जुर्माने से जागरूकता तक: एक ग्राम प्रधान ने अपनी पंचायत में कैसे जीती प्लास्टिक से जंग?

Gaon Connection | Jan 07, 2026, 19:01 IST
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कभी यह ग्राम पंचायत प्लास्टिक कचरे से जूझ रही थी। नालियाँ भरी थीं, गलियाँ गंदी थीं और बच्चों का भविष्य जोखिम में था। लेकिन ग्राम प्रधान प्रियंका तिवारी ने सिर्फ़ समस्या देखी नहीं, समाधान भी गढ़ा। सख़्त नियम, जुर्माना, प्लास्टिक बैंक, वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट और महिलाओं, बच्चों की भागीदारी, इन सबके दम पर आज यह पंचायत लगभग प्लास्टिक-मुक्त है।

<p><br>उत्तर प्रदेश का वो गाँव जहाँ नालियों में नहीं, नियमों में बहता है बदलाव<br></p>
जब भी आप अपने गाँवों में चारों तरफ नज़र दौड़ाते हैं तो नालियों में, खेतों में, तालाबों के किनारे और सड़कों पर बिखरा प्लास्टिक दिखता है, तो मन में एक चुभन सी होती होगी न। यह नज़ारा सिर्फ़ किसी एक गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश की सच्चाई है। हम धीरे-धीरे ज़्यादा उपभोक्तावादी होते जा रहे हैं। शहरों के पैकेज्ड प्रोडक्ट्स, प्लास्टिक में लिपटा सामान, सब कुछ हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है। लेकिन इस सबके बाद प्लास्टिक कचरे का क्या किया जाए, इस पर हमने कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं।

उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले में भी यही कहानी थी। लेकिन यहाँ एक महिला ने सिर्फ सोचा नहीं, उसने आगे बढ़कर हालात बदलने की ठानी। उनका नाम है प्रियंका तिवारी और आज उनका गाँव, उनकी पंचायत, धीरे-धीरे प्लास्टिक से मुक्त होता जा रहा है।

प्रियंका तिवारी जब शादी के बाद अपने ससुराल, राजपुर ग्राम पंचायत आईं, तो उन्होंने वही देखा जो आज देश के ज़्यादातर गाँवों में दिखता है। गाँव के बाहर प्लास्टिक के ढेर, नालियों में अटके रैपर, गलियों में उड़ती पॉलिथीन और तालाबों में तैरता कचरा। उन्हें हैरानी होती थी कि गाँव छोटा है, लोग सीमित हैं, फिर भी इसे साफ़ रखना इतना मुश्किल क्यों लग रहा है?

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नई बहू होने की वजह से वे खुलकर कुछ कह नहीं पाती थीं। लेकिन मन में एक बेचैनी थी, कुछ तो करना ही होगा। वे जानती थीं कि अगर आज चुप रहीं, तो कल यह प्लास्टिक और बढ़ेगा, बच्चों की सेहत बिगड़ेगी और पानी-मिट्टी ज़हर बन जाएगी।

प्रियंका बताती हैं, "नई-नई आयी थी, गाँव में कोई सुनने को तैयार नहीं था, लेकिन मैंने सोच लिया था कि कुछ करना ही पड़ेगा।"

नेचर (Nature) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत अब दुनिया में प्लास्टिक प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। वैश्विक स्तर पर पैदा होने वाले कुल प्लास्टिक कचरे का लगभग 20 प्रतिशत अकेले भारत से आता है। हर साल 9.3 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होने के साथ, इस पर्यावरणीय तबाही में भारत का योगदान कई पूरे-पूरे क्षेत्रों से भी अधिक है।

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इस भयावह आंकड़े में से लगभग 3.5 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा हर साल ठीक से प्रबंधित नहीं हो पाता और सीधे पर्यावरण में रिस जाता है। यह मात्रा नाइजीरिया (3.5 मिलियन टन), इंडोनेशिया (3.4 मिलियन टन) और चीन (2.8 मिलियन टन) जैसे अन्य बड़े प्रदूषकों से भी ज़्यादा है। लेकिन कहीं न कहीं भारत के गाँवों में बदलाव की शुरूआत हो रही है।

पंचायत चुनाव और बदलाव की शुरुआत

फिर आया पंचायत चुनाव। प्रियंका को लगा कि अगर सच में कुछ बदलना है, तो जिम्मेदारी हाथ में लेनी होगी। उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया। यह फैसला आसान नहीं था, गाँव की राजनीति, सवाल, संदेह और चुनौतियाँ सामने थीं। लेकिन जनता ने भरोसा किया और रिकॉर्ड वोटों से उन्हें ग्राम प्रधान चुन लिया। चुनाव जीतना आसान था, असली सफ़र उसके बाद शुरू हुआ।

