साल के आख़िर में वे किसान जिन्होंने खेती का भविष्य गढ़ा
Dec 30, 2025, 14:58 IST
साल 2025 के अंत में हम आपको मिलवा रहे हैं भारत के उन किसानों से जिन्होंने खेती को परंपरा से आगे ले जाकर नवाचार, संरक्षण और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया। बीज बैंक से लेकर पर्माकल्चर, मछली पालन से लेकर कीवी और कॉफ़ी तक - ये कहानियाँ भविष्य की खेती की दिशा दिखाती हैं।
साल के आख़िर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कुछ चेहरे हमें सिर्फ़ प्रेरित नहीं करते, वे हमें हमारी जड़ों से दोबारा जोड़ते हैं। ये वे किसान हैं जिन्होंने खेती को केवल पेट भरने का ज़रिया नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने का औज़ार बनाया।
कहीं बीज बचाए जा रहे हैं, कहीं जंगल उगाए जा रहे हैं, कहीं मछलियों का इलाज हो रहा है तो कहीं कॉफ़ी और कीवी जैसे नए सपने पहाड़ों में जड़ पकड़ रहे हैं।
ये कहानियाँ किसी एक राज्य या फसल की नहीं हैं- ये भारत के गाँवों से उठती उस सोच की कहानियाँ हैं, जो आने वाले कल को बदल रही है।
सतना ज़िले के एक साधारण गाँव में रहने वाले पद्मश्री बाबूलाल दहिया ने खेती को भविष्य की सुरक्षा से जोड़ दिया। जब दुनिया आधुनिक बीजों की ओर भाग रही थी, तब उन्होंने देसी बीजों को सहेजना शुरू किया। बचपन की गुल्लक से प्रेरित होकर उन्होंने एक अनमोल “बीज बैंक” खड़ा किया, जिसमें सैकड़ों पारंपरिक किस्मों के बीज सुरक्षित हैं।
बाबूलाल दहिया मानते हैं कि बीज सिर्फ़ उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वाद और जलवायु-अनुकूलता की कुंजी हैं। वे गाँव-गाँव जाकर पुराने किसानों से बीज इकट्ठा करते हैं, उन्हें उगाकर पुनर्जीवित करते हैं और फिर आगे बाँटते हैं। उनका काम वैश्विक स्तर के सीड वॉल्ट जैसा भले न हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक मजबूत दीवार है।
उनकी कहानी बताती है कि बड़े बदलाव सरकारी फाइलों से नहीं, बल्कि मिट्टी से शुरू होते हैं।
असम के चिरांग ज़िले के एक गाँव से निकलकर सर्वेश्वर बासुमतारी ने यह साबित किया कि पढ़ाई की डिग्री नहीं, सोच की डिग्री ज़रूरी होती है। पाँचवीं तक पढ़े, कभी दिहाड़ी मजदूर रहे सर्वेश्वर ने अपनी ज़मीन को प्रयोगशाला बना दिया। कम ज़मीन में बहु-फसली खेती, फल-सब्ज़ी, पशुपालन और मछली पालन, सब कुछ एक साथ। उनके खेत में कुछ भी बेकार नहीं जाता। वे मानते हैं कि 25 बीघा में वही कमाई हो सकती है जो लोग 100 बीघा में करते हैं।
आज उनके खेत देखने वैज्ञानिक और किसान आते हैं। सर्वेश्वर की असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने यह भरोसा लौटाया कि सीमित संसाधनों में भी आत्मनिर्भर खेती संभव है।
आकाश चौरसिया उन किसानों में हैं जिन्होंने खेती को प्रशिक्षण और आंदोलन में बदल दिया। अब तक 80,000 से अधिक किसानों को ट्रेनिंग और 12 लाख से ज़्यादा लोगों तक जानकारी पहुँचाना कोई सामान्य उपलब्धि नहीं। उनकी मल्टीलेयर फार्मिंग तकनीक छोटे किसानों के लिए वरदान है, जहाँ एक ही खेत में कई स्तरों पर फसलें उगाकर आमदनी बढ़ाई जाती है।
