जब रूबी पारीक ने गाँव को बना दिया जैविक खेती का स्कूल

Gaon Connection | Feb 03, 2026, 14:59 IST
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राजस्थान के खटवा गाँव की रूबी पारिक ने पिता को खोने के बाद हार नहीं मानी। उन्होंने दर्द को ताकत में बदला और जैविक खेती, वर्मी कम्पोस्ट, बीज बैंक और जैविक खेती की ट्रेनिंग देकर हज़ारों महिलाओं की ज़िंदगी बदल दी।

<p>रसोई से खेत तक, खेत से बदलाव तक, रूबी पारिक की ग्रामीण क्रांति।<br></p>

क्या हो अगर किसी घर का मुखिया दुनिया छोड़ जाए, वो भी कैंसर जैसी बीमारी से जुझते हुए, उनके पीछे पूरे परिवार की ज़िंदगी भी तो थम जाती है? ऐसा ही कुछ बरस पहले रूबी पारीक के के साथ भी हुआ, लेकिन रूबी ने हार नहीं मानी और रसायनिक खेती के खिलाफ़ खड़ी हो गईं, जिससे कोई और परिवार न ऐसे बिखर जाए।



राजस्थान के दौसा ज़िले के खटवा गाँव की रूबी की बचपन में पढ़ाई अधूरी रह गई थी। ज़िंदगी ने पहले ही बहुत सी सीमाएँ खींच दी थीं। ऐसे में पिता का जाना रूबी के लिए एक और गहरा झटका था। लेकिन इसी दर्द ने उनके भीतर एक सवाल जन्म दिया, कि क्या यह बीमारी हमारे खाने, हमारी मिट्टी और हमारी ज़हरीली खेती का नतीजा थी? यही सवाल धीरे-धीरे एक मिशन बन गया।



रूबी के पास न कोई बड़ी डिग्री थी, न कोई पूंजी। सिर्फ दसवीं तक की पढ़ाई, एक एकड़ ज़मीन और दिल में कुछ बदल देने की ज़िद। उन्होंने तय किया कि वो बीमारी को शायद पूरी तरह मिटा न सकें, लेकिन उसकी जड़ों पर चोट ज़रूर करेंगी, ज़हरीले खानपान और रसायन-भरी खेती पर।



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रूबी बताती हैं, “ऐसा नहीं है कि मैं इस बीमारी को खत्म कर सकती हूँ, लेकिन कम करने का प्रयास तो कर ही सकती हूँ, ऐसा मेरे मन में चला और मैंने अपनाया, जमीन भी सुधरे जो केमिकल की वजह से बंजर होती जा रही है।”



जब गाँव में हर कोई जैविक खेती को “समय की बर्बादी” कहता था, तब रूबी उसी रास्ते पर चल पड़ीं। उन्होंने वैज्ञानिक प्रशिक्षण लिया, नाबार्ड से जुड़ीं और धीरे-धीरे खड़ा किया, पारीक ऑर्गेनिक फार्म। यह सिर्फ एक खेत नहीं था, बल्कि एक नई सोच की नींव थी।



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रूबी आगे बताती हैं, "इस लेवल का काम बढ़ते हुए देखती हूँ कि भविष्य में ये सुंदर सपना होगा मेरे लिए कि शायद सभी जैविक खेती करेंगे और सब स्वस्थ्य रहेंगे।"



जहाँ आसपास के खेतों में रासायनिक खाद की गंध थी, वहाँ रूबी के खेत में गोबर की खाद और वर्मी कम्पोस्ट की खुशबू फैलने लगी। आज हालात यह हैं कि उनके फार्म में हर साल करीब 200 मीट्रिक टन जैविक खाद तैयार होती है, जो आसपास के जिलों तक किसानों को मिलती है। इस काम में उन्होंने पाँच से ज़्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार दिया है, कोई पैकिंग करती है, कोई छनाई, कोई खाद तैयार करने में हाथ बंटाती है। खेत अब सिर्फ ज़मीन नहीं रहा, महिलाओं के लिए रोज़ी-रोटी का ठिकाना बन गया है।



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रूबी की इस लड़ाई में उनके पति ओपी पारीक ने साथ दिया। ओपी पारीक कहते हैं, "उन्होंने ये बात मेरे से कही तो मुझे बहुत अच्छा लगा, ये समझ में आयी कि एक दो भले। आज दोनों लोग मिलकर इस काम को आगे ले जाएँगे।"



रूबी ने अपनी ज़मीन पर अजोला की खेती भी शुरू की जो पशुओं के लिए पोषण का खजाना है। इससे डेयरी किसानों को सस्ता और पौष्टिक चारा मिलने लगा, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी, बीज बैंक।



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रूबी समझती थीं कि जब तक किसान बीज कंपनियों पर निर्भर रहेंगे, तब तक वे पूरी तरह आज़ाद नहीं होंगे। इसलिए उन्होंने पारंपरिक बीजों को इकट्ठा करना शुरू किया। आज उनके पास दर्जनों देसी किस्मों का संग्रह है। वो महिलाओं को किचन गार्डन के बीज मुफ्त देती हैं और बदले में सिर्फ एक वादा लेती हैं, “दस बीज ले जाओ, एक फल पके तो उसका बीज वापस लौटा देना।” इस तरह बीजों की श्रृंखला बनती जा रही है, गाँव-गाँव फैलती जा रही है।



रूबी सिर्फ खुद खेती नहीं कर रहीं, वो दूसरों को भी सिखा रही हैं। अब तक 15 हजार से ज़्यादा किसानों, खासकर महिलाओं को, वो जैविक खेती की ट्रेनिंग दे चुकी हैं, बिना कोई फीस लिए। जैविक खाद बनाना, हर्बल स्प्रे तैयार करना, प्राकृतिक कीट नियंत्रण- ये सब अब उनके खेतों में खुले आसमान के नीचे पढ़ाया जाता है।



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आज रूबी का खेत एक “खुला स्कूल” बन चुका है। यहाँ किसान आकर देखते हैं कि बिना ज़हर के भी खेती मुनाफ़ा दे सकती है, मिट्टी ज़िंदा रह सकती है और किसान की आमदनी भी बढ़ सकती है।



रूबी कहती हैं, “जैसे शरीर के लिए साँस ज़रूरी है, वैसे ही खेती के लिए जैविक तरीका ज़रूरी है। इस रास्ते ने मुझे सिर्फ पहचान नहीं दी, आत्मसम्मान भी दिया।”



कभी जो लड़की खुद को अकेला महसूस करती थी, आज वही सैकड़ों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी है। एक छोटा सा खेत, सीमित साधन और अपार हौसला, इन तीनों ने मिलकर वो कर दिखाया, जो बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी नहीं कर पाते।



रूबी पारिक की कहानी सिर्फ खेती की नहीं है। यह कहानी है टूटकर फिर से खड़े होने की। यह कहानी है दर्द को ताकत में बदलने की। यह कहानी है उस बेटी की, जिसने अपने पिता की याद को सिर्फ आंखों में नहीं, खेतों में बो दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ ज़्यादा स्वस्थ हों, ज़्यादा सुरक्षित हों।



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