डोरी से धान की रोपाई कर बदली खेती की तस्वीर, रायबरेली के इस किसान ने मेहनत से बनाई अलग पहचान, कई बार हो चुके सम्मानित

Gaon Connection | May 27, 2026, 19:17 IST
रायबरेली के हरिनाम वर्मा ने खेती में नई तकनीकें अपनाईं। उन्होंने डोरी से धान की रोपाई की और दूसरी फसलों में भी लाइन से बुवाई की। इससे उत्पादन बढ़ा और उन्हें कई सम्मान मिले। उनकी पत्नी को भी गेहूं उत्पादन के लिए पुरस्कार मिला। हरिनाम वर्मा ने कृषि विभाग से संपर्क कर जानकारी हासिल की।

रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के बैरमपुर सिंधौना गांव के रहने वाले 64 वर्षीय प्रगतिशील किसान हरिनाम वर्मा आज अपने इलाके में अलग तरीके से खेती करने के लिए पहचाने जाते हैं। करीब 11 बीघा खेती करने वाले हरिनाम वर्मा ने खेती में लगातार प्रयोग, मेहनत और नई तकनीकों को अपनाकर न सिर्फ बेहतर उत्पादन हासिल किया, बल्कि कई सम्मान भी अपने नाम किए। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर किसान नई जानकारी और तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार हो, तो खेती में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।



डोरी से धान की रोपाई

हरिनाम वर्मा बताते हैं कि उनकी खेती की नई शुरुआत करीब वर्ष 2016 के आसपास हुई, जब कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को धान की रोपाई लाइन से करने की सलाह दी। उस समय गांव के ज्यादातर किसान इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि यह तरीका ज्यादा मेहनत वाला माना जाता था। खेत में पानी भरे होने के कारण सीधी लाइन बनाना आसान नहीं था।



उन्होंने बताया कि शुरुआत में लाइन से रोपाई करने के लिए खेत में दोनों तरफ डोरी पकड़कर मजदूरों से धान की रोपाई करवाई जाती थी। इस प्रक्रिया में अतिरिक्त मेहनत और ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ती थी, लेकिन उन्होंने इस तरीके को अपनाया और लगातार उसी तरह खेती करते रहे। हरिनाम वर्मा के मुताबिक लाइन से धान लगाने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि फसल के बीच हवा का आवागमन बेहतर रहता है और सूरज की रोशनी सभी पौधों तक बराबर पहुंचती है। इससे फसल की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन बढ़ता है। उनका कहना है कि पहले गांव में बहुत कम किसान इस तकनीक को अपनाते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे दूसरे किसान भी इसे अपनाने लगे हैं।



उन्होंने बताया कि वे केवल धान ही नहीं बल्कि दूसरी फसलों में भी लाइन से बुवाई और रोपाई करते रहे हैं। कुछ फसलों में ट्रैक्टर से सीधी लाइन बनाकर रोपाई करवाई जाती थी, जिससे मजदूरी खर्च भी कम हो जाता था।



धान और गेहूं उत्पादन के लिए मिल चुके हैं कई सम्मान

हरिनाम वर्मा को पहली बार धान की उत्कृष्ट खेती के लिए करीब 7 हजार रुपये का पुरस्कार मिला था। वह सम्मान उनके लिए बड़ी प्रेरणा बना। इसके बाद उन्होंने खेती में उत्पादन बढ़ाने और बेहतर प्रबंधन पर लगातार काम किया। इसी मेहनत का परिणाम रहा कि वर्ष 2024 में उन्हें धान उत्पादन के लिए 75 हजार रुपये की सम्मान राशि के साथ पुरस्कार दिया गया। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी को भी वर्ष 2017 में गेहूं उत्पादन के लिए 75 हजार रुपये का सम्मान मिल चुका है। यह पुरस्कार चौधरी चरण सिंह की जयंती पर प्रदान किया गया था। हरिनाम वर्मा अपनी सफलता का श्रेय अपनी पत्नी को भी देते हैं। उनका कहना है कि खेती के हर कठिन दौर में उनकी पत्नी ने उनका साथ दिया और लगातार उनका मनोबल बढ़ाया। दोनों ने मिलकर खेती में नई तकनीकों को अपनाने और उत्पादन बढ़ाने पर काम किया।



नर्सरी लगाने में देरी को मानते हैं बड़ी गलती

हरिनाम वर्मा का मानना है कि खेती में छोटी-छोटी गलतियां भी उत्पादन पर बड़ा असर डालती हैं। उन्होंने बताया कि धान की नर्सरी लगाने के बाद अगर समय पर रोपाई कर दी जाए तो फसल की बढ़वार बेहतर होती है और पौधों में ज्यादा कल्ले निकलते हैं। उनका कहना है कि कई किसान नर्सरी तैयार होने के काफी समय बाद रोपाई करते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। जबकि कम समय में रोपाई करने पर फसल की ग्रोथ बेहतर होती है और खेत भी ज्यादा अच्छे दिखाई देते हैं।



अधिकारियों से संपर्क और जानकारी बेहद जरूरी

हरिनाम वर्मा ने बताया कि बेहतर खेती के लिए कृषि विभाग से जुड़े रहना और नई जानकारी हासिल करना बेहद जरूरी है। उन्होंने अपनी फसल का सर्वे कराने के लिए खुद कृषि अधिकारियों से संपर्क किया था। उन्होंने बताया कि जब उन्हें लगा कि उनकी फसल अच्छी है तो उन्होंने अधिकारियों को खेत देखने के लिए बुलाया। इसके बाद फसल की क्रॉप कटिंग कराई गई, जिसमें पांच वर्ग मीटर क्षेत्र की फसल काटकर उसका उत्पादन मापा गया। उसी आधार पर उनकी फसल का मूल्यांकन हुआ और आगे पुरस्कार प्रक्रिया पूरी हुई।



उनका कहना है कि अब मोबाइल और व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए किसानों तक कृषि विभाग की जानकारी आसानी से पहुंच जाती है। विभाग की बैठकों, गोष्ठियों और कार्यक्रमों की जानकारी किसानों को मोबाइल पर मिल जाती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने स्तर पर गांव में कई बार कृषि गोष्ठियां भी आयोजित करवाई हैं, ताकि दूसरे किसानों तक भी नई जानकारी पहुंच सके।



खेती आसान नहीं, लेकिन सीखना जरूरी

हरिनाम वर्मा मानते हैं कि खेती आसान काम नहीं है। बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और सीमित संसाधनों के बीच किसानों को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार खेती में लागत के मुकाबले अपेक्षित आय नहीं मिल पाती, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ता है। इसके बावजूद उनका मानना है कि अगर किसान मेहनत, धैर्य और नई तकनीकों के साथ लगातार सीखते रहें, तो खेती में बेहतर उत्पादन और पहचान दोनों हासिल की जा सकती हैं। उनकी कहानी दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।




'गाँव कनेक्शन' के लिए रायबरेली से श्रुति शुक्ला की रिपोर्ट

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