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लॉकडाउन के दौरान सब कुछ रोककर मैंने खुद को पहचानने की कोशिश की: दी स्लो कैफे में अनुपम खेर

यह पढ़ने या सुनने में काफी अजीब लगता होगा लेकिन यह सच है कि कोरोना महामारी ने बहुत से लोगों को एक ठहराव दिया है। प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर ने इस दौरान एक किताब लिखी है। उन्होंने अपनी इस किताब और जीवन के अन्य पहलूओं के बारे में दी स्लो कैफे में नीलेश मिसरा से चर्चा की।

Subha RaoSubha Rao   28 Dec 2020 1:36 PM GMT

हमें आज के लिए जीना चाहिए, क्योंकि आज ही हमारा सबसे श्रेष्ठ दिन, सबसे अच्छा दिन होता है। आगे बढ़ने और ज़िंदगी में सब कुछ हासिल कर लेने की दौड़ में हम खुद को भूल गए हैं और सबसे अहम हम अपने लिए समय निकालना भूल गए हैं। हम अपनी जड़ को भूल गए हैं। कुछ ऐसे दोस्तों, लोगों और रिश्तेदारों को भूल गए हैं, जिनसे हमें वास्तविक खुशियाँ मिलती थीं। फिल्म अभिनेता, रंगमंच के मंझे हुए कलाकार और लेखक अनुपम खेर की किताब " Your Best Day Is Today" इन्हीं भूले हुए तथ्यों पर आधारित है, जिसे उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन में लिखा।

नीलेश मिसरा के प्रसिद्ध शो "The Slow Cafe" में अनुपम खेर ने विस्तार से बताया कि लॉकडाउन के दौरान उन्होंने कैसे खुद को विराम दिया और खुद को पहचानने की कोशिश की। "अपनी खूबियों, अपनी कमियों, अपनी सफलताओं और असफलताओं का मुल्यांकन किया। मैंने धीरे-धीरे साँस लेना सीखा। सालों बाद पुराने दोस्तों से जुड़ा। प्रकृति पर गौर फ़रमाया। पक्षियों के चह-चहाने की आवाज़ सालों बाद सुनी। आसमान को भी मैंने कई सालों बाद देखा।"

खेर ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान घर में रह कर उन्होंने महसूस किया कि अगर आप खुद को व्यवस्थित करते हैं तो आपका जीवन और अधिक संगठित हो जाएगा। इस किताब में मैंने यह लिखा कि आपके लिए यह कितना ज़रूरी है कि आप खुद को पहचाने और अपनी इच्छाशक्ति से उन लोगों के साथ वापस जुड़ें, जिनसे आपको ख़ुशी मिलती हो, जो आपको समझना चाहते हों, जो आपकी कद्र करते हों। क्योंकि कुछ रिश्ते पॉज बटन की तरह होते हैं, जहां से दबाओ, वहीं से शुरू हो जाते हैं।

कोरोना महामारी ने इस वर्ष हमें भय से युक्त एक ऐसा वातावरण दिया है, जहां दोस्तों के साथ बाहर किसी कैफ़ेटेरिया में बैठ कर कॉफ़ी पीना भी मुश्किल हो गया है और अगर चले भी जाओ तो यह डर सताता है कि सामने वाले ने मास्क पहना है या नहीं। अगल-बगल बैठा हुआ ज़ोर से ना हंस दे या खांस दे।

ऐसे में नीलेश मिसरा का शो "The Slow Cafe" एक भयमुक्त वातावरण देता है। यह एक ऐसी काल्पनिक जगह है, जहां हमें रोचक लोगों से मिलने और उन्हें जानने का मौका मिलता है । इस बार हमें अनुपम खेर की हालिया प्रकाशित किताब "Your Best Day Is Today" के बारे में जानने का मौका मिला। इस किताब को उन्होंने अपनी मां दुलारी को समर्पित किया है, जो इस किताब की हीरोइन हैं। अनुपम खेर की मां को अब उनकी सोशल मीडिया पेजों पर काफ़ी लोकप्रियता मिल रही है।

