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इस नई विधि से बीस गुना तक बढ़ जाएगा अरहर का उत्पादन

Divendra Singh | Jan 28, 2026, 13:05 IST
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अरहर की खेती की इस नई विधि से किसान बीस गुना अधिक उत्पादन पा सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें शुरू से कुछ ज़रूरी बातों का ध्यान रखना होगा।
इस शोध का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत में दालों की मांग लगातार बढ़ रही है।
देश के कई राज्यों में अरहर की खेती होती है, यही नहीं देश के लाखों किसानों की आजिविका और पोषण का ज़रिया भी है। अरहर की खेती कम पानी वाले इलाकों में की जाती है, लेकिन कई बार किसानों को उतनी पैदावार नहीं मिल पाती, जितनी मिलनी चाहिए, लेकिन वैज्ञानिकों ने अब इसका भी हल निकाल लिया है। अब किसान इससे 20 प्रतिशत तक ज़्यादा उत्पादन पा सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) ने नए शोध में पाया कि इस तकनीक से अरहर की खेती करके 20 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता प्रति हेक्टेयर लगभग 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है, साथ ही जलवायु जोखिम कम होता है और फसल की अवधि भी घटती है।

ICRISAT की हालिया रिसर्च में पाया गया है कि अरहर को खेत में सीधे बीज बोने की बजाय पहले नर्सरी में उगाना फिर उन पौधों को खेत में लगाने से न सिर्फ़ फ़सल अच्छी होती है, बल्कि उत्पादन भी बढ़ जाता है। अभी तक अरहर की खेती मुख्य रूप से वर्षा आधारित परिस्थितियों में की जाती है, लेकिन इसकी उत्पादकता अभी भी कम बनी हुई है, जो आमतौर पर 0.8 से 0.9 टन प्रति हेक्टेयर रहती है, जबकि इस नई विधि से खेती करने से उपज 1.8 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।

आईसीआरआईसैट के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि रोपाई खेती का एक पुराना तरीका है, जिसने धान जैसी सिंचित फसलों की उत्पादकता में बड़ा बदलाव लाया है। डॉ. पाठक ने कहा, “हमारा शोध अब यह दिखाता है कि यही पद्धति अरहर जैसी फसलों के लिए भी समान रूप से प्रभावी हो सकती है और वर्षा आधारित परिस्थितियों में इसकी व्यावसायिक उत्पादकता की पूरी क्षमता को उजागर कर सकती है।”

जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक और भी जरूरी हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक और भी जरूरी हो जाती है।


यह तरीका ज़मीन पर मौसम अनुकूलता और पौधों के विकास को बेहतर बनाता है, क्योंकि स्वस्थ पौधे मुख्य खेत में पहले ही मजबूत जड़ प्रणाली के साथ पहुँचते हैं। मजबूत जड़ें मिट्टी से पानी और पोषक तत्व अधिक प्रभावी ढंग से खींचती हैं, जिससे पौधे सूखे और अनियमित बारिश जैसे जलवायु जोखिमों का बेहतर सामना कर पाते हैं।

इसके अलावा, ट्रांसप्लांटिंग से फसल का पूरा विकास चक्र जल्दी-जल्दी पूरा होता है। यह तरीका आधुनिक खेतों में खेती की सबसे संवेदनशील शुरुआत जब पौधे कमजोर होते हैं को दरकिनार कर देता है। नतीजतन, पौधे जल्दी मजबूत हो जाते हैं और फसल अवधि लगभग 12–18 दिनों से कम होती है, जिससे बुवाई के बाद सूखे के दौरान फसल को नुकसान पहुँचने का जोखिम भी घट जाता है।

