बीज बचेंगे तभी तो खेती बचेगी, कर्नाटक की संगीता शर्मा की अनोखी मुहिम
Gaon Connection | Jan 19, 2026, 18:32 IST
जलवायु परिवर्तन और रासायनिक खेती के दौर में जब देसी बीज तेजी से गायब हो रहे हैं, कर्नाटक के एक गाँव में संगीता शर्मा चुपचाप खेती का भविष्य बचा रही हैं। 800 से अधिक पारंपरिक बीजों को सहेजकर उन्होंने एक सीड बैंक बनाया है, जिससे किसान दोबारा टिकाऊ और सुरक्षित खेती की ओर लौट सकें।
भारत में खेती का भविष्य क्या होगा? जब जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और बढ़ते रसायनों की मार खेतों पर पड़ रही है, तब यह सवाल सिर्फ़ किसानों का नहीं रह गया है यह हर उस व्यक्ति का सवाल है, जो थाली में खाना रखता है। क्योंकि अगर खेती बचेगी, तभी भोजन बचेगा। और खेती अगर बीजों के बिना नहीं चल सकती, तो फिर बीज बचाना ही असल में खेती का भविष्य बचाना है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कुछ लोग चुपचाप, बिना शोर किए, इसी काम में लगे हुए हैं।
कर्नाटक के सिंगापुर गाँव की संगीता शर्मा भी उन्हीं लोगों में से एक हैं, जिन्होंने बीजों को बचाने को अपनी ज़िंदगी का मिशन बना लिया है।
संगीता शर्मा की यह यात्रा किसी बड़े फंड या सरकारी योजना से नहीं शुरू हुई थी। यह शुरू हुई एक बुज़ुर्ग महिला के कमरे से। संगीता बताती हैं, "एक नब्बे साल की औरत को खाली इतना पूछा, माँ, कहाँ है ये? कहाँ गया, ये कितने पुराने मक्के हैं, वो कहाँ गए? तो उसने देखा, हाथ मेरा पकड़ा, लेकर गई कमरे में, बिस्तर के नीचे दो फीट नीचे, बीजों की गट्टी निकाल कर मेरे हाथ में देती, ये आपका है।" वह गठरी सिर्फ़ बीजों की नहीं थी, वह दशकों की खेती, स्वाद, पोषण और परंपरा की थाती थी। संगीता को उस दिन एहसास हुआ कि ये बीज कितने कीमती हैं, लेकिन इन्हें देखने, पूछने और समझने वाला शायद ही कोई बचा है।
आज हम जो खाना खाते हैं, वह खेत से निकलकर जब हमारी थाली तक पहुँचता है, तब तक न जाने कितने रसायनों से होकर गुजरता है। शॉपिंग मॉल की चमकदार सब्ज़ियाँ और फल हमें साफ़ और सुंदर तो दिखते हैं, लेकिन उनके पीछे छुपी सच्चाई हम सब जानते हैं। फिर भी सवाल यही रहता है, तो किया क्या जाए? इसी सवाल का जवाब संगीता शर्मा पिछले 18 साल से खोज रही हैं।
उन्होंने किसानों के लिए एक ऐसा ख़जाना बनाया है, जहाँ बीजों को सिर्फ़ संभालकर नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें ज़िंदा रखा जाता है। उन्होंने करीब 800 देसी किस्मों के बीजों को इकट्ठा कर संरक्षित किया है और एक सीड बैंक खड़ा किया है, ताकि ज़रूरत के समय किसान इन बीजों से दोबारा खेती शुरू कर सकें।
कभी कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाली संगीता शर्मा आज मिट्टी और खेती की भाषा बोलती हैं। उनकी दो एकड़ की ज़मीन किसी साधारण खेत जैसी नहीं दिखती। वहाँ बैंगन, टमाटर, मिर्च, काली गाजर, बहुरंगी मक्का, ज्वार, सूरजमुखी, अनार, बेल, बाजरा और 200 से अधिक देसी सब्ज़ियों की किस्में एक साथ उग रही हैं। यह खेत नहीं, एक जीवित संग्रहालय है, जहाँ हर पौधा अपनी कहानी कहता है।
संगीता कहती हैं, "मिट्टी की सेहत इंसान की सेहत जैसी होती है। जैसे मानव शरीर में अलग-अलग अंग होते हैं, वैसे ही मिट्टी में भी जीवन के सभी तंत्र मौजूद होते हैं। अगर मिट्टी स्वस्थ होगी, तभी भोजन पौष्टिक होगा और तभी इंसान भी स्वस्थ रहेगा।"
