचाव हुआ है, साथ ही पैदावार भी बढ़ी है।"
आईसीएआर-फ्यूजीकॉन्ट तकनीक को अपनाने से कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में 8,550 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जा चुका है, जिससे फ्यूज़ेरियम विल्ट बीमारी में कमी आयी है। इससे इलाक्की केले की पैदावार 19.25 से बढ़कर 27.5 टन प्रति हेक्टेयर हो गई, जबकि ग्रैंड नैन की पैदावार 38.5 से बढ़कर 55 टन प्रति हेक्टेयर हो गई है।
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यह दवा ट्राईकोडर्मा ईसी नामक फंगस की मदद से बनी है। यह फ्यूजेरियम फंगस को कंट्रोल करती है और उसे बढ़ने से रोकती है। इससे केले के पौधे की इम्युनिटी भी बढ़ती है। आमतौर पर केले की फसल 14-16 महीने में तैयार होती है। इस दौरान नियमित अंतराल पर दवा का इस्तेमाल करना होता है।
जब किसान ICAR-FUSICONT तकनीक अपनाते हैं यानी जैव-फॉर्मूला का अपने खेत में रोग-प्रबंधन प्रोटोकॉल के अनुसार उपयोग करते हैं, तो मिट्टी और पौधों में रोग का फैलाव बहुत कम हो जाता है। इससे प्रभावित क्षेत्रों में रोग की संख्या 5–10% तक घटाने में सफलता मिली, जबकि तकनीक न अपनाने वाले खेतों में बीमारी 40% से ऊपर फैलती रही।
सीआईएसएच के पूर्व निदेशक डॉ शैलेंद्र राजन कहते हैं, "कई जगह पर आजीविका पूरी तरह से केले की खेती पर निर्भर करती है। आईसीएआर-फ्यूजीकांट ही जैव कीटनाशक समाधान है जो वैश्विक स्तर पर कैवेंडिश केले को प्रभावित करने वाले पनामा विल्ट (टीआर-4) रोग से लड़ता है, 90 प्रतिशत तक उत्पादन नुकसान को कम कर सकता है और हजारों किसानों की आजीविका बचाने में मदद कर सकता है।"
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