हिमाचल में मौसम की बेरुखी, रबी सीज़न में सूखा बना किसानों की बड़ी परेशानी

Divendra Singh | Jan 09, 2026, 14:40 IST
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हिमाचल प्रदेश में समय पर सर्दियों की बारिश न होने से रबी फसलों पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। हज़ारों हेक्टेयर में बुवाई नहीं हो सकी, जबकि खड़ी फसलें भी सूखे की चपेट में हैं। मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है।
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि राज्य में इस रबी सीजन के दौरान 36,335 हेक्टेयर भूमि पर फसलों की बुवाई ही नहीं हो सकी।

हर साल पाँच–छह बीघा ज़मीन में गेहूँ उगाने वाले धीरज कुमार इस बार सिर्फ़ दो बीघा में ही बुवाई कर पाए हैं। लेकिन उनकी चिंता यहीं खत्म नहीं होती, उन्हें डर है कि अगर आने वाले दिनों में बारिश नहीं हुई, तो यह थोड़ी-सी फ़सल भी सूख जाएगी।



हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले के भरमौर गाँव में रहने वाले 45 वर्षीय धीरज उन सैकड़ों किसानों में से एक हैं, जिनके लिए इस बार का रबी मौसम उम्मीद से ज़्यादा चिंता लेकर आया है। वे बताते हैं, “हर साल तो नवंबर तक गेहूँ की बुवाई हो जाती थी, लेकिन इस बार बारिश बिल्कुल नहीं हुई। मजबूरी में 28 दिसंबर को दो बीघा में गेहूँ बोया है। अगर अब भी बारिश नहीं हुई, तो यह फसल बचाना मुश्किल होगा।”



धीरज की यह चिंता पूरे हिमाचल प्रदेश के किसानों की कहानी बन चुकी है। इस बार रबी सीजन प्रदेश में भारी संकट के संकेत दे रहा है। समय पर बारिश और बर्फबारी न होने से कई इलाकों में खेतों की मिट्टी सूखी पड़ी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि राज्य में इस रबी सीजन के दौरान 36,335 हेक्टेयर भूमि पर फसलों की बुवाई ही नहीं हो सकी। जिन किसानों ने जोखिम उठाकर सूखी ज़मीन में बीज डाले, उनकी फसलें भी अब लंबे सूखे की मार झेल रही हैं।



अक्टूबर के बाद से हिमाचल में बारिश और बर्फबारी का सिलसिला लगभग थम गया। इसका सीधा असर गेहूँ, जौ और चना जैसी प्रमुख रबी फसलों पर पड़ा है। कृषि विभाग को फील्ड से जो रिपोर्ट्स मिल रही हैं, वे साफ़ इशारा कर रही हैं कि अगर मौसम में जल्द बदलाव नहीं हुआ, तो नुकसान और गहरा हो सकता है।



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कृषि विभाग के अनुसार, रबी सीजन के लिए प्रदेश में कुल 3,53,270 हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं, जौ, चना और दालों की बुवाई का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन बारिश की कमी के कारण किसान केवल 3,16,935 हेक्टेयर में ही बुवाई कर सके। कई इलाकों में किसानों ने मजबूरी में सूखी ज़मीन में गेहूँ बोया, जिससे अब उगी हुई फसल भी कमजोर पड़ती जा रही है।



सबसे ज़्यादा असर गेहूं की खेती पर पड़ा है। प्रदेश में गेहूं की बुवाई का लक्ष्य 3,22,000 हेक्टेयर रखा गया था, लेकिन किसान सिर्फ़ 2,90,713 हेक्टेयर में ही बुवाई कर पाए। यानी 31,287 हेक्टेयर भूमि पर नमी न होने की वजह से गेहूँ बोया ही नहीं जा सका। जौ के लिए 18,000 हेक्टेयर का लक्ष्य तय था, लेकिन 405 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई नहीं हो सकी।



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हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक रविंद्र सिंह चौहान कहते हैं, “इस बार बारिश न होने की वजह से गेहूँ की फसल प्रभावित हुई है। फील्ड से प्रभावित फसलों की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। जैसे ही रिपोर्ट पूरी होगी, नुकसान का सही आकलन किया जाएगा।”



