बाढ़ का बदला स्वरूप: क्यों कुछ राज्यों में धान अब पहले से ज़्यादा सुरक्षित दिख रहा है

Gaon Connection | Jan 02, 2026, 15:17 IST
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भारत में मानसून की बाढ़ लंबे समय से धान की खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा रही है। लेकिन एक नया वैश्विक अध्ययन बताता है कि कुछ प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में सबसे घातक, एक सप्ताह तक फसल डुबो देने वाली बाढ़ की घटनाएँ घट रही हैं। क्या यह जलवायु अनुकूलन की सफलता है या बदलते जोखिम का संकेत?

<p>क्या यह जलवायु अनुकूलन की सफलता है या बदलते जोखिम का संकेत?<br></p>
भारत में मानसून की बाढ़ दशकों से धान की खेती के लिए सबसे बड़ा जोखिम रही है। हर साल जब नदियाँ उफान पर आती हैं और खेतों में पानी भर जाता है, तब सिर्फ़ फसल नहीं डूबती, किसानों की पूरी मेहनत, कर्ज़ चुकाने की उम्मीद और अगले मौसम की तैयारी भी बह जाती है। लेकिन अब एक नया वैश्विक अध्ययन इस लंबे समय से चली आ रही कहानी में एक दिलचस्प मोड़ दिखाता है।

हालिया वैश्विक मॉडलिंग अध्ययन के अनुसार, भारत के कुछ प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में सबसे घातक मानी जाने वाली “धान-नाशक बाढ़” यानी वे बाढ़ जिनमें खेत पूरे सात दिन या उससे ज़्यादा समय तक पानी में डूबे रहते हैं, उनकी आवृत्ति हाल के दशकों में घटती नज़र आ रही है।

एक हफ्ते की सीमा: जहाँ धान हार जाता है

धान एक विशेष फसल है। शुरुआती अवस्था में यह कुछ दिनों तक जलमग्न रह सकती है, लेकिन अगर पौधा लगातार सात दिन या उससे अधिक समय तक पूरी तरह पानी में डूबा रहे, तो उसका बच पाना लगभग असंभव हो जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक अध्ययन में “एक सप्ताह तक की पूर्ण जलमग्नता” को धान के लिए सबसे घातक सीमा माना गया है।

अध्ययन बताता है कि भारत के कुछ इलाकों, खासतौर पर पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों में इस सीमा को पार करने वाली बाढ़ की घटनाएँ पहले की तुलना में कम हुई हैं।

नुकसान अब भी बड़ा है, लेकिन तस्वीर बदल रही है

इसका यह अर्थ नहीं है कि बाढ़ से होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। अध्ययन के अनुसार, भारत में एक औसत “धान-नाशक बाढ़” के दौरान करीब 50 लाख टन धान का नुकसान होता है। वैश्विक स्तर पर देखें तो 1980 से 2015 के बीच गंभीर बाढ़ों ने हर साल औसतन 4.3% धान उत्पादन घटाया, यानी लगभग 1.8 करोड़ टन धान हर वर्ष नष्ट हुआ।

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2000 के बाद जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ से होने वाला नुकसान बढ़ा है। लेकिन भारत इस वैश्विक रुझान से कुछ हद तक अलग दिखाई देता है। इसका संकेत 2024–25 में भारत का रिकॉर्ड 149 मिलियन टन धान उत्पादन भी देता है।

यह बदलाव बताता है कि जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है। कई इलाकों में अब छोटी और बार-बार आने वाली बाढ़ें बढ़ी हैं, जबकि लंबी अवधि की सबसे विनाशकारी बाढ़ कुछ क्षेत्रों में कम दिख रही हैं।

क्यों घट रही हैं सबसे घातक बाढ़ घटनाएँ?

वैज्ञानिक इस बदलाव के पीछे कई संभावित कारण बताते हैं। एक कारण यह हो सकता है कि कुछ क्षेत्रों में अब जलनिकासी प्रणाली बेहतर हुई है और बाढ़ का पानी खेतों में लंबे समय तक ठहर नहीं पाता। कुछ जगहों पर बाढ़ के दौरान उच्च वाष्पीकरण दर भी पानी को जल्दी घटाने में मदद करती है।

लेकिन सबसे अहम वजह मानी जा रही है- बाढ़-सहिष्णु धान किस्मों का बढ़ता उपयोग।

Sub1 किस्में: धान की जीवनरेखा

पिछले दो दशकों में विकसित Sub1 जीन वाली धान किस्मों ने बाढ़ से निपटने के तरीके को बदल दिया है। Swarna Sub1, IR64 Sub1, Sambha Mahsuri Sub1 जैसी किस्में धान को 14 दिनों तक पूरी तरह जलमग्न रहने के बाद भी दोबारा जीवित होने की क्षमता देती हैं।

आज एशिया में ये किस्में 60 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अपनाई जा चुकी हैं और कई वास्तविक बाढ़ स्थितियों में इन्होंने किसानों को भारी नुकसान से बचाया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में “धान-नाशक बाढ़” की आवृत्ति घटने में इन किस्मों की भूमिका अहम हो सकती है।

फिर भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है

हालाँकि यह रुझान उम्मीद जगाने वाला है, लेकिन खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है। भारत में अब भी 12–14 मिलियन हेक्टेयर धान क्षेत्र ऐसा है जो बाढ़-प्रवण, वर्षा-आश्रित निचले इलाकों में आता है।

इन क्षेत्रों में यदि बाढ़ आई और सहिष्णु किस्में नहीं लगीं, तो 50 से 100 प्रतिशत तक फसल नष्ट हो सकती है। इसका उदाहरण हाल की घटनाएँ भी देती हैं। 2025 में पंजाब की बाढ़ ने लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावित किया, जहाँ बासमती धान में 20–25% तक उत्पादन हानि दर्ज की गई।

जलवायु परिवर्तन के दौर में नई तैयारी ज़रूरी

वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि भले ही कुछ क्षेत्रों में सबसे लंबी और घातक बाढ़ कम हुई हों, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ की प्रकृति अधिक अनिश्चित होती जा रही है, कहीं अचानक फ्लैश फ्लड, कहीं लंबे समय तक पानी ठहरना।

इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि Sub1 किस्मों की सफलता को अंतिम समाधान नहीं, बल्कि एक मजबूत आधार मानना चाहिए। आगे की चुनौती है—ऐसी अगली पीढ़ी की किस्में विकसित करना जो और अधिक समय तक, और अधिक तीव्र बाढ़ को सहन कर सकें।

यह अध्ययन भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत देता है कि वैज्ञानिक नवाचार, फसल सुधार और अनुकूलन रणनीतियाँ मिलकर जलवायु जोखिम को कम कर सकती हैं। लेकिन यह भी साफ है कि बाढ़ अब भी भारत की धान खेती के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई है।

किसानों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के लिए संदेश स्पष्ट है, बदलते जोखिम को पहचानते हुए, बाढ़-सहिष्णु किस्मों का विस्तार, बेहतर जल प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियाँ ही आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा की असली कुंजी होंगी।
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