दुनिया में 3000 रुपये तक पहुंची यूरिया की बोरी की कीमत लेकिन भारत में किसान को सिर्फ 300 रुपये में कैसे मिल रही खाद? जानिए वजह

Gaon Connection | May 12, 2026, 15:18 IST
दुनिया भर में यूरिया की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन भारत सरकार अपने किसानों को सब्सिडी देकर राहत दे रही है। एक बोरी यूरिया की लागत जहां विदेशों में हजारों रुपये है, वहीं भारतीय किसान इसे कुछ सौ रुपये में खरीद रहे हैं। यह सरकार की आर्थिक मजबूती और किसानों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आखिर भारत में इतनी सस्ती क्यों है यूरिया?

दुनिया के कई देशों में इस समय किसानों के लिए खेती करना लगातार महंगा होता जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट, गैस की बढ़ती कीमतें और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने खाद बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर यूरिया जैसी जरूरी खाद की कीमतें कई देशों में तेजी से बढ़ी हैं लेकिन इन हालातों के बीच भारतीय किसान अब भी करीब 300 रुपये में यूरिया खरीद पा रहे हैं। आखिर ऐसा कैसे संभव हो रहा है?



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान इसी मुद्दे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में यूरिया की एक बोरी 3000 रुपये तक पहुंच चुकी है लेकिन भारत सरकार किसानों को यह खाद करीब 300 रुपये में उपलब्ध करा रही है। पीएम मोदी ने इसे वैश्विक संकट के बीच भारत की आर्थिक मजबूती और किसानों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता बताया।



आखिर दुनिया में इतनी महंगी क्यों हो गई यूरिया?

यूरिया एक नाइट्रोजन आधारित खाद है जिसे बनाने में प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो खाद की लागत भी तेजी से बढ़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध, LNG गैस की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट और अब ईरान से जुड़े तनाव व होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने पूरी दुनिया में खाद बाजार को प्रभावित किया है। कई देशों में किसानों को अब यूरिया के लिए पहले से कई गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। भारत भी इस संकट से पूरी तरह अछूता नहीं है। LNG सप्लाई प्रभावित होने से घरेलू उत्पादन पर दबाव बढ़ा और सरकार को कई बार आयात का सहारा लेना पड़ा। इसके बावजूद किसानों तक सस्ती खाद पहुंचाना सरकार के लिए प्राथमिकता बना हुआ है।



रिपोर्ट्स के मुताबिक अप्रैल 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें 935 डॉलर से 1000 डॉलर प्रति टन (89,437 रुपये से 95,660 रुपये प्रति टन ) तक पहुंच गई थीं। अब अगर इसे 45 किलो की एक बोरी के हिसाब से देखें तो 935 डॉलर/टन वाली यूरिया की एक बोरी की लागत करीब 4,024 रुपये बैठती है जबकि 1000 डॉलर/टन पर यही कीमत करीब 4,305 रुपये प्रति बोरी तक पहुंच जाती है। यानी दुनिया के कई हिस्सों में किसान एक बोरी यूरिया के लिए भारतीय किसानों की तुलना में 10 से 15 गुना ज्यादा कीमत चुका रहे हैं।



किन देशों में ज्यादा है यूरिया की कीमत?

वैश्विक कमोडिटी रिपोर्ट्स के मुताबिक:



  • जर्मनी में यूरिया का औसत भाव करीब 528 डॉलर प्रति टन रहा, यानी लगभग 50,508 रुपये प्रति टन
  • ब्राजील में यह करीब 392 डॉलर प्रति टन पहुंचा, यानी लगभग 37,502 रुपये प्रति टन
  • यूरोप और लैटिन अमेरिकी बाजारों में कई जगह यह कीमत 700 डॉलर प्रति टन से ऊपर चली गई

भारत में सिर्फ 300 रुपये में कैसे मिल रही है यूरिया?

इसका सबसे बड़ा कारण है सरकार की भारी सब्सिडी। भारत में 45 किलो की नीम-कोटेड यूरिया बोरी का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) करीब 242 रुपये तय है। टैक्स और अन्य शुल्क जोड़ने के बाद किसानों को यह करीब 266-300 रुपये में मिलती है जबकि इसकी असली लागत कई गुना ज्यादा होती है। उदाहरण के तौर पर, अगर एक बोरी यूरिया बनाने या विदेश से मंगाने में 3000 रुपये तक खर्च हो रहे हैं और किसान सिर्फ 300 रुपये दे रहा है, तो बाकी करीब 2700 रुपये सरकार सब्सिडी के रूप में खाद कंपनियों को देती है। यही वजह है कि भारत का खाद सब्सिडी बिल हर साल लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।



सरकार ने बजट में रखा बड़ा प्रावधान

सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में खाद सब्सिडी के लिए करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि किसानों को सस्ती दरों पर खाद मिलती रहे। उर्वरक विभाग का कहना है कि पश्चिम एशिया की स्थिति लगातार बदल रही है इसलिए पूरे साल की सब्सिडी जरूरत का अभी सटीक अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।



सरकार किसानों पर पूरा बोझ क्यों नहीं डालती?

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में खाद सिर्फ खेती का मामला नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण से भी जुड़ा मुद्दा है।



अगर यूरिया अचानक महंगी हो जाए तो:



  • खेती की लागत बढ़ जाएगी
  • अनाज और सब्जियों के दाम बढ़ेंगे
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा
  • महंगाई तेजी से बढ़ सकती है
  • इसी वजह से सरकारें वैश्विक संकट का पूरा असर किसानों पर नहीं डालतीं
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