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केले की गांठों को बेचकर किसान कमा रहे मुनाफा

गाँव कनेक्शन | Dec 15, 2016, 21:10 IST
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केले की खेती
सुधा पाल

लखनऊ। टिश्यू कल्चर से केले की खेती करने वाले किसान न केवल अच्छा और बेहतर उत्पादन कर रहे हैं बल्कि इन पौधों से निकलने वाली गांठों को बेचकर भी अतिरिक्त आय कमा रहे हैं। लगभग 14 से 18 रुपए की कीमत वाली इन गांठों की खूबियों की वजह से इनके खरीदारों (केला उत्पादक) की संख्या में भी काफी बढ़ोतरी आई है।

परंपरागत खेती की अपेक्षा टिश्यू कल्चर से केले की खेती करके केला किसान काफी संतुष्ट हो रहे हैं। किसान आधुनिक खेती अपनाकर कम समय में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। कम लागत और समय में जहां किसान इसके उत्पादन से अच्छा और ज़्यादा मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं केले के पौधों की गांठें भी उनके व्यापार को बढ़ा रही हैं। किसान उत्पादन के साथ केले की इन गांठों को भी अपने अतिरिक्त आय का स्रोत बना रहे हैं। बाज़ार में बेमौसम केले के पौधों की मांग के कारण इन टिश्यू कल्चर वाली गांठों की कीमत भी ज़्यादा है। एक एकड़ में लगभग 1250 पौधे 6.6 इंच की दूरी पर लगाए जाते हैं।

उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण महासंघ के अध्यक्ष बलराम सिंह ने बताया कि सरकार भी किसानों को पौधों की खरीद के लिए लगभग 65000 रुपए का अनुदान देती है। उन्होंने बताया कि किसान इन गांठों के जरिए पौधों से एक घार में लगभग 50 किलो तक केला उत्पादन कर सकते हैं। आम गांठ से प्राप्त पौधों का विकास धीमा और असमान वृद्धि होने के साथ उत्पादन मिलने में भी अधिक समय लगता है। साथ ही मेहनत, मजदूरी, दवा व खाद आदि में लागत अधिक लगती है। वहीं टिश्यू कल्चर केला पौधों की गांठ में तेजी से विकास और समान वृद्धि होती है। इसके साथ ही इन गांठों से पूरी फसल रोगमुक्त होती है।

पहले पौधों को केवल खरीदता था। केले की खेती की शुरुआत किे ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। लेकिन जानकारी के बाद अब टिश्यू कल्चर से हुए पौधों के साथ गांठों को भी बेचता हूं, दोगुना मुनाफा है। रोग भी नहीं लगते और स्वस्थ फल होते हैं।
मुन्ना, किसान

इन गांठों से विकसित पौधों की मृत्यु दर लगभग नहीं होती है जबकि साधारण गांठ से प्राप्त 15 फीसदी पौधे मर जाते हैं। किसान इन गांठों से मिले पौधों से उत्पादन करने के साथ इनकी गांठों को संरक्षित करके इन्हें बेच भी रहे हैं। इस तरह उत्पादन की कीमत के साथ इन्हें गांठों की भी कीमत मिल रही है। कुछ किसान इन गांठों की पहले से ही बुकिंग करा लेते हैं जिससे उन्हें पौधे मिलने में कोई परेशानी न आए।

प्रगतिशील किसानों के लिए बेहतर है। गांठों की सही देखभाल करके किसान इससे भी अतिरिक्त आय कमा सकते हैं। मिट्टी से होने वाले वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन जो कि इन टिश्यू कल्चर केले की गांठों के लिए नुकसानदायक है, किसानों को ध्यान देने की आवश्यकता है।
संगीता पांडे, (टिश्यू कल्चर केला पौध विशेषज्ञ)

प्रदेश के लिए उत्तम है जी 9

राज्य की जलवायु को देखते हुए ग्रैन्ड नेन (जी-9) प्रजाति के केले के पौधों को टिश्यू कल्चर से लैब में तैयार किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की श्रेष्ठ और देश के हर कोने में पाई जाने वाली यह जाति उत्पादन और निर्यात के लिए श्रेष्ठतम किस्म है। इस प्रजाति के पौधे छोटे और मजबूत होते हैं जिससे आंधी-तूफान में टूटकर पौधों के खराब या नष्ट होने की संभावना कम होती है। जी-9 की विशेषता यह है कि यह महज 9-10 महीने में तैयार हो जाता है।

इसके साथ ही पकने के बाद सामान्य तापमान पर 12 से 15 दिन में उपचार करने पर एक महीने बाद तक केले के फल में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होती है। केले का फल बीजरहित, आकार में बड़ा और काफी मीठा होता है। इसके अतिरिक्त रोबस्टा और श्रीमंथी भी अधिक पैदावार वाली अच्छी किस्में हैं।

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