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लॉकडाउन और मौसम के बीच पिसते 3 राज्यों के संतरा किसान, टपक रही फसल के खरीददार नहीं

Arvind ShuklaArvind Shukla   30 March 2020 8:18 AM GMT

जिस रेट (50 रुपए किलो) में हम और आप दिल्ली-मुंबई लखनऊ जैसे शहर में संतरा खरीद कर खा रहे हैं उसका अगर आधा भी रेट जोड़े तो हर्लद कुल्ले को 2 लाख से ढाई लाख रुपए का नुकसान सिर्फ 6-7 दिनों में हो चुका है।

लॉकडाउन के बीच भारी बारिश और ओलावृष्टि से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के किसान हर्लद के बाग में करीब 10 टन (100 कुंतल) संतरा बाग में गिर गए। महाराष्ट्र में नागपुर से सटे छिंदवाड़ा जिले में पांढुरना (तहसील) को संतरे की मंडी भी कहा जाता है। यहां बड़े पैमाने पर संतरे की खेती होती है लेकिन लॉकडाउन के पहले मौसम और फिर लॉकडाउन के चलते किसानों के बाग तक कारोबारी नहीं पहुंचे। छोटे किसान भी मंडी तक अपना माल नहीं पहुंचा पाए, जिसके चलते इन किसानों को लाखों रुपए का नुकसान हो गया है।

"पिछले हफ्ते में हवा और ओलों से करीब 10 टन संतरा बाग में झड़ गया। अगर 20 रुपए किलो का भी रेट जोड़े तो 10 लाख का नुकसान हुआ। कोरोना के चलते व्यापारी लोग माल उठाने ही नहीं आ रहे हैं। हमारे इलाके में 80 फीसदी किसान संतरे की ही खेती करते हैं सबका बहुत नुकसान हो रहा है।" हर्लद फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं।

जिस वक्त गांव कनेक्शन से हर्लद कुल्ले की फोन पर बात हो रही थी, वो अपने शहर के नजदीक (पांढुरना) के निकट की अपनी साढ़े छह एकड़ की बाग में थे। हर्लद कहते हैं, पिछले 2 घंटे से लगातार बारिश हुई ये हमारे लिए बर्बादी की बारिश है। अगर आप (पत्रकार) हमारे लिए कुछ करना चाहते हो तो संतरे का परमिट दिलवा दो, संतरा कच्चा माल है, ये आगे बढ़ते रहना चाहिए। अगले 15-20 दिन में संतरा नहीं टूटा तो कुछ हाथ नहीं आएगा।"


नींबू वर्गीय फलों में संतरा प्रमुख फसल है। इसके अलावा नारंगी, माल्टा, मौसंबी किन्नू भी रसदार मीठे फलों में खूब पसंद किए जाते हैं। पूरी दुनिया में 114 देशों में नींबू वर्गीय इन फसलों की बागवानी होती है। दुनिया में संतरे की सबसे ज्यादा खेती चीन में होती है जबकि सबसे ज्यादा नींबू भारत में पैदा होता है। संतरा गर्मी वाली जलवायु में अच्छे पनपता है। भारत में संतरे की फसल किसान दो बार लेते हैं। कुछ गर्मियों में जबकि कुछ सर्दियों वाली फसल लेते हैं। इस बार मानसून में अच्छी और लंबे समय तक हुई बारिश से संतरे की फसल अच्छी थी। शुरुआत में किसानों को लाभ हो रहा था।

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में बारिश के बाद गिरे पड़े संतरे के फल।

चीन में कोविड 19 यानि महामारी फैलाने वाले वायरस कोरोना के चलते संतरे की खेती प्रभावित हुई। चीन के बुहान से जनवरी में कोरोना के मरीज मिलने शुरु हो गए। चीनी संतरे का कारोबार प्रभावित होने से शुरुआत में भारत के संतरा किसानों को काफी फायदा हुआ लेकिन बाद में मौसम और लॉकडाउन से नुकसान हो गया।

भारत में संतरे की खेती महाराष्ट्र के नागपुर, विदर्भ इलाके में बड़े पैमाने पर होती है तो मध्य प्रदेश में नागपुर से सटे छिंदवाड़ा, शाजापुर, रायगढ़ और मालवा बेल्ट में बड़े पैमाने पर होती है। इसके साथ ही राजस्थान में झालावाड़ और मध्य प्रदेश से सटे कुछ इलाकों में किसान संतरा की बाग लगाते हैं। तो पंजाब और हरियाणा में कई जगह किसान किन्नू की खेती करने लगे हैं। किसानों की माने तो अगर सही से फसल और रेट दोनों सही हो जाएं तो प्रति एकड़ 3 से 5 लाख का मुनाफा हो सकता है।

कोरोना और लॉकडाउन के बीच मौसम की मार झेल रहे किसानों का कहना अगर अगले 15-20 दिनों में फसल टूट कर नहीं बिकी तो उन्हें बहुत नुकसान हो जाएगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान सरकारों से सोशल मीडिया पर भी गुहार लगा रहे हैं।