आकाश मानते हैं कि समस्या ज़मीन की कमी नहीं, सोच की कमी है। उनकी कहानी यह सिखाती है कि खेती सिर्फ़ उत्पादन नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रसार भी हो सकती है।
गुजरात के लुनासन गाँव में अमोल खडसरे ने बंजर ज़मीन पर जंगल उगा दिया। पर्माकल्चर के ज़रिए उन्होंने यह दिखाया कि बिना रसायन, बिना कीटनाशक भी खेती फल-फूल सकती है। उनके खेत में हजार से अधिक पौधों की प्रजातियाँ हैं-फल, सब्ज़ियाँ, औषधीय पौधे, घास, सब एक साथ। यह खेत सिर्फ़ खेती नहीं, एक जीवित इकोसिस्टम है।
अमोल की खेती कम लागत, कम जोखिम और बहु-आय का मॉडल है। उनकी सोच सीधी है, जो प्रकृति देती है, उसे वापस लौटाओ। उनकी कहानी भविष्य की खेती का नक्शा है।
पंजाब में उमेंद्र दत्त बीस साल से एक चुप लेकिन गहरी लड़ाई लड़ रहे हैं, रसायन और कीटनाशकों के खिलाफ़। वे मानते हैं कि आज की खेती सिर्फ़ मिट्टी ही नहीं, इंसान को भी बीमार कर रही है। लगातार संवाद, प्रशिक्षण और भरोसे के ज़रिए उन्होंने हज़ारों किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ा। उमेंद्र की खासियत यह है कि वे किसी मंच के नायक नहीं, बल्कि खेतों के साथी हैं।
उनकी कोशिशों का असर शायद आप उन्हें जाने बिना भी महसूस करते हों, आपकी थाली में थोड़ा सुरक्षित खाना बनकर।
बागेश्वर के शामा गाँव में भवान सिंह कोरंगा ने यह साबित किया कि पहाड़ों में भी वैश्विक फसलें उग सकती हैं। शिक्षक से किसान बने भवान सिंह ने कीवी फल की खेती शुरू की और पूरे गाँव की तस्वीर बदल दी। आज कीवी ने यहाँ रोजगार, पहचान और आत्मविश्वास दिया है। उन्होंने अपने बेटे को भी शहर से वापस गाँव बुला लिया- यह संदेश देते हुए कि खेती भी एक सम्मानजनक करियर है।
भवान सिंह की कहानी पहाड़ों के लिए उम्मीद है, जहाँ खेती पलायन रोकने का साधन बन सकती है।
बस्तर की लाल मिट्टी में राजाराम त्रिपाठी ने सिर्फ़ फसल नहीं, भरोसा बोया। बैंकिंग सेक्टर छोड़कर उन्होंने मसाले और औषधीय फसलों की राह दिखाई। धान पर निर्भरता से बाहर निकलकर उन्होंने किसानों को बाज़ार से जोड़ा। बिना भारी लागत, बिना रसायन- उनकी खेती ने बस्तर को एक नया आर्थिक विकल्प दिया। राजाराम की कहानी बताती है कि सही फसल, सही बाज़ार और सही सोच मिल जाए तो सबसे पिछड़ा इलाका भी आगे बढ़ सकता है।
इन किसानों ने यह साल नहीं बदला, इन्होंने आने वाले सालों की दिशा बदली है।
उत्तर प्रदेश में संजय श्रीवास्तव की पहचान किसी सरकारी अफ़सर या वैज्ञानिक के रूप में नहीं, बल्कि “मछलियों के डॉक्टर” के रूप में है। उनकी यात्रा एक छोटे तालाब से शुरू हुई, जहाँ उन्होंने देखा कि मछलियाँ मर रही हैं, लेकिन किसान नहीं जानते कि क्यों। यहीं से उन्होंने मछली रोगों को समझना शुरू किया। आज उनके पास देशभर से किसान, इंजीनियर और नौकरी छोड़ चुके युवा आते हैं, जो मछली पालन में भविष्य देखना चाहते हैं। संजय सिर्फ़ इलाज नहीं बताते, बल्कि पूरे इकोसिस्टम को समझाते हैं, पानी, आहार, तापमान और रोग के रिश्ते को।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने गाँव में रहकर यह साबित किया कि विशेषज्ञता शहरों की मोहताज नहीं। उनकी वजह से सैकड़ों मछली पालकों की आमदनी स्थिर हुई है और कई लोगों को पलायन नहीं करना पड़ा।