खेर का बचपन बहुत ही तंगहाली में बीता। स्कूल के लिए जब खेर भाइयों को उनकी मां दुलारी छोड़ने जाया करतीं तो हर दिन कश्मीरी भाषा में कुछ कहती थीं, जिसका अर्थ यह है कि आज हमारा सबसे बेहतर दिन है। हम अच्छे मार्क्स नहीं ला पाते थे और न ही दौड़ में अव्वल होते थे फिर भी हमें यह लगता था कि क्योंकि मां ने बोला है तो आज हमारा सबसे अच्छा दिन है। तब हम यह नहीं समझ पाते थे कि मां कितनी दूरदर्शिता वाली बात कहती थीं।

इतनी असमर्थता वाले दिनों में ऐसी बातें उम्मीद जगाती थीं क्योंकि मां कहतीं थीं तो ऐसा लगता था कि आज सबसे अच्छा दिन होगा और आज भी ऐसा ही लगता है। ज़िंदगी के हर उतार-चढ़ाव का सामना करने में मां के कथन ने बहुत मदद की। हम यह अच्छे से समझ गए थे कि खराब समय, दौर या निशान स्थायी नहीं होते हैं।

फोटो- अनुपम खेर इंस्टाग्राम

अचानक हुए बदलाव ने खेर को एक अनजाने डर ने घेर लिया था

खेर ने अपनी किताब में लिखा है कि यह साल सबके लिए मुश्किल भरा रहा। उन्होंने बातचीत में कहा कि जब मैं कोविड-19 के शुरुआती महीनों में न्यू यॉर्क से मुंबई लौटा तो सब कुछ बदला हुआ था। यह एक ऐसा बदलाव था जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। मेरे लिए थोड़ा मुश्किल और था क्योंकि कोरोना प्रोटोकॉल्स से मैं अच्छे से वाक़िफ़ नहीं था। घर पहुँचने पर बेटे सिकंदर ने दरवाज़ा खोला और अपनी कोहनी से मेरा आशीर्वाद लिया। पत्नी किरण चंडीगढ़ में थीं। भाई अपनी पत्नी और मां के साथ लोखंडवाला वाले घर में थे। घर में काम करने वाले स्टाफ ने चेहरे पर मास्क पहन रखा था तो उन्हें यह पता नहीं चल रहा था कि उनकी वापसी से खुश है या नहीं।

मैं हमेशा की तरह हर बार घर जाने से पहले अपने दोस्त अभिनेता अनिल कपूर से गले मिलने गया। क्योंकि उसका घर मेरे घर के पहले आता था। इस बार माज़रा अलग था। खेर के दोस्त हर बार की तरह उनकी देश वापसी पर गले मिलने नहीं आये। उनका एक सन्देश आया कि यह तुम बिल्कुल भी मत सोचना कि मैं तुमसे मिलने आऊँगा। 14 दिनों के बाद देखेंगे कि क्या करना है।

खेर अब समझ गए थे कि सब कुछ बदल गया है। उन्होंने कहा कि मैं एक सकारात्मक सोच वाला इंसान अचानक हुए इस बदलाव की वजह से अवसाद में आ गया था। मैं एक अनजाने डर का शिकार हो गया था।

खेर ने बताया कि कोरोना के कारण कुछ कटु अनुभव मुझे मुंबई पहुँचने से थोड़ा पहले न्यूयॉर्क के एयरपोर्ट पर ही हो गया था, जहाँ एक आदमी भी मेरे साथ फोटो खिंचवाने नहीं आया। उन्होंने अपने ख़ास अंदाज़ में कहा कि मैं तो अभिनेता ही इसलिए बना था कि लोग मुझे पहचानें। मुझे तकलीफ़ सी हुई कि मुझे कोई पहचान क्यों नहीं रहा है। फ्लाइट के अंदर सभी स्टाफ़ ने पीपीई किट पहन रखे थे। इसके बाद जब मैं मुंबई एयरपोर्ट पहुँचा तो सब कुछ वीरान-सुनसान सा माहौल था। एयरपोर्ट पर स्टाफ की संख्या काफ़ी कम थी। ऐसे में उन्होंने अपने कुशल व्यवहार को दरकिनार करते हुए अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मुझपर क्वारंटीन होने का ठप्पा लगाया।

