‘स्वीट चार्ली’ ने बदली किस्मत! स्ट्रॉबेरी की खेती से 8 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर कमा रहे इस जगह के किसान
गुजरात का आदिवासी बहुल डांग जिला अब सिर्फ पारंपरिक खेती के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रॉबेरी उत्पादन के नए मॉडल के रूप में भी तेजी से पहचान बना रहा है। कभी सीमित स्तर पर प्रयोग के तौर पर शुरू हुई स्ट्रॉबेरी खेती अब यहां किसानों की आय बढ़ाने वाली हाई-वैल्यू फसल बन चुकी है। पिछले तीन वर्षों में डांग में स्ट्रॉबेरी उत्पादन करीब 65 प्रतिशत बढ़ा है। राज्य सरकार की योजनाओं, प्राकृतिक खेती, बेहतर बाजार संपर्क और आधुनिक बागवानी तकनीकों की मदद से यहां के किसान अब धान, नागली, उड़द और वरई जैसी पारंपरिक फसलों से हटकर स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
तीन साल में 65% बढ़ा स्ट्रॉबेरी उत्पादन
गुजरात सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2023 में डांग जिले में करीब 20 हेक्टेयर क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती होती थी, जो वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर लगभग 33 हेक्टेयर पहुंच गई है। इसी अवधि में उत्पादन भी 140 मीट्रिक टन से बढ़कर अनुमानित 233 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। यह वृद्धि केवल खेती के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि जिले की कृषि अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है।
किसानों की कमाई में बड़ा उछाल
डांग के किसान लंबे समय तक बारिश पर निर्भर खेती और मजदूरी के सहारे अपनी आय बढ़ाने की कोशिश करते रहे। लेकिन अनियमित बारिश, पानी की कमी और कम बाजार मूल्य के कारण उनकी आमदनी सीमित रहती थी। अब स्ट्रॉबेरी खेती इस तस्वीर को बदल रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्ट्रॉबेरी उगाने वाले किसान प्रति हेक्टेयर सालाना करीब 7 से 8 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं। इससे यह फसल इलाके की सबसे अधिक लाभ देने वाली फसलों में शामिल हो गई है।
‘स्वीट चार्ली’ से ‘विंटर डॉन’ तक कई वैरायटी की खेती
डांग जिले में किसान कई आधुनिक स्ट्रॉबेरी किस्मों की खेती कर रहे हैं। इनमें विंटर डॉन, स्वीट चार्ली, कैमारोजा, सेल्वा, अर्ली विंटर, नबिला, नबाडी, बेलरूबी और पजेरो जैसी वैरायटी शामिल हैं। इनमें “विंटर डॉन” सबसे ज्यादा लोकप्रिय मानी जा रही है क्योंकि इसकी तुड़ाई दिसंबर से मार्च तक लंबे समय तक चलती है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार और दाम मिलते हैं।
क्लस्टर फार्मिंग से बढ़ी बाजार तक पहुंच
डांग में अब स्ट्रॉबेरी खेती बिखरे हुए तरीके से नहीं बल्कि क्लस्टर मॉडल पर हो रही है। आहवा और वघई तालुका के कई गांव स्ट्रॉबेरी उत्पादन केंद्र बन चुके हैं। इससे किसानों को बीज, खाद और अन्य जरूरी संसाधनों की सामूहिक खरीद में आसानी हो रही है। साथ ही बड़ी मात्रा में उत्पादन को अहमदाबाद, सूरत और भरूच जैसे शहरों तक पहुंचाना भी आसान हुआ है।
प्राकृतिक खेती और मौसम का मिला फायदा
विशेषज्ञों के मुताबिक डांग का मौसम और मिट्टी स्ट्रॉबेरी के लिए बेहद अनुकूल माने जाते हैं। यहां की जैविक पदार्थों से भरपूर रेतीली दोमट मिट्टी और ठंडा मौसम फसल की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद करता है। स्ट्रॉबेरी की अच्छी पैदावार के लिए दिन का तापमान 22 से 25 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 7 से 13 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त माना जाता है, जो डांग क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
गांवों में बढ़ा रोजगार, पलायन में कमी
स्ट्रॉबेरी खेती बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। तुड़ाई, पैकेजिंग, ग्रेडिंग और परिवहन जैसे कार्यों में बड़ी संख्या में ग्रामीणों को काम मिल रहा है। इससे दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए होने वाला मौसमी पलायन भी कम हुआ है और गांवों में स्थानीय आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं।
पारंपरिक खेती से हाई-वैल्यू खेती की ओर बदलाव
विशेषज्ञों का मानना है कि डांग में स्ट्रॉबेरी खेती का तेजी से बढ़ना इस बात का संकेत है कि छोटे और सीमांत किसान भी अगर बेहतर बाजार, तकनीक और सरकारी सहयोग मिले तो हाई-वैल्यू खेती से अच्छी कमाई कर सकते हैं।