सब्जियों की फसल बर्बाद होने से किसान और उपभोक्ता दोनों पर पड़ रही मार, लगभग दोगुने हुए हरी सब्जियों के दाम

पिछले एक हफ्ते में आलू का रेट लगभग दोगुना हो गया है तो हरी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। इस महंगाई में उपभोक्ता का तो नुकसान हो रहा ही है, किसानों को भी फायदा नहीं है क्योंकि पिछले दिनों हुई बारिश में उनकी ज्यादातर सब्जियां बर्बाद हो चुकी हैं।

सब्जियों की फसल बर्बाद होने से किसान और उपभोक्ता दोनों पर पड़ रही मार, लगभग दोगुने हुए हरी सब्जियों के दाम

पिछले दिनों हुई बारिश के चलते फसलों को भारी नुकसान हुआ है, जिसके चलते बाजार में सब्जियों की कीमतें बढ़ गई हैं। 

जो आलू फुटकर में 17 अक्टूबर से पहले 15 रुपए में था वो अब 20 से 25 रुपए किलो हो गया है जबकि 15 रुपए किलो वाली तरोई 30-40 रुपए किलो तक पहुंच गई है। टमाटर भी और लाल हो गया है और 50 रुपए किलो की तरह 80-90 रुपए तक बिक रहा है।

थोक से लेकर फुटकर तक हरी सब्जियों, टमाटर, प्याज और आलू के दाम इन दिनों 25 से 50 फीसदी तक बढ़े हुए हैं। महंगाई का असर सिर्फ शहर की मंडियों में नहीं गांव और कस्बों में भी साफ देखा जा रहा है।

लखनऊ की नवीन गल्ला मंडी में करीब 50 किलो तरोई लेकर आए बक्शी का तालाब तहसील के रैथा गांव के अनिल वर्मा (40 वर्ष) थोक में 110 से 125 रुपए की पांच किलो तरोई बेच रहे थे, ये रेट 10 दिन पहले से करीब 40 रुपए ज्यादा था लेकिन वो खुश नहीं थे।

अनिल कहते हैं, "10 दिन पहले तक खेत में एक कुंटल तक तरोई रोज निकलने लगी थी, तो 70-80 रुपए की परेसी (5 किलो) बेचने में भी ठीक पैसे मिल जाते थे लेकिन अब रेट ज्यादा है तो खेत में माल नहीं है। आधी से ज्यादा फसल बर्बाद हो गई। वर्ना आज-कल 2 कुंटल माल रोज लाते।'

बाराबंकी की तहसील फतेहपुर की मंडी में सब्जी के व्यापारी मो. मोबिन कहते हैं, "इस समय मंडी में हरी सब्जी की आवक बहुत ही कम हो गई है, जिससे सब्जियों के दामों में उछाल आ गया है। पिछले 15 दिनों की बात करें तो थोक में जो टमाटर 50 रुपए किलो मे बिकता था वह अब 80 रुपए तक पहुंच गया है। तोरई 15 की जगह 30 रुपए किलो बिक रही है तो लौकी जो 10 रुपए का पीस बिक रहा ता वो 20 का हो गया है। लगभग हर सब्जी महंगी है।"

उत्तर प्रदेश में 17 से 19 अक्टूबर को भारी बारिश हुई, जिसमें सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान है। बेल वाली सब्जियों (लौकी, तरोई, कद्दू,), पत्ते वाली ( मूली, धनिया, पालक) से लेकर फूल गोभी, पत्ता गोभी, बैंगन, टमाटर की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कई इलाके ऐसे थे जहां सब्जियों की फसलों की 60-90 फीसदी तक नुकसान हुआ है।

लगातार बारिश के बाद बाराबंकी के एक खेत में फूलगोभी की फसल की हालत। फोटो- वीरेंद्र सिंह

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रविवार को नवीन गल्ला मंडी में वो रौनक नहीं दिखी, क्योंकि हरी सब्जियों की आवक कम थी। नवीन गल्ला मंडी में सब्जी के कारोबारी नितिन सोनकर कहते हैं, " 10-15 दिन पहले लोकल (लखऩऊ आसपास) से हरी सब्जियां बहुत आने लगी थी। रेट काफी कम थे लेकिन अब दो दोगुने भी हो चुके हैं। क्योंकि खेत में माल नहीं है। कई सब्जियों की पूरी फसलें बर्बाद हुई है तो लता वाली सब्जियों में ऐसी बारिश और हवा में फूल-पत्ते गिर जाते हैं, जिन्हें दोबारा आने में 8-10 दिन लेंगे। तब तक ऐसा ही रहेगा।'