संजय की कहानी यह सिखाती है कि जब ज्ञान ज़मीन से जुड़ता है, तो वह रोज़गार भी बनता है और आत्मसम्मान भी।
मेघालय की जयंतिया पहाड़ियों में जहाँ कभी लोग खतरनाक कोयला खदानों में काम करते थे, वहीं ट्रिनिटी सायो ने हल्दी को नया जीवन दिया। लकडॉन्ग हल्दी - दुनिया की सबसे अधिक करक्यूमिन वाली किस्म, को उन्होंने किसानों की आमदनी का ज़रिया बनाया। आज जिन हाथों में कभी कोयले की कालिख थी, उन्हीं हाथों में हल्दी की गांठें हैं।
ट्रिनिटी की कोशिश सिर्फ़ खेती बदलने की नहीं, बल्कि जीवन बदलने की है। वे चाहते हैं कि किसान खतरनाक रोज़गार छोड़कर सुरक्षित, टिकाऊ खेती अपनाएँ। उनकी कहानी दिखाती है कि सही फसल और सही बाज़ार मिल जाए, तो गाँवों से भी वैश्विक पहचान बन सकती है।
कोरापुट के जंगलों में सुशांत पांडा ने वह किया, जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी, कॉफ़ी की खेती। बंजर ज़मीन, विरोध और जोखिम के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज उनकी कॉफ़ी अपनी गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। सबसे बड़ी बात यह कि उनके बाग़ान में दर्जनों आदिवासी महिलाओं को रोज़गार मिला है।
कॉफ़ी के साथ-साथ उन्होंने होम-स्टे और कैफ़े भी शुरू किया, जिससे गाँव पर्यटन से भी जुड़ गया। सुशांत की कहानी बताती है कि पढ़े-लिखे युवा अगर खेती में आएँ, तो खेती भी एक प्रोफेशन बन सकती है।
केरल के वायनाड में चेरुवयल के रमन ने अपनी ज़िंदगी देसी बीजों को बचाने में लगा दी। जब सब हाइब्रिड की ओर भाग रहे थे, रमन बीते कल को बचाने में जुटे थे। उन्होंने सैकड़ों देसी धान की किस्में इकट्ठा कीं, उगाईं और बाँटीं। उनके लिए बीज सिर्फ़ खेती नहीं, संस्कृति हैं।
आज उनके घर पर वैज्ञानिक, छात्र और किसान सीखने आते हैं। रमन की कहानी यह याद दिलाती है कि भविष्य की खेती, अतीत को सहेजे बिना संभव नहीं।
कर्नाटक के तुमकुर ज़िले की श्वेता ने एक, फसल खेती से निकलकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग अपनाई। नारियल, सुपारी, सब्ज़ी, पशुपालन और मछली पालन- सब एक साथ।
उन्होंने न सिर्फ़ अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि गाँव की महिलाओं को भी जोड़ा। स्वयं सहायता समूह बनाकर श्वेता ने दिखाया कि खेती महिला नेतृत्व में भी फल-फूल सकती है। उनकी कहानी उद्यमिता और धैर्य की मिसाल है।
उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में प्रेम सिंह ने परंपरागत खेती की विफलताओं से सीख लेकर “आवर्तनशील खेती” विकसित की। खेती, बागवानी और पशुपालन को जोड़कर उन्होंने ऐसा मॉडल बनाया, जिसे आज 30 से अधिक देशों के किसान देखने आते हैं। उनका विश्वास है, प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं, सह-अस्तित्व। प्रेम सिंह ने साबित किया कि खेती भी दर्शन हो सकती है।