जब मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला तब मुझे एक धक्का सा लगा। सब कुछ कल्पना से बाहर था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं विल स्मिथ की फिल्म का हिस्सा हूँ, जिसमें दूर-दूर तक कोई नहीं है।

बॉलीवुड के अपने निकटतम दोस्तों अनिल कपूर और सतीश कौशिक के साथ अनुपम खेर (फोटो- इंस्टाग्राम)

हम सभी को एक ठहराव की सख्त जरूरत है

इस महामारी ने सभी को, जिसमें मैं भी अपवाद नहीं था, यह सोचने पर विवश कर दिया था कि हम भविष्य के लिए क्यों जीते हैं। एक अच्छे घर की कल्पना कर उसे साकार रूप देने की कोशिश हो या फिर छुट्टियां एक बेहतरीन जगह पर मनाने की योजना हो, इसके लिए हम दिन रात काम करते हैं। हम आज में नहीं जीते। इस महामारी के कारण लॉकडाउन में जब हमें घर में अपनों के साथ और सबसे अहम खुद के साथ रहने का मौका मिला तब हम सबने ये कहीं न कहीं महसूस किया कि हमें एक ठहराव की सख्त ज़रूरत है।

प्रकृति से जुड़ने का मौका मिला

खेर ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान मैं हर दिन बिना किसी शीर्षक से कुछ ना कुछ जरूर लिखता था। इस दौरान मेरे नए दोस्त बने- पक्षी और आसमान। मुंबई में मैंने पहली बार चिड़ियों की चहचहाहट सुनी, कोयल के गाने की आवाज़ सुनी। मैंने भी उसके साथ कई बार गाया। नीले आसमान को देखा तो महसूस हुआ कि सदियों बाद देखा हूं, एक सुखद अनुभूति हुई।

लॉकडाउन ने एहसास कराया कि हमारे साथ-साथ और भी अलग जाति के प्राणी इस धरती पर रहते हैं, जिनकी इज़्ज़त करनी चाहिए। प्रकृति को स्वच्छ रखना चाहिए। मैंने इस बात को समझा कि हमें ब्रांडेड कपड़े या बैग की ज़रूरत ही नहीं है। पिछले कई महीने से मैं ट्रैक पैंट ही पहन रहा हूँ। हमें ब्रांड के टैग की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए। जरुरत है तो सिर्फ़ परिवार, मूलभूत सुविधाओं और दुनिया से कनेक्ट होने के लिए वाई-फ़ाई की। इसके लिए कहीं भागने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

अपने अंदर पल रहे डर को पूरी शिद्दत के साथ ख़त्म कर दिया

खेर ने कहा कि मैंने अपने डर को ख़त्म करने के लिए किताब लिखना शुरू किया, जो कारगर लगने लगा और मैं यह किताब लिखने लगा तो ऐसा महसूस हुआ कि लिखने के लिए मैं पुरानी तकनीक का इस्तेमाल कर रहा हूँ। जब मुझे अपने डायलॉग्स याद करने के लिए काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ती थी, तो मैं उसे लिखता था। इससे मेरे मन में डायलॉग्स बैठ जाते थे और मेरे अंदर का डर भाग जाता था। किताब लिखते वक़्त मुझे ऐसा ही महसूस हुआ। मैंने बहुत ही करीब से जानने वालों जैसे ऋषि कपूर और इरफ़ान की मौत देखी। अचानक से मौतें, भावनात्मक होने की बजाय संख्यात्मक हो गईं।

60 वर्ष के बाद आदमी इस धरती पर बचे हुए समय का लेखा जोख़ा करने में लग जाता है। मैंने इस डर को भी ख़त्म कर दिया। मैं बहुत ही आशावादी इंसान हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं आशावादी हूँ तो डरता नहीं हूँ, पर आशावादी पूरी शिद्दत के साथ उस डर से निकलने की कोशिश करते हैं। मैंने भी वही किया। मैंने सोशल मीडिया को कभी तिलांजलि नहीं दी, पर मैं सोशल मीडिया पर पूर्णतया निर्भर भी नहीं रहा। मैंने खुद को आज़ाद महसूस किया।