यूपी में हुई थी 814 फीसदी बारिश

14 से 20 अक्टूबर के बीच यूपी में सामान्य की 6.4 मिलीमीटर बारिश के मुकाबले 58.4 मिलीमीटर बारिश हुई जो औसत से 814 फीसदी ज्यादा थी।

यूपी के लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, शाहजहांपुर, पीलीभीत, लखीमपुर, हापुड़, गाजियाबाद, मेरठ, अयोध्या, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर और पूर्वांचल के बस्ती, मऊ, गोरखपुर समेत दर्जनों जिलों में मूसलाधार बारिश से खेत कई दिन जलमग्न रहे। जबकि आधा दर्जन से ज्यादा जिले अभी भी बाढ़ की चपेट में हैं। इन सबका असर सब्जी के उत्पादन पर पड़ा है।

सीतापुर के अशोक मौर्या, जिनकी गोभी की फसल और टमाटर की नर्सरी बर्बाद हुई। फोटो मोहित शुक्ला

देश में 329.86 फल-सब्जी उत्पादन का था अनुमान

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के मुताबिक इस वर्ष बागवानी (फल और सब्जियों) फसलों के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान था। 15 जुलाई को जारी दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक देश में साल 2020-21 में 329.86 मिलियन टन (अब तक का सर्वाधिक) बागवानी उत्पादन होने का अनुमान जताया गया था जो 2019-20 कि तुलना में 9.39 (2.93 फीसदी) ज्यादा था, लेकिन मानसून के दौरान लगातार बारिश बाढ़ ने यूपी से लेकर महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक सब्जियों की खेती को भारी नुकसान पहुंचाया है।

सीतापुर में गोंदलामऊ ब्लॉक में जरिगवां के किसान अशोक मौर्य ने 1 एकड़ गोभी लगाई थी, जिसमें 25 हजार की लागत आई थी लेकिन उन्हें खाने भर का एक फूल नहीं मिला। अक्टूबर के पहले और 17-19 की बारिश में पूरी फसल चौपट हो गई। वहीं उनके पास 3 एकड़ के लिए टमाटर की नर्सरी थी, उसमें भी भारी नुकसान हुआ है।

अशोक मौर्या बताते हैं, "पौध लगाने के लिये खेत तैयार नहीं हो पा रहे। 5000-6000 रुपये बीघा पर मैंने 15 बीघा (3 एकड़) जमीन किराए (लीज) पर ली है। इस बार अगैती टमाटर लगाने वाले थे लेकिन अब आधी से ज्यादा नर्सरी खराब हो चुकी है।" अशोक के मुताबिक किसान के खेत में टमाटर नहीं है तो अभी इतना महंगा है आगे भी खेती अच्छी नहीं गई तो और महंगाई ही आएगी।

बाराबंकी जिले के सौरंगा गांव के अजमत अली बड़े पैमाने पर कद्दू और लौकी की खेती करते हैं। इस बार भी उनकी फसल लगभग तैयार थी, उन्हें उम्मीद थी कि त्योहार (दिवाली) आदि के दौरान अच्छा मुनाफा मिलेगा। लेकिन अब वो खेत जुतवाने की बात कर रहे हैं।

अजमत कहते हैं, "लौकी, कद्दू और तरोई के उत्पादन पर बहुत असर पड़ा है। पूरा खेत टलहकर देख देख लीजिए एक भी बतिया नहीं बची है, सब मर गई हैं। पौधे सड़ रहे हैं। अगर ऐसा ही रहा जो सब्जी का खेत जोतकर दूसरी फसल की तैयारी करेंगे।"

बाराबंकी में कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 8000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में हरी सब्जी की खेती की जाती है, जबकि अट्ठारह हजार हेक्टेयर में आलू का उत्पादन लिया जाता है। अधिकारियों के मुताबिक आमतौर पर 20 अक्टूबर से 5 नवंबर तक आलू की बुवाई की जाती है लेकिन इस बार बरसात हो जाने के कारण आलू की बुवाई लेट हो जाएगी, जिसका आने वाले समय में भी आलू के उत्पादन पर असर आएगा।

सीतापुर के जिला उद्यान अधिकारी सौरभ श्रीवास्तव के मुताबिक बेमौसम बारिश के चलते अनुमानित 05 से 10 फ़ीसद नुकसान है,बाकी मौसम साफ़ होने पर ही सर्वे कराया जायेगा।

पीलीभीत जिले के पूरनपुर मंडी में जुगुल एंड कम्पनी के थोक सब्जी व्यवसायी राहुल गुप्ता गांव कनेक्शऩ को फोन पर बताते हैं, "बेमौसम बरसात के चलते सब्जियों के दामों में एकदम उछाल आया है। जो आलू 900 रुपये कुन्तल बिक रहा था वो एक दम दोगुने दामों में बिक रहा है। 1600 रुपये कुंतल में बिक्री हो रही है। प्याज पहले 1800 रुपये कुंतल था, वो 3000 रुपये प्रति कुंतल बिक रहा है। जब थोक बाजार में इतना उछाल आया है तो जाहिर सी बात है कि, ख़ुदरा बाजार में सब्जियों के दाम आसमान पर होंगे।"