ये भी पढ़ें: इंजीनियर से किसान तक, एग्रोफॉरेस्ट्री के ज़रिए मिट्टी बचाने निकले सिद्धेश सकोरे
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बीजों की विविधता और भी ज़रूरी हो गई है। आज खेती कुछ गिनी-चुनी हाईब्रिड किस्मों पर टिक गई है। इससे उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन लचीलापन खत्म हो गया। अगर एक किस्म किसी बीमारी या मौसम की मार से नष्ट हो जाए, तो पूरी फसल चौपट हो जाती है। देसी बीज इस संकट से लड़ने की ताकत रखते हैं, क्योंकि वे स्थानीय मौसम, मिट्टी और पानी के अनुसार विकसित हुए हैं। संगीता शर्मा का सीड बैंक इसी लचीलेपन को वापस लाने की कोशिश है।
उनकी पहल अब अकेली नहीं रही। आसपास के किसान उनसे जुड़ रहे हैं, अपने पास बचे पुराने बीज ला रहे हैं और बदले में नई देसी किस्में लेकर जा रहे हैं। यह एक चुपचाप चलने वाला आंदोलन है, जिसमें न पोस्टर हैं, न बड़े मंच, लेकिन खेतों में बदलाव साफ़ दिखता है। यह आंदोलन बताता है कि खेती का भविष्य किसी लैब में नहीं, बल्कि बीजों की छोटी-छोटी पोटलियों में छुपा है।
संगीता का मानना है कि हर कोई किसान या बीज संरक्षक नहीं बन सकता, लेकिन हर कोई उपभोक्ता जरूर है। अगर हम अपनी सेहत और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें अपने खाने को लेकर ज़िम्मेदार बनना होगा। बिना केमिकल उगा खाना चुनना, स्थानीय किसानों से खरीदना और देसी फसलों को बढ़ावा देना, ये छोटे कदम भी खेती के भविष्य को बचाने में योगदान दे सकते हैं।
आज जब दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है, तब संगीता शर्मा जैसे लोग हमें यह याद दिला रहे हैं कि समाधान बहुत दूर नहीं है। वह हमारे खेतों में, हमारे बीजों में और हमारी परंपराओं में छुपा है। यह कहानी सिर्फ़ एक महिला की नहीं है, यह भारत की खेती के भविष्य की कहानी है, जहाँ छोटी-छोटी कोशिशें मिलकर बड़ा बदलाव बन रही हैं।
ये भी पढ़ें: माँ की याद में शुरू हुई केले की खेती, 400+ किस्मों तक पहुँचा सपना
कर्नाटक के सिंगापुर गाँव की संगीता शर्मा भी उन्हीं लोगों में से एक हैं, जिन्होंने बीजों को बचाने को अपनी ज़िंदगी का मिशन बना लिया है।
संगीता शर्मा की यह यात्रा किसी बड़े फंड या सरकारी योजना से नहीं शुरू हुई थी। यह शुरू हुई एक बुज़ुर्ग महिला के कमरे से। संगीता बताती हैं, "एक नब्बे साल की औरत को खाली इतना पूछा, माँ, कहाँ है ये? कहाँ गया, ये कितने पुराने मक्के हैं, वो कहाँ गए? तो उसने देखा, हाथ मेरा पकड़ा, लेकर गई कमरे में, बिस्तर के नीचे दो फीट नीचे, बीजों की गट्टी निकाल कर मेरे हाथ में देती, ये आपका है।" वह गठरी सिर्फ़ बीजों की नहीं थी, वह दशकों की खेती, स्वाद, पोषण और परंपरा की थाती थी। संगीता को उस दिन एहसास हुआ कि ये बीज कितने कीमती हैं, लेकिन इन्हें देखने, पूछने और समझने वाला शायद ही कोई बचा है।
जहाँ बीज बन रहे हैं उम्मीद, जलवायु संकट में खेती बचाने की पहल।
आज हम जो खाना खाते हैं, वह खेत से निकलकर जब हमारी थाली तक पहुँचता है, तब तक न जाने कितने रसायनों से होकर गुजरता है। शॉपिंग मॉल की चमकदार सब्ज़ियाँ और फल हमें साफ़ और सुंदर तो दिखते हैं, लेकिन उनके पीछे छुपी सच्चाई हम सब जानते हैं। फिर भी सवाल यही रहता है, तो किया क्या जाए? इसी सवाल का जवाब संगीता शर्मा पिछले 18 साल से खोज रही हैं।