सूखे का असर केवल बुवाई तक सीमित नहीं रहा है। जिन खेतों में फसल उग आई है, वहाँ भी हालात चिंताजनक हैं। प्रदेश में कुल 10,334 हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं, जौ, चना और दालों की फसलें सूखे से प्रभावित हो चुकी हैं। इनमें अकेले गेहूं की फसल 9,369 हेक्टेयर में करीब 33 प्रतिशत तक प्रभावित बताई जा रही है। जौ की फसल भी 405 हेक्टेयर में सूखे की चपेट में है।



सब्ज़ी उत्पादक किसान भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। राज्य में लगभग 30,215 हेक्टेयर क्षेत्र में सब्ज़ियों की बुवाई की गई है, जिनमें से 527 हेक्टेयर में सब्ज़ी फसलें सूखे से प्रभावित हो चुकी हैं।





इन हालात का सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्यों पर भी पड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश में इस बार 7,15,280 मीट्रिक टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन बुवाई न हो पाने और खड़ी फसलों पर सूखे के प्रभाव के कारण यह लक्ष्य अब खतरे में दिखाई दे रहा है। अकेले गेहूं की पैदावार के लिए 6,50,000 मीट्रिक टन का लक्ष्य रखा गया था, जबकि जौ के लिए 30,000 मीट्रिक टन, चना के लिए 280 मीट्रिक टन और रबी दालों के लिए 35,000 मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है।



मौसम विभाग, हिमाचल प्रदेश के प्रभारी डॉ. कुलदीप श्रीवास्तव बताते हैं, “पिछले कुछ वर्षों में मौसम के पैटर्न में साफ़ बदलाव देखने को मिला है। आमतौर पर सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहते हैं, जिससे बारिश और बर्फबारी होती है। लेकिन इस साल पश्चिमी विक्षोभ न केवल कमजोर रहे, बल्कि उनकी संख्या भी कम रही। जो सिस्टम आए भी, वे या तो हिमालय तक पहुँच नहीं पाए या उत्तर की ओर मुड़ गए, जिससे बादल तो बने लेकिन बारिश या बर्फबारी नहीं हो सकी।”



मौसम विभाग का पूर्वानुमान किसानों की चिंता और बढ़ा रहा है। विभाग के मुताबिक़, 15 जनवरी तक प्रदेश में बारिश के कोई आसार नहीं हैं। जनवरी के पहले सप्ताह, यानी 1 से 7 जनवरी के बीच प्रदेश में केवल 2.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 12.3 मिलीमीटर बारिश होती है। इसका मतलब है कि इस दौरान बारिश में 77 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई।



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भारत मौसम विज्ञान विभाग पुणे स्थित क्लाइमेट रिसर्च व सर्विसेज के कृषि मौसम विज्ञानी डॉ एन चट्टोपध्याय गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "एल नीनो जैसी वैश्विक मौसमीय स्थितियों ने भी बारिश को प्रभावित किया है। इसके चलते सर्दियों में नमी कम रही। जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्रों में साफ़ दिख रहा है, लंबी और स्थिर सर्दियों की बारिश घट रही है, जबकि मौसम ज़्यादा अनिश्चित होता जा रहा है। इस सर्दी में तापमान भी सामान्य से अधिक रहा, जिससे ठंड कम पड़ी और बारिश बनने की परिस्थितियाँ कमजोर रहीं। इसका सीधा असर रबी फसलों के साथ-साथ बागवानी पर भी पड़ा है।



मानसून की विदाई के बाद का पोस्ट-मानसून सीजन भी इस बार निराशाजनक रहा। 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर तक के इस दौर में अक्टूबर में भले ही सामान्य से अधिक बारिश हुई, लेकिन नवंबर और दिसंबर लगभग पूरी तरह सूखे बीते। पिछले 16 वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो केवल 2019 ऐसा साल रहा है, जब पोस्ट-मानसून के दौरान सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई थी। बाकी तो हर साल ऐसे ही हालात बन रहे हैं।



इस बदलते मौसम के बीच धीरज कुमार जैसे किसान अब सिर्फ़ आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, इस उम्मीद में कि कुछ बूंदें गिर जाएँ, ताकि उनकी फसल और उनकी मेहनत दोनों बच सकें।



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