जितना धीरे साँस लेंगे, उतना ज़्यादा चलेंगे

खेर ने नीलेश मिसरा से बातचीत में बताया कि मुझे खुद के लिए इतने दिन इतना वक़्त पहले कभी नहीं मिला था। ऐसे में मैं खुद के अंदर गया। खुद को प्रोत्साहित करने का यह तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने महसूस किया कि मैं सांस भी लेता हूँ। मेरी तरह कइयों ने यह महसूस किया कि हम अब जाकर साँस ले रहे हैं। अपने अंदर की शक्ति को हम पहचान पाए।

मैंने बैडमिंटन चैंपियन सायना नेहवाल से भी पूछा कि अभी आप खेल नहीं पा रही हैं, तो खुद को कैसे प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने भी यही जवाब दिया कि मैं खुद के अंदर गई। खुद के अंदर जाने से मतलब आत्मनिरीक्षण करना होता है। हम सबने साँस को महसूस किया। सबसे अच्छी बात खेर ने यह कहा कि सेकण्ड्स,मिनट्स और घंटे मानव निर्मित होते हैं। भगवन तो हमें इस दुनिया में साँसों के हिसाब से भेजता है। जितना धीरे हम साँस लेंगे, उतना लम्बा हम जिएंगे। जैसे कुत्ता जल्दी-जल्दी साँस लेता है तो उसकी उम्र सिर्फ 12-13 वर्ष होती है, जबकि कछुआ धीरे-धीरे साँस लेता है तो वह 400 साल जीता है। इसलिए हम सबको धीरे-धीरे साँस लेना चाहिए। इसलिए ध्यान-योग नियमित करना चाहिए।

नीलेश मिसरा ने खेर से किताब के दो अध्याय 'डिक्लटरिंग और स्टेइंग कनेक्टेड' के बारे में जानना चाहा तो बहुत ही उम्दा जवाब खेर ने दिया। इस जवाब को अगर हम अपनी ज़िन्दगी में शामिल कर लें तो जीने की साथर्कता सिद्ध हो जायेगी। वास्तव में यह पूरा साक्षात्कार ही अमूल्य निधि के समान है , जिसे हम अपनी सोच और जीवनशैली में शामिल कर धनवान बन सकते हैं।

खेर ने पहले अध्याय के बारे में कहा कि डिक्लटरिंग का मतलब, जिन चीज़ों से हम भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़े हैं, उसे त्याग दें। हम अपनी ज़िंदगी से फ़ालतू का बोझ या बनावटीपन उतार फेंके तो हमें न सिर्फ़ हल्का महसूस होगा बल्कि ज़िन्दगी आसान हो जायेगी। उन्होंने कहा कि मैं अनुपम खेर के नाम का बोझ अब अपने कन्धों पर रख कर आगे नहीं बढ़ना चाहता।

इसी तरह शारीरिक डिक्लटर भी बेहद ज़रूरी है। कई कपडे, जूते और ऐसे कई सामान को मैंने त्याग दिया, जो अब बेवजह से लगने लगे। मज़ाक करते हुए उन्होंने कहा कि मैं काले चश्मे नहीं पहनता क्योंकि मैं क्लॉस्ट्रोफोबिक हूँ। दूसरी बात यह भी है कि चश्मा पहनने से मुझे पहचानने में लोगों को कष्ट होगा, जो मैं बिल्कुल नहीं चाहता।

फ़ालतू की सोच को त्याग दो। अपने अंदर किसी तकलीफ़ को पाल कर मत रखो। वह नासूर होता जाता है और स्टेइंग कनेक्टिविटी का मतलब भावनात्मक रूप से जुड़ना होता है। मैं बोलूं तो आप सुनें, आप बोलें तो मैं सुनूं। एक दूसरे की कद्र करें। हम अपनी ज़िन्दगी में, अपनी इच्छा से कुछ ही लोगों से जुड़े रहना चाहते हैं। कनेक्टिविटी मतलब पॉज बटन। पॉज बटन से थोड़ा पीछे जाइये और अपनी इच्छाशक्ति से उन लोगों से जुड़िये, जिनसे हमें सुखद अनुभूति होती है। पीछे जाने का मतलब यह भी है कि हम अपने रूट से जुड़ रहे हैं , अपने मूल से जुड़ रहे हैं । क्योंकि रूट या मूल से जुड़कर ही अपनी शक्ति का आभास होता है।