विमल नौटियाल कभी बड़े होटलों में पेस्ट्री बनाते थे, आज उत्तराखंड के पहाड़ों में सेब और अखरोट उगाते हैं। उन्होंने शहर की चमक छोड़कर गाँव की मिट्टी चुनी। शुरुआत में लोगों ने उन्हें पागल कहा, लेकिन आज उनके बाग़ मिसाल हैं। विमल की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए है, जो गाँव लौटना चाहते हैं लेकिन डरते हैं।
वह दिखाते हैं कि जड़ों में लौटना हार नहीं, नई शुरुआत है। साल के आख़िर में किसानों की वो कहानियाँ जो आगे का रास्ता दिखाती हैं
यह साल खेती के लिए सिर्फ़ चुनौतियों का नहीं, बदलाव और उम्मीद का भी रहा। देश के अलग-अलग कोनों में ऐसे किसान खड़े हुए जिन्होंने न सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी बदली, बल्कि खेती के मायने भी बदल दिए। किसी ने बीज बचाए, किसी ने जंगल को शिक्षक बनाया, किसी ने ज़हर-मुक्त खेती की अलख जगाई, तो किसी ने पहाड़ों और आदिवासी इलाकों में नए सपनों की खेती की।
ये कहानियाँ सिर्फ़ खेती की नहीं है, ये भविष्य, आत्मनिर्भरता और गाँव से निकलती रोशनी की कहानियाँ हैं।
कहीं बीज बचाए जा रहे हैं, कहीं जंगल उगाए जा रहे हैं, कहीं मछलियों का इलाज हो रहा है तो कहीं कॉफ़ी और कीवी जैसे नए सपने पहाड़ों में जड़ पकड़ रहे हैं।
ये कहानियाँ किसी एक राज्य या फसल की नहीं हैं- ये भारत के गाँवों से उठती उस सोच की कहानियाँ हैं, जो आने वाले कल को बदल रही है।
बाबूलाल दहिया: बीजों की गुल्लक वाला किसान (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के पद्मश्री किसान बाबूलाल दहिया।
बाबूलाल दहिया मानते हैं कि बीज सिर्फ़ उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वाद और जलवायु-अनुकूलता की कुंजी हैं। वे गाँव-गाँव जाकर पुराने किसानों से बीज इकट्ठा करते हैं, उन्हें उगाकर पुनर्जीवित करते हैं और फिर आगे बाँटते हैं। उनका काम वैश्विक स्तर के सीड वॉल्ट जैसा भले न हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक मजबूत दीवार है।
उनकी कहानी बताती है कि बड़े बदलाव सरकारी फाइलों से नहीं, बल्कि मिट्टी से शुरू होते हैं।
सर्वेश्वर बासुमतारी: छोटी ज़मीन, बड़ी सोच (असम)
असम के किसान सर्बेश्वर बासुमतारी
आज उनके खेत देखने वैज्ञानिक और किसान आते हैं। सर्वेश्वर की असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने यह भरोसा लौटाया कि सीमित संसाधनों में भी आत्मनिर्भर खेती संभव है।
आकाश चौरसिया: मल्टीलेयर फार्मिंग का शिक्षक (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के किसान आकाश चौरसिया
आकाश मानते हैं कि समस्या ज़मीन की कमी नहीं, सोच की कमी है। उनकी कहानी यह सिखाती है कि खेती सिर्फ़ उत्पादन नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रसार भी हो सकती है।
अमोल खडसरे: जंगल को शिक्षक मानने वाला किसान (गुजरात)
गुजरात के किसान अमोल खडसरे
अमोल की खेती कम लागत, कम जोखिम और बहु-आय का मॉडल है। उनकी सोच सीधी है, जो प्रकृति देती है, उसे वापस लौटाओ। उनकी कहानी भविष्य की खेती का नक्शा है।
उमेंद्र दत्त: ज़हर-मुक्त खेती की आवाज़ (पंजाब)
पंजाब के किसान उमेंद्र दत्त।
उनकी कोशिशों का असर शायद आप उन्हें जाने बिना भी महसूस करते हों, आपकी थाली में थोड़ा सुरक्षित खाना बनकर।