इस पद्धति का एक और फायदा यह है कि फसल का कुल समय थोड़ा कम हो जाता है। खेत में सीधे बोई गई अरहर को अंकुरण और शुरुआती बढ़वार में ज्यादा वक्त लगता है, जबकि नर्सरी से आए पौधे पहले से “तैयार” होते हैं। इससे किसान मौसम के जोखिम को बेहतर तरीके से मैनेज कर पाते हैं। खासकर उन इलाकों में, जहां मानसून का भरोसा नहीं रहता, यह तकनीक खेती को ज्यादा सुरक्षित बना सकती है।

किसानों के लिए यह राहत की बात भी है कि यह कोई महंगी मशीन या बड़ी लागत वाली तकनीक नहीं है। इसमें बस सोच बदलने की ज़रूरत है। जैसे धान की खेती में लंबे समय से रोपाई की परंपरा है, वैसे ही अब अरहर जैसी दलहनी फसलों में भी इस तरीके को अपनाया जा सकता है। नर्सरी तैयार करने के लिए थोड़ी जगह, बीज ट्रे या छोटी क्यारियां और सही समय पर रोपाई यही इसकी बुनियाद है।

देश के महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे प्रदेश में खरीफ़ के मौसम में अरहर की खेती की जाती है।

ICRISAT के वैज्ञानिकों ने न केवल इसका अध्ययन किया है, बल्कि Seedling Transplanting Protocols for Sustainable Pigeonpea Production भी जारी किए है
ICRISAT के वैज्ञानिकों ने न केवल इसका अध्ययन किया है, बल्कि Seedling Transplanting Protocols for Sustainable Pigeonpea Production भी जारी किए है


इस शोध का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत में दालों की मांग लगातार बढ़ रही है। आबादी बढ़ रही है, पोषण को लेकर ज़ागरूकता बढ़ रही है और सरकार भी आत्मनिर्भर भारत के तहत दाल उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे में अगर किसान बिना ज्यादा लागत बढ़ाए अपनी पैदावार 15–20 प्रतिशत तक बढ़ा सकें, तो इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर पड़ेगा।

आईसीआरआईसैट के उप महानिदेशक (अनुसंधान एवं नवाचार) डॉ. स्टैनफोर्ड ब्लेड ने के अनुसार रोपाई से फसल की अवधि लगभग 12 से 18 दिन तक कम हो जाती है, जिससे फसल जल्दी पकती है और वर्षा के बाद के मौसम में मिट्टी की कम नमी के जोखिम से बचाव होता है।

उन्होंने कहा, “यह तरीका व्यावहारिक है और तुरंत बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है, जिससे किसानों को बहुत कम अतिरिक्त संसाधनों या बुनियादी ढांचे के साथ जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने में मदद मिलती है।”

“कई बार सबसे अच्छा समाधान कोई नई तकनीक नहीं होता, बल्कि बुनियादी विज्ञान की ओर लौटना होता है, ”डॉ. ब्लेड ने आगे कहा।

जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक और भी जरूरी हो जाती है। आज किसान केवल बाजार की चिंता नहीं करते, बल्कि मौसम की अनिश्चितता भी उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। ट्रांसप्लांटिंग आधारित अरहर खेती पौधों को जलवायु के झटकों से बेहतर तरीके से लड़ने में मदद करती है। मजबूत जड़ प्रणाली, बेहतर शुरुआती वृद्धि और समान पौध संख्या ये सभी मिलकर फसल को ज्यादा स्थिर बनाते हैं।

ICRISAT के वैज्ञानिकों ने न केवल इसका अध्ययन किया है, बल्कि Seedling Transplanting Protocols for Sustainable Pigeonpea Production भी जारी किए हैं, ताकि किसान इस तकनीक को स्थानीय तौर पर सही तरीके से अपना सकें और अपनी पैदावार का सकारात्मक रूप से विस्तार कर सकें।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक सिर्फ प्रयोगशाला या बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे गांव-गांव तक पहुंचाया जाना चाहिए। इसके लिए कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और किसान समूहों की भूमिका अहम हो जाती है। अगर प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन मिले, तो छोटे किसान भी इसे आसानी से अपना सकते हैं।
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