नागालैंड के किसानों की ज़िंदगी बदल रहा है युवा किसान का बनाया सस्ता सोलर ड्रायर
नागालैंड के एक युवा किसान ने ऐसा सोलर ड्रायर बनाया है, जिसने पहाड़ी इलाकों में फसल खराब होने की समस्या को कमाई के अवसर में बदल दिया है। बिना बिजली, कम लागत और पर्यावरण के अनुकूल इस तकनीक से सैकड़ों किसान अपनी उत्पादन सुरक्षित रखकर बढ़िया दाम पा रहे हैं।
नागालैंड जैसे पहाड़ी इलाके में खेती आसान नहीं होती, मौसम तेज़ी से बदलता है, कई बार तैयार होने के बाद फसल को बचाना भी मुश्किल होता है, कई बार तो महीनों की मेहनत एक झटके से खराब हो जाती है, इन्हीं समस्याओं को 26 साल के सेयिवेज़ो ज़डो भी देखते आ रहे थे, लेकिन उन्होंने चुप बैठने के बजाय इसका हल निकालने की सोची।
नागलैंड के फेक ज़िले के पोरबा गाँव के रहने वाले युवा किसान हैं सेयिवेज़ो ज़डो (Swuyievezo Dzudo), जो आज अपने बनाए सोलर ड्रायर से लाखों लोगों की ज़िंदगियाँ बदल रहे हैं।
सेयिवेज़ो बताते हैं, "हमारे यहाँ कीवी, हल्दी, मिर्च, टमाटर, अदरक और जड़ी-बूटियों की खेती होती है, लेकिन बारिश और नमी के कारण इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखना मुश्किल होता है। कई बार बाज़ार तक पहुंचने में देरी होने पर पूरा उत्पादन खराब हो जाता है।"
वो आगे कहते हैं, "मुझे लगा कि अगर बिना बिजली के इस्तेमाल के आसान तरीके फसल सुखाई जा सके तो किसानों को नुकसान से बचाया जा सकता है।" बस यहीं से जन्म हुआ उनके सोलर ड्रायर का, एक ऐसा उपकरण जो सौर ऊर्जा की मदद से फसल को सुरक्षित और साफ तरीके से सुखाता है।
इसकी शुरूआत तब हुई जब वो दीमापुर के सेंट जोसेफ यूनिवर्सिटी से बॉटनी में एमएससी करके अपने गाँव लौटे, वो हमेशा से अपने गाँव और किसानों के लिए कुछ करना चाहते थे। वो आगे कहते हैं, "सब गाँव छोड़कर शहर में नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन मेरा मानना था कि मुझे वापस आकर अपने गाँव में ही कुछ करना है।"
सेयिवेज़ो ने इस सोलर ड्रायर को बनाने के लिए महंगे उपकरणों की मदद नहीं ली। उन्होंने बाँस, लकड़ी, बीयर केन, ट्रासंपैरेंट UV शीट और एक छोटा सोलर पैनल जैसे गांव में आसानी से मिलने वाले सामान का इस्तेमाल किया, कैन को हीट कलेक्टर की तरह इस्तेमाल किया गया, जो धूप को सोखकर अंदर गर्म हवा बनाता है। सोलर पैनल से चलने वाला छोटा पंखा हवा को लगातार घुमाता है, जिससे नमी बाहर निकल जाती है और फसल जल्दी व सुरक्षित तरीके से सूख जाती है।
इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह बिजली पर निर्भर नहीं है, प्रदूषण नहीं फैलाती और ग्रामीण इलाकों के लिए बिल्कुल अनुकूल है। छोटे मॉडल को लगभग 7 हजार रुपये में तैयार किया जा सकता है, जबकि बड़े कम्युनिटी ड्रायर 25 से 30 हजार रुपये में बनाए जा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल कई किसान मिलकर कर सकते हैं।
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शुरुआत में तो आसपास किसान इसे अपनाने से डर रहे थे, क्योंकि ये उनके लिए नई चीज़ थी, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसके फायदे समझ में आए। अब इस तकनीक का असर साफ दिखने लगा है। अब तक करीब 500 से ज़्यादा किसान इस सोलर ड्रायर का इस्तेमाल कर चुके हैं। पहले जहाँ कीवी, हल्दी और सब्ज़ियां कुछ दिनों में खराब हो जाती थीं, अब किसान उन्हें सुखाकर महीनों तक स्टोर कर पा रहे हैं। इससे उन्हें बाज़ार में सही समय पर बेहतर दाम मिल रहे हैं।
किसान जो पहले वे फसल तुरंत बेचने के दबाव में रहते थे, लेकिन अब वे खुद तय करते हैं कि कब और किस कीमत पर माल बेचना है। इससे उनकी आमदनी में 30 से 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साथ ही गांवों में सूखे फल, मसाले और हर्बल उत्पादों की छोटी प्रोसेसिंग यूनिट भी शुरू होने लगी है, जिससे स्थानीय रोजगार पैदा हो रहा है।
इस इनोवेशन को मजबूत बनाने में ICAR के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), फेक ने तकनीकी सहयोग दिया। वैज्ञानिकों ने ड्रायर के डिजाइन, हवा के प्रवाह, तापमान नियंत्रण और संरचना को बेहतर बनाने में मदद की, ताकि यह नागालैंड के ठंडे और नमी वाले मौसम में भी सही तरीके से काम करे।
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कृषि विज्ञान केंद्र, फेक के प्रभारी डॉ संजीव कुमार सिंह बताते हैं, "हम समय-समय पर युवाओं को ट्रेनिंग देते रहते हैं, सेयिवेज़ो भी उन्हीं युवाओं में से हैं, क्योंकि उन्होंने बॉटनी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है और साथ ही कीवी की खेती करते हैं, जिससे उन्होंने अपने गाँव की समस्याओं को करीब से समझा।"
वो आगे कहते हैं, "जितनी कोशिश हो पाती है हम युवाओं को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, इनके सोलर ड्रायर से हमने आसपास के कई किसानों को जोड़ा है, जिससे लोग भी इसका फायदा उठा पाएँ।"
सेयिवेज़ो की इस पहल को 2025 में ICAR-IARI (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) द्वारा आयोजित पूसा कृषि विज्ञान मेले में Innovative Farmer Award से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार उन किसानों को दिया जाता है जो खेती में नए, टिकाऊ और किसान-हितैषी समाधान विकसित करते हैं।
यह सोलर ड्रायर केवल कमाई बढ़ाने का साधन नहीं है, बल्कि यह जलवायु-स्मार्ट खेती का भी उदाहरण है। इसमें न तो डीजल की जरूरत है, न बिजली की और न ही प्रदूषण फैलाने वाली मशीनों की। यह तकनीक कार्बन उत्सर्जन घटाती है, खाद्य अपशिष्ट कम करती है और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग सिखाती है।
सेयिवेज़ो की कोशिश है कि आने वाले समय में यह मॉडल नागालैंड के अलावा असम, मणिपुर, मेघालय और पहाड़ी राज्यों के दूसरे हिस्सों तक पहुंचे, ताकि वहां के किसान भी अपनी फसल को सुरक्षित रखकर बेहतर जीवन जी सकें।
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