उन्होंने किसानों के लिए एक ऐसा ख़जाना बनाया है, जहाँ बीजों को सिर्फ़ संभालकर नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें ज़िंदा रखा जाता है। उन्होंने करीब 800 देसी किस्मों के बीजों को इकट्ठा कर संरक्षित किया है और एक सीड बैंक खड़ा किया है, ताकि ज़रूरत के समय किसान इन बीजों से दोबारा खेती शुरू कर सकें।
संगीता को एहसास हुआ कि ये बीज कितने कीमती हैं, लेकिन इन्हें देखने, पूछने और समझने वाला शायद ही कोई बचा है।
कभी कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाली संगीता शर्मा आज मिट्टी और खेती की भाषा बोलती हैं। उनकी दो एकड़ की ज़मीन किसी साधारण खेत जैसी नहीं दिखती। वहाँ बैंगन, टमाटर, मिर्च, काली गाजर, बहुरंगी मक्का, ज्वार, सूरजमुखी, अनार, बेल, बाजरा और 200 से अधिक देसी सब्ज़ियों की किस्में एक साथ उग रही हैं। यह खेत नहीं, एक जीवित संग्रहालय है, जहाँ हर पौधा अपनी कहानी कहता है।
संगीता कहती हैं, "मिट्टी की सेहत इंसान की सेहत जैसी होती है। जैसे मानव शरीर में अलग-अलग अंग होते हैं, वैसे ही मिट्टी में भी जीवन के सभी तंत्र मौजूद होते हैं। अगर मिट्टी स्वस्थ होगी, तभी भोजन पौष्टिक होगा और तभी इंसान भी स्वस्थ रहेगा।"
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जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बीजों की विविधता और भी ज़रूरी हो गई है। आज खेती कुछ गिनी-चुनी हाईब्रिड किस्मों पर टिक गई है। इससे उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन लचीलापन खत्म हो गया। अगर एक किस्म किसी बीमारी या मौसम की मार से नष्ट हो जाए, तो पूरी फसल चौपट हो जाती है। देसी बीज इस संकट से लड़ने की ताकत रखते हैं, क्योंकि वे स्थानीय मौसम, मिट्टी और पानी के अनुसार विकसित हुए हैं। संगीता शर्मा का सीड बैंक इसी लचीलेपन को वापस लाने की कोशिश है।
कभी कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाली संगीता शर्मा आज मिट्टी और खेती की भाषा बोलती हैं।
उनकी पहल अब अकेली नहीं रही। आसपास के किसान उनसे जुड़ रहे हैं, अपने पास बचे पुराने बीज ला रहे हैं और बदले में नई देसी किस्में लेकर जा रहे हैं। यह एक चुपचाप चलने वाला आंदोलन है, जिसमें न पोस्टर हैं, न बड़े मंच, लेकिन खेतों में बदलाव साफ़ दिखता है। यह आंदोलन बताता है कि खेती का भविष्य किसी लैब में नहीं, बल्कि बीजों की छोटी-छोटी पोटलियों में छुपा है।
संगीता का मानना है कि हर कोई किसान या बीज संरक्षक नहीं बन सकता, लेकिन हर कोई उपभोक्ता जरूर है। अगर हम अपनी सेहत और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें अपने खाने को लेकर ज़िम्मेदार बनना होगा। बिना केमिकल उगा खाना चुनना, स्थानीय किसानों से खरीदना और देसी फसलों को बढ़ावा देना, ये छोटे कदम भी खेती के भविष्य को बचाने में योगदान दे सकते हैं।
आज जब दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है, तब संगीता शर्मा जैसे लोग हमें यह याद दिला रहे हैं कि समाधान बहुत दूर नहीं है। वह हमारे खेतों में, हमारे बीजों में और हमारी परंपराओं में छुपा है। यह कहानी सिर्फ़ एक महिला की नहीं है, यह भारत की खेती के भविष्य की कहानी है, जहाँ छोटी-छोटी कोशिशें मिलकर बड़ा बदलाव बन रही हैं।
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