ओडिशा के इस ज़िले में पहली बार हो रही स्ट्रॉबेरी की खेती, खुल रहे कमाई के नए रास्ते

Divendra Singh | Jan 30, 2026, 16:32 IST
Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection

ओडिशा के खोर्धा ज़िले में पहली बार ऑर्गेनिक स्ट्रॉबेरी की सफल खेती ने खेती की पारंपरिक सोच को बदल दिया है। यहाँ के किसानों ने वैज्ञानिक तकनीक, ड्रिप सिंचाई और जैविक तरीकों से यह साबित कर दिया कि सही मार्गदर्शन और मेहनत से किसान कम जमीन में भी ज्यादा कमाई कर सकते हैं।

<p>सुशांत भोला ने भी आधा एकड़ में स्ट्राबेरी के 11000 पौधे लगाए हैं।<br></p>

इन दिनों तो इनके गाँव के किसानों के साथ ही के आसपास के गाँवों के किसान भी यहाँ खेती देखने आते हैं, हर कोई यहाँ फ़सल की जानकारी लेने आ रहा है, अब लोगों के लिए नया ही तो है, क्योंकि पहली बार यहाँ पर स्टॉबेरी की खेती शुरू हुई है।



ओडिशा का खोर्धा ज़िला जहाँ पर अब तक खरीफ सीज़न में धान, उड़द और अरहर की खेती और रबी सीज़न में धान, उड़द, मूँग, चना जैसी परंपरागत फ़सलों की खेती होती आ रही थी, स्ट्रॉबेरी जैसी फ़सल के बारे में तो कोई सोच भी नहीं जा सकता था, लेकिन बागवानी विभाग की मदद से इस संभव हो पाया है। आमतौर पर स्ट्रॉबेरी को पहाड़ी और ठंडे इलाकों की फसल माना जाता रहा है, लेकिन यहाँ के छह किसानों ने इसकी शुरूआत की है।



बेगुनिया ब्लॉक के हाजा गाँव के सुशांत भोला ने भी आधा एकड़ में स्ट्राबेरी के 11000 पौधे लगाएँ हैं, खेती से पहले उनके भी मन शंका थी कि खेती हो पाएगी कि नहीं, कहीं नुकसान न हो जाए।



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


58 साल के सुशांत भोला गाँव कनेक्शन से बताते हें, "जब मैंने इसकी खेती शुरू की तो गाँव के लोग मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे कि क्या लगा रहे हो, नुकसान हो जाएगा। अब मैं 400 रुपए किलो स्ट्रॉबेरी बेच रहा हूँ, लोग मुझसे पूछने आते हैं कि मुझे भी इसकी खेती करा दो। मैंने आधे एकड़ जमीन में पूरी तरह जैविक तरीके से 11,000 पौधे लगाए हैं। शुरुआत में प्रति पौधा लगभग 700 ग्राम उत्पादन मिला है और सीजन के अंत तक करीब 5 लाख रुपये आमदनी हो जाएगी।"



स्ट्राबेरी की खेती की सबसे ख़ास बात है कि सभी किसानों ने रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी बनाकर गोबर खाद, जैविक घोल और प्राकृतिक रोग नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रही और फल की गुणवत्ता भी बेहतर हुई। आज जब बाजार में केमिकल-फ्री और ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है, तब इस तरह की खेती किसानों को नई पहचान और बेहतर दाम दिलाने का रास्ता खोल रही है।



राज्य बागवानी विभाग और कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से उन्होंने हिमाचल प्रदेश से ‘विंटर डॉन’ किस्म के पौधे मंगवाए, जो अलग जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने के लिए जानी जाती है। इसके साथ ही सोलर आधारित ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाई गई, जिससे पानी की बर्बादी रुकी और पौधों को ज़रूरत के अनुसार नमी मिलती रही।



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


सिको गाँव के 35 साल के आलोक बलियार सिंह ने जब स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए तो उनके पिता नाराज़ हो गए कि अगर नुकसान हुआ तो क्या करोगे। आलोक कहते हैं, "हमारे लिए तो ये एकदम नई फ़सल है, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि एक बार शुरूआत करो, बढ़िया कमाई होगी, लेकिन अब लग रहा है कि उनकी बात सही है। अगले साल और ज़्यादा खेती करूँगा।"



ये भी पढ़ें: सूखे इलाकों में बढ़िया पैदावार देगी बाजरे की नई क़िस्म, बीमारियों से भी नहीं होगा नुकसान



खेत से मिली शुरुआती पैदावार ने उम्मीद जगाई है। एक पौधे से औसतन 600 से 700 ग्राम तक स्ट्रॉबेरी मिली, जो इस क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इससे यह साफ है कि अगर तकनीकी मार्गदर्शन सही हो, तो कम ज़मीन पर भी किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


खोरधा की उद्यानिकी सहायक निदेशक श्रिया सस्वती कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि ओडिशा में पहली बार स्ट्राबेरी की खेती हो रही है, लेकिन अभी तक यहाँ कोरापुट और नुआपाड़ा जैसे ज़िलों में ही खेती हुई है, तो हमारे लिए ये बिल्कुल नया था। हमने सोचा कि जब वहाँ हो सकती है तो हम यहाँ भी कर सकते हैं, अभी तक भुवनेश्वर और खोर्धा जिले में नहीं हुईं थी।"



वो आगे कहती हैं, "हमने इस बार छह किसानों से शुरूआत की है, पौधे लगाने के 45 दिन बाद ही फल मिलने लगे हैं और उत्पादन भी बढ़िया मिल रहा है। हमने किसानों को खेती की ट्रेनिंग से लेकर बाज़ार तक उपलब्ध कराने में पूरी मदद की है।"



इस पहल का एक और बड़ा महत्व यह है कि इससे खेती में विविधता बढ़ रही है। ओडिशा के कई हिस्सों में किसान लंबे समय से परंपरागत फ़सलों पर निर्भर रहे हैं, जिससे जोखिम भी बढ़ जाता है। मौसम खराब हुआ या बाजार गिरा, तो पूरी आमदनी प्रभावित हो जाती है। स्ट्रॉबेरी जैसी वैकल्पिक फसलें किसानों को नया रास्ता देती हैं, जहां वे जोखिम को बाँट सकते हैं और अपनी आय के ज़रिया बढ़ा सकते हैं।



ये भी पढ़ें: इस नई विधि से बीस गुना तक बढ़ जाएगा अरहर का उत्पादन

Tags:
  • Odisha strawberry farming
  • Khordha strawberry cultivation
  • organic strawberry farming India
  • strawberry farming in red soil
  • strawberry farming Odisha
  • innovative farming Odisha
  • organic farming success story
  • farmer success story India
  • horticulture farming India
  • strawberry cultivation technique