भवानी सिंह कोरंगा: पहाड़ों में कीवी का सपना (उत्तराखंड)
उत्तराखंड के किसान भावन सिंह कोरंगा
भवान सिंह की कहानी पहाड़ों के लिए उम्मीद है, जहाँ खेती पलायन रोकने का साधन बन सकती है।
राजाराम त्रिपाठी: बस्तर में बदलाव की खेती (छत्तीसगढ़)
छत्तीसगढ़ के किसान राजाराम त्रिपाठी
इन किसानों ने यह साल नहीं बदला, इन्होंने आने वाले सालों की दिशा बदली है।
डॉ. संजय श्रीवास्तव: मछलियों के डॉक्टर (उत्तर प्रदेश)
उत्तर प्रदेश के मछलियों के डॉक्टर संजय श्रीवास्तव
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने गाँव में रहकर यह साबित किया कि विशेषज्ञता शहरों की मोहताज नहीं। उनकी वजह से सैकड़ों मछली पालकों की आमदनी स्थिर हुई है और कई लोगों को पलायन नहीं करना पड़ा।
संजय की कहानी यह सिखाती है कि जब ज्ञान ज़मीन से जुड़ता है, तो वह रोज़गार भी बनता है और आत्मसम्मान भी।
ट्रिनिटी सायो: कोयले से हल्दी तक की यात्रा (मेघालय)
मेघालय की हल्दी किसान ट्रिनिटी
ट्रिनिटी की कोशिश सिर्फ़ खेती बदलने की नहीं, बल्कि जीवन बदलने की है। वे चाहते हैं कि किसान खतरनाक रोज़गार छोड़कर सुरक्षित, टिकाऊ खेती अपनाएँ। उनकी कहानी दिखाती है कि सही फसल और सही बाज़ार मिल जाए, तो गाँवों से भी वैश्विक पहचान बन सकती है।
सुशांत कुमार पांडा: ओडिशा के जंगलों में कॉफ़ी का सपना (ओडिशा)
ओडिशा के किसान सुशांत पांडा
कॉफ़ी के साथ-साथ उन्होंने होम-स्टे और कैफ़े भी शुरू किया, जिससे गाँव पर्यटन से भी जुड़ गया। सुशांत की कहानी बताती है कि पढ़े-लिखे युवा अगर खेती में आएँ, तो खेती भी एक प्रोफेशन बन सकती है।
चेरुवयल के रमन: देसी बीजों के संरक्षक (केरल)
केरल के पद्मश्री किसान चेरुवायल के रमन
आज उनके घर पर वैज्ञानिक, छात्र और किसान सीखने आते हैं। रमन की कहानी यह याद दिलाती है कि भविष्य की खेती, अतीत को सहेजे बिना संभव नहीं।
श्वेता: खेती की क्लास लेने वाली किसान (कर्नाटक)
कर्नाटक की किसान श्वेता एस
उन्होंने न सिर्फ़ अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि गाँव की महिलाओं को भी जोड़ा। स्वयं सहायता समूह बनाकर श्वेता ने दिखाया कि खेती महिला नेतृत्व में भी फल-फूल सकती है। उनकी कहानी उद्यमिता और धैर्य की मिसाल है।
प्रेम सिंह: आवर्तनशील खेती के गुरु (उत्तर प्रदेश)
बुंदेलखंड के किसान प्रेम सिंह
विमल नौटियाल: शेफ से किसान तक (उत्तराखंड)
उत्तराखंड में शेफ से किसान बने विमल
वह दिखाते हैं कि जड़ों में लौटना हार नहीं, नई शुरुआत है। साल के आख़िर में किसानों की वो कहानियाँ जो आगे का रास्ता दिखाती हैं
यह साल खेती के लिए सिर्फ़ चुनौतियों का नहीं, बदलाव और उम्मीद का भी रहा। देश के अलग-अलग कोनों में ऐसे किसान खड़े हुए जिन्होंने न सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी बदली, बल्कि खेती के मायने भी बदल दिए। किसी ने बीज बचाए, किसी ने जंगल को शिक्षक बनाया, किसी ने ज़हर-मुक्त खेती की अलख जगाई, तो किसी ने पहाड़ों और आदिवासी इलाकों में नए सपनों की खेती की।
ये कहानियाँ सिर्फ़ खेती की नहीं है, ये भविष्य, आत्मनिर्भरता और गाँव से निकलती रोशनी की कहानियाँ हैं।