भारी बारिश के चलते कन्नौज में आलू की अगैती फसल बर्बाद हो गई। फोटो- अजय मिश्रा

फसल बर्बाद होने पर किसान ने लगाई फांसी

बारिश से फसलों पर नुकसान इतना ज्यादा हुआ है कि कई इलाकों में किसानों की कमर ही टूट गई है। कन्नौज में 24 अक्टूबर को तिर्वा तहसील के सगरा गांव निवासी किसान नन्हेंलाल (55वर्ष) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उनके पास करीब 3 एकड़ जमीन जिसमें आधे में आलू और आधे धान थे। उनकी दोनों फसलें बर्बाद हो चुकी हैं।

किसान के खेत का मुआयना करने के बाद उपजिलाधिकारी तिर्वा राकेश त्यागी ने शनिवार को कहा, "मृतक नन्हेलाल की आलू व धान की फसलें करीब 80 प्रतिशत नष्ट हो गई थीं। फसलों के नुकसान की रिपोर्ट डीएम को भेज दी गई है। डीएम की ओर से मृतक के परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है।"

कन्नौज में लगभग 50 हजार हेक्टेयर आलू की खेती होती है, यहां किसान सितंबर के पहले-दूसरे हफ्ते से ही आलू बोना शुरु कर देते हैं जो कच्चा (50-60 दिन) खोदकर बेचते हैं। लेकिन इस बार इन्हें भी भारी नुकसान हुआ है, जिसका खामियाजा आऩे वाले दिनों में आलू खाने वालों को भी चुकाना पड़ा सकता है क्योंकि पूरी आलू बेल्ट में आलू की अगौती फसल को नुकसान हुआ है।

सर्दियों में भी महंगी हो सकती हैं सब्जियां

सर्दियों को हरी सब्जियों का मौसम भी कहा जाता है क्योंकि मौमस अनुकूल रहने से मैदानी इलाकों में जमकर सब्जियां होती हैं। नवंबर से लेकर फरवरी तक आऩे वाली फसलों की बुवाई, सितंबर से लेकर नवंबर तक की जाती है लेकिन इस बार शुरुआत के दो महीने बारिश की भेंट चढ़ गए हैं।

कन्नौज के उद्यान विभाग के कन्नौज कार्यालय के मुताबिक जिले में 142 कोल्ड स्टोरेज हैं। इसमें 1445986.71 मीट्रिक टन आलू रखने की क्षमता है। पिछले साल हुई फसल के बाद 1229088 मीट्रिक टन आलू कोल्ड स्टोरेज में भंडारण किया गया था। अब 50 से 60 फीसदी तक निकासी हो चुकी है।

कन्नौज के उद्यान निरीक्षक अनुज कटियार का कहना है कि 'करीब 50 हजार हेक्टेयर में आलू की खेती होती है। तकरीबन 50 फीसदी आलू की निकासी हो चुकी है। जो आलू बचा है, उसमें किसानों व व्यापारियों दोनों का है। जो आलू बीज बोया गया था, वह बरसात में बेकार हो गया। अब 50 रुपए से लेकर 100 रुपए पैकेट तक रेट बढ़ गया है। आगे भी बढ़ने की संभावना है।"

बाराबंकी जिले के हरख और मसौली ब्लॉक में बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती होती है। ज्यादातर किसान सितंबर से आखिर से लेकर अक्टूबर तक टमाटर की पौध की रोपाई करते हैं। हरख ब्लॉक में बरैया गांव के किसान आशीष। (35 वर्ष) कहते हैं, हमने खेतों में टमाटर के पौधे रोप दिए थे अच्छा पौधा चल रहा था लेकिन लगातार बरसात के कारण सारे पौधे सूख गए हैं, क्योंकि खेत में इतना पानी भर गया था। अब नर्सरी हमारे पास नहीं बची है कि हम फिर से रोपाई कर सकें।

सीतापुर में पहला ब्लाक के गजराजपुर गांव के मंगल प्रसाद पिछले 10 वर्षों से आलू की खेती करते आ रहे हैं। इस बार भी उनका 10 एकड़ खेत बुवाई के लिए तैयार थी लेकिन बारिश हो गई। अब न सिर्फ बुवाई लेट हो गई।

बाराबंकी से वीरेंद्र, सीतापुर से मोहित और कन्नौज से अजय मिश्रा की रिपोर्ट


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