नियम बनाए, लेकिन ज़मीन पर उतारना मुश्किल था, जब प्रियंका ने खुले में कूड़ा और प्लास्टिक फेंकने से मना किया, तो ज़्यादातर लोगों ने ऊपर-ऊपर से हामी भर दी। लेकिन आदतें बदलना आसान नहीं होता। लोग चुपचाप वही करते रहे, जो बरसों से करते आ रहे थे।

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तब प्रियंका ने सख़्त लेकिन ज़रूरी कदम उठाया। पंचायत में साफ़ नियम बनाए गए, अगर कोई खुले में कूड़ा या प्लास्टिक फेंकते पकड़ा गया, तो जुर्माना देना पड़ेगा। दुकानों पर साफ-साफ लिख दिया गया कि प्लास्टिक पॉलिथीन का इस्तेमाल करने पर दंड लगेगा।

शुरुआत में विरोध हुआ, नाराज़गी भी दिखी। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा कि यह सज़ा नहीं, उनके अपने भविष्य की सुरक्षा है।

कचरा अब बोझ नहीं, आमदनी बना

प्रियंका ने सफ़ाई को सिर्फ़ नियमों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने महिलाओं और बच्चों को इस बदलाव का हिस्सा बनाया। गाँव वालों से कहा गया, कचरा घर में ही इकट्ठा करें। पंचायत के कर्मचारी खुद घर-घर जाकर कूड़ा कलेक्ट करेंगे। इसके बदले कुछ पैसे दिए जाएँगे।

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प्रियंका बताती हैं, "कूड़ा खुद इकट्ठा करिए घर में, पंचायत के कर्मचारी खुद जाएंगे और आपके घर से कूड़ा कलेक्ट करेंगे, और उसके बदले आपको कुछ पैसे दे देंगे। तो महिलाओं ने शुरू किया, इसके बदले जो भी दस, बीस, पचास रुपये मिल रहे थे, वो महिलाओं का अपना इनकम था। बच्चे जो खा, पी रहे थे उसका वेस्ट उन्होंने फेंकने की जगह इकट्ठा करना शुरू किया। पहला 5 किलो वेस्ट जो था, वो मुझे बच्चों ने लाकर दिया था।" यहीं से सोच बदली, कचरा गंदगी नहीं, ज़िम्मेदारी है।

पॉलिथीन बैन के बाद अगली चुनौती

पॉलिथीन पर रोक लग गई, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। नमकीन, बिस्किट, चॉकलेट और दूसरे पैकेज्ड फूड के रैपर अब भी गाँव में आते थे। हवा और तूफ़ान के साथ पास के इलाकों से उड़कर भी प्लास्टिक पहुँच जाता था।

प्रियंका कहती हैं, "प्लास्टिक शायद पूरी तरह कभी खत्म न हो। लेकिन उसे सही तरीके से संभाला जा सकता है। इसी सोच के साथ गाँव-गाँव प्लास्टिक बैंक बनाए गए। हर इलाके में कुछ लोगों को ज़िम्मेदारी दी गई कि प्लास्टिक वहीं जमा किया जाए, इधर-उधर न फेंका जाए।"

बदलाव शुरू हो गया

इकट्ठा हुए प्लास्टिक के निस्तारण के लिए गाँव में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट बनाई गई। यहाँ जैविक कचरा और प्लास्टिक अलग-अलग किया जाता है। सफ़ाई कर्मचारी रोज़ कचरा लेकर आते हैं, उसे छांटा जाता है और फिर सुरक्षित तरीके से निपटान किया जाता है। आज हालात यह हैं कि राजपुर पंचायत में आपको दूर-दूर तक प्लास्टिक का एक टुकड़ा नहीं दिखेगा। न कचरे के ढेर हैं, न गंदी नालियाँ।

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प्रियंका का सपना सिर्फ़ साफ़ गाँव तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह भी देखा कि बच्चों को पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है। इसलिए गाँव में वाई-फाई ज़ोन बनाया गया, जहाँ बच्चे इंटरनेट की मदद से पढ़ सकते हैं, ऑनलाइन क्लास ले सकते हैं और दुनिया से जुड़ सकते हैं।

प्रियंका तिवारी की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए बड़े बजट या बड़ी योजनाओं की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरत होती है साफ़ सोच, दृढ़ विश्वास और लोगों को साथ लेकर चलने की। आज राजपुर ग्राम पंचायत सिर्फ़ एक साफ़ गाँव नहीं है, बल्कि एक मिसाल है कि अगर नेतृत्व ईमानदार हो, तो प्लास्टिक जैसी बड़ी समस्या से भी लड़ा जा सकता है।

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