किसान पंकज पाटीदार ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ट्वटीर पर लिखा कि " मामाजी किसानों के संतरे के बगीचे पूर्ण रूप से पक चुके हैं अगर 21 दिन तक ये फल किसान बेच नहीं पाया तो सारा फल गिर कर खराब हो जाएगा। पौधों की संख्या ज्यादा होने पर किसान स्वयं मंडी में नहीं बेच सकता इसलिए जो लोग बगीचे का फल लेते है उन्हें गांव में आने दिया जाए।"


वहीं एक अन्य किसान ने राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट से अपील की है कि वो संतरा किसानों के लिए कुछ काम करें। "झालावाड़ जिले में किसानों की संतरे की फसल पौधे पर खराब हो रही है। अब संतरे का टूटने का समय आ गया है लेकिन कोरना वायरस के कारण वाहनों ओर मंडियों पर रोक लगाने के कारण संतरे को मंडी तक नहीं पहुंचा पा रहे है इसलिए में किसानों की ओर से हाथ जोड़ कर विनती करता हूं कि मंडी खुलवाएं।'

छिंदवाड़ा के ही किसान नरेंद्र ठाकरे कहते हैं, एक झाड़ (पौधे) से करीब 5-6 कैरेट संतरा निकलता है। मतलब एक से डेढ़ कुंतल संतरा हर पौधे से निकलते हैं। इस बार 14-15 रुपए से शुरुआत हुई थी, और कोरोना से पहले 20-22 रुपए किलो का थोक में रेट मिल रहा था, गर्मियां बढ़ने पर रेट और बढ़ जाते हैँ। लेकिन मार्च में मौसम ने नुकसान किया फिर लॉकडाउन हो गया। ये हमारे लिए विकट स्थिति पैदा हो गई। बागों में संतरा उठाने तक के लिए मजदूर नहीं मिल रहे।"

किसानों की लगातार मांगों और लॉकडाउन में कृषि संकट को देखते हुए केंद्रीय गृहमंत्रालय ने किसानों को कई सहूलियतें दी हैं, जिनमें जरुरी चीजों के लिए आवागमन जारी रहेगा। मंडियां खुलती रहेंगी। हालांकि ये आदेश पहले भी थे लेकिन लॉकडाउन में सख्ती का पालन करने के चलते पुलिस के डर से ट्रांसपोर्टर्स गाड़ियां नहीं चलवा रहे थे।

मध्य प्रदेश में शाजापुर जिले के जनसंपर्क अधिकारी अनिल चांदुलकर गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "शुरुआत में मुश्किल थी, लेकिन बाद में एसडीएम के माध्यम से कारोबारियों को पास दिए जा रहे हैं। हमारे यहां की बात करें तो 80 फीसदी किसान संतरा पहुले ही बेच चुके थे। कई किसान अच्छे रेट के इंतजाम में थे, उन्हें लॉकडाउन के बीच ओलावृष्टि आदि से नुकसान हुआ, कारोबारी अब जा रहे हैं।"

मार्च महीने से गर्मी बढ़ने और नवरात्र के चलते हजारों संतरा किसानों ने अपने संतरा नहीं तोड़े थे, इन्हें सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। बारिश के चलते संतरे पीले होकर नीचे गिर रहे हैं। किसानों के मुताबिक ज्यादा दिन तक संतरों का पेड़ पर रहना पेड़ को भी नुकसान पहुंचाता है।

किसानों के सोशल मीडिया में आवाज उठाने के बाद कई लोगों ने किसानों को सलाह दी कि वो संतरे की प्रोसेसिंग शुरु करें। जूस और जैम निकालकर मौसम के बाद बेचे। महाराष्ट्र के साथ ही मध्य प्रदेश कि छिंड़वाड़ा में मूल्य संवर्धन (फूड प्रोसेसिंग) के जरिए संतरे के उत्पादन बनाने जाने की कवायद लंबे समय चल रही है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ छिंदवाड़ा से सियासी संबंध रखते हैं। उन्होंने अपनी सरकार में वहां संतरे से जैली, जैम और सौंदर्य उत्पाद बनाने की भी बात की थी।


संतरे के उत्पाद बनाने आम किसानों के लिए आसान काम है? इस सवाल के जवाब में महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाले कृषि अर्थशास्त्री विजय जवांधिया कहते हैं, अगर संतरे का उत्पाद बनाकर बेचना इतना आसान और मुनाफे का काम होता होता तो नमक तक बनाने वाले अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट इस कारोबार में न होते?"

कोरोना की विश्वव्यापी महामारी का असर कृषि पर अब साफ नजर आने लगा है। आने वाले समय में देश के कई देशों में खाद्य संकट भी दस्तक दे सकता है। मंदी की भी आहट के बीच ऐसे जिन किसानों के पास उत्पाद है और बाजार नहीं मिल रहा वो हर्षद कुल्ले की तरह अपनी किस्मत को भी कोस रहे हैं।

हर्षद कुल्ले कहते हैं, मैंने सुना है कि कोरोना की अब तक दवा नहीं बनी है लेकिन जिनकी इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) अच्छी होती है वो बीमारी से बच जाते हैं, संतरे में विटामिन सी खूब होता है जिससे इम्यूनिटी बढ़ती है, उससे बाजार में जाना दिया जो तो किसान और आम लोग के लिए अच्छा ही होगा।' -



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