पशुपालकों के लिए चेतावनी, दुनिया भर में बढ़ रहा बीमारियों का खतरा
विश्व पशु स्वास्थ्य सूचना प्रणाली की ताज़ा रिपोर्ट में दुनिया के कई देशों में पशु रोगों के बढ़ते मामलों का खुलासा हुआ है। खुरपका-मुंहपका, ब्लूटंग, अफ्रीकन स्वाइन फीवर और बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों से लाखों पशु प्रभावित हो रहे हैं।
दुनिया के अलग-अलग देशों में पशुओं में फैलने वाली बीमारियों ने एक बार फिर स्वास्थ्य एजेंसियों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (World Organisation for Animal Health) ने रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार अफ्रीका, यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में मवेशियों, सूअरों, भेड़-बकरियों और मुर्गियों में संक्रामक रोग तेज़ी से फैल रहे हैं।
WOAH की विश्व पशु स्वास्थ्य सूचना प्रणाली (WAHIS) ने जनवरी से फरवरी 2026 की रिपोर्ट जारी की है। पशुओं को प्रभावित करने वाली इन बीमारियों का सीधा असर केवल पशुपालकों की आजीविका पर पड़ता है, बल्कि दूध, मांस और अंडे जैसे खाद्य उत्पादों की आपूर्ति और कीमतों पर भी असर डाल सकता है।
अफ्रीका में खुरपका-मुंहपका और स्वाइन फीवर का खतरा
जिम्बाब्वे में खुरपका-मुंहपका रोग (Foot and Mouth Disease) का प्रकोप सामने आया है, जहां 54 गायों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। करीब 2,400 से अधिक मवेशी इस बीमारी की चपेट में आने के खतरे में हैं, हालांकि सरकार ने अब तक 2,300 से ज्यादा पशुओं का टीकाकरण कर लिया है। वहीं अंगोला में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) पहली बार एक नए इलाके में फैल गया है, जिसमें घरेलू सूअरों में 25 मामले सामने आए हैं और 6 की मौत हो चुकी है।
लातविया में भी अफ्रीकन स्वाइन फीवर ने घरेलू सूअरों और जंगली सूअरों को प्रभावित किया है। यहां 124 मामलों की पुष्टि हुई है और बीमारी को रोकने के लिए 116 पशुओं को मारना पड़ा है। यह दिखाता है कि एक बार वायरस फैलने के बाद उसे नियंत्रित करना कितना मुश्किल हो जाता है।
यूरोप में ब्लूटंग और बर्ड फ्लू की दस्तक
ट्यूनीशिया में ब्लूटंग बीमारी का नया स्ट्रेन सामने आया है, जिससे गाय और भेड़ दोनों प्रभावित हुए हैं। यहां 46 मामले दर्ज़ हुए हैं और 14 पशुओं की मौत हो चुकी है। ब्रिटेन में भी पहली बार एक नए क्षेत्र में ब्लूटंग के मामले सामने आए हैं, जहां 39 गाय संक्रमित पाई गईं और एक की मौत हुई। आयरलैंड में भी पहली बार ब्लूटंग की पुष्टि हुई है, जिससे वहां पशुपालकों में चिंता बढ़ गई है।
हंगरी में 2023 के बाद पहली बार एवियन इन्फ्लुएंजा (बर्ड फ्लू) का प्रकोप सामने आया है। यहां 2,850 घरेलू पक्षियों की मौत हो चुकी है और करीब 4,000 पक्षियों को संक्रमण रोकने के लिए मारना पड़ा। पोलैंड में न्यूकैसल रोग की वापसी हुई है, जहां 19 हजार से ज्यादा पक्षियों में संक्रमण पाया गया है और 1,300 से अधिक की मौत हो चुकी है।
एशिया में मुर्गी पालन पर संकट
इराक में एवियन इन्फ्लुएंजा के बड़े मामले सामने आए हैं। यहां करीब 5,000 मुर्गियों में संक्रमण की पुष्टि हुई है और 1,000 की मौत हो चुकी है। लगभग 60,000 पक्षी जोखिम में हैं और पूरे झुंड को नष्ट करने का फैसला लिया गया है ताकि बीमारी आगे न फैले। फिलीपींस में भी अलग-अलग इलाकों में बर्ड फ्लू के मामले सामने आए हैं, जहां हजारों पक्षियों को मारना पड़ा है।
अमेरिका महाद्वीप में नई बीमारी का खतरा
मैक्सिको में पहली बार ‘न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म’ नामक परजीवी रोग के कई मामले अलग-अलग इलाकों में सामने आए हैं। यह बीमारी गाय, बकरी और यहां तक कि कुत्तों को भी प्रभावित कर रही है। इससे पशुओं के घावों में कीड़े पनपते हैं और संक्रमण तेजी से फैल सकता है। सरकार ने निगरानी और नियंत्रण उपाय तेज़ कर दिए हैं।
क्या जलवायु परिवर्तन बना बीमारियों के फैलाव का बड़ा कारण?
इन पशु रोगों के बढ़ते मामलों के पीछे जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। तापमान में बढ़ोतरी, अनियमित बारिश, बाढ़ और सूखे जैसी घटनाएं कीटों और वायरस के फैलने के लिए अनुकूल माहौल बना रही हैं। गर्म और नम मौसम में मच्छर, मक्खियां और दूसरे वाहक कीट तेजी से बढ़ते हैं, जो ब्लूटंग, बर्ड फ्लू और अन्य संक्रामक रोगों को दूर-दूर तक पहुंचा देते हैं।
ये भी पढ़ें: African Swine Fever से वैश्विक बाजार में हलचल, स्पेन-फिलीपींस तनाव के बीच भारत के लिए भी चेतावनी
इसके अलावा, चरागाहों की कमी और पानी की समस्या के कारण पशु झुंड एक ही जगह पर अधिक समय तक इकट्ठा होते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है। जलवायु बदलाव ने पशुपालन को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट से भी जोड़ दिया है।
किसानों और सरकारों के लिए बड़ी चुनौती
इन सभी घटनाओं से साफ है कि पशु रोग अब केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पशुओं की आवाजाही और जलवायु बदलाव भी इन बीमारियों के फैलाव को तेज कर रहे हैं। किसानों के लिए यह दोहरी मार है, एक तरफ पशुओं की मौत और दूसरी तरफ बाजार में नुकसान।
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर टीकाकरण, पशुओं की नियमित जांच, साफ-सफाई और सीमाओं पर कड़ी निगरानी ही इन रोगों से बचाव का सबसे मजबूत तरीका है। साथ ही, सरकारों को पशुपालकों तक सही जानकारी और मुआवजा सहायता भी पहुंचानी होगी ताकि संकट के समय उनकी आजीविका सुरक्षित रह सके।
ये भी पढ़ें: आंध्र से ओडिशा तक झींगा संकट: जब कुछ ही दिनों में उजड़ जाती है पूरी मेहनत