सफलता पाकर भी हमें ज़मीं पर रहना चाहिए। सफलता का घमंड नहीं करना चाहिए। लॉकडाउन में मैंने 50 साल बाद अपने स्कूल के दोस्तों से बातचीत किया। हमारे बीच वही उन्माद, वही मस्ती आज भी मौजूद थी। एक अलग ख़ुशी मिली। नई ऊर्जा और नई शक्ति का आभास हुआ, क्योंकि मैं अपने जड़ से जुड़ पाया। जड़ खोने से ही हम असुरक्षित महसूस करते हैं। हम अवसाद का शिकार होते हैं। मैं मुंबई बहुत ही कम पैसों के साथ आया था। आज मैं अपने घर में बहुत ही आराम से बैठा हूँ और आपसे बात कर रहा हूँ।

अनुपम खेर अपने फिल्म 'न्यू एमर्स्टडम' में

खुद से खुद की मुलाकात बेहद ज़रूरी है

लॉकडाउन ने लगभग सभी को ठहराव दिया। एक विराम दिया। खेर ने नीलेश मिसरा को बताया कि कभी-कभी महामारी जैसी चीज़ें हमें खुद से खुद को मिलने का मौका देती हैं। खुद को अवलोकन करने का या खुद का निरीक्षण करने का अवसर ही नहीं मिलता क्योंकि हम तो बहुत कुछ जुटाने की दौड़ में दौड़ते चले जा रहे हैं। ज़िन्दगी एक रिले रेस ही तो है, जिसमें एक डंडे के सहारे हम दौड़ लगा रहे हैं। एक दिन वह डंडा टूट जाता है

अब वक़्त है यह समझने का कि हमें अब किसी सहारे की ज़रूरत ही नहीं है। सब कुछ हमारी सोच पर निर्भर करता है। एक पॉज देकर या एक विराम देकर हम अपनी ज़िन्दगी को और स्वयं को समझ सकते हैं। हम अपना सहारा खुद बनें। या तो हम बिटर बन सकते हैं , असुरक्षित बन सकते हैं।

आगे उन्होंने कहा कि कभी-कभी हमें गुस्सा ज़िंदा रखता है तो कभी हर्ट या तकलीफ़ ज़िंदा रखता है। हमारे जीवन में कुछ ही लोग हैं जो हमारे लिए या हमें अच्छा बोलते हैं। हमारे लिए सकारात्मक रव्वैया रखते हैं। और सबसे ज़्यादा ज़रूरी हमारे लिए सच बोलते हैं।

पूरी ज़िन्दगी हम दुनिया को खुश रखना चाहते हैं। या अपनी ख़ुशी दूसरों पर छोड़ देते हैं। ज़रूरत है कि हम उन्हें अहमियत दें , जो हमें अहमियत देते हैं। हम आज कुछ भी जानने के लिए गूगल करते हैं। गूगल हमें जानकारी देता है। अनुभव या ज्ञान नहीं नहीं देता।जो ज़िन्दगी जीते-जीते मिलती रहती है।

अपने बचपन के दोस्त विजय सहगल के साथ अनुपम खेर (फोटो- ट्वीटर)

काम का सकारात्मक प्रभाव पड़ना बेहद आवश्यक होता है

"The Slow Cafe" में नीलेश मिसरा ने कहा कि मैं चाहता हूँ कि मैं जो भी काम करुं , उसका प्रभाव सकारात्मक हो। जैसे मैं रेडियो पे जो भी कहानी सुनाता हूँ , उसे सुन कर लोग बेहतर इंसान बनें।

खेर ने कहा कि हालाँकि मैं मशीनी युग की इज़्ज़त करता हूँ लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। दुनिया, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं , गैजेट और मोबाइल तक सिमट गई है। हमारे अंदर का सेंस ऑफ़ वंडर ख़त्म हो रहा है। जब तक हमारा सेंस ऑफ़ वंडर ज़िंदा है, हम भी ज़िंदा हैं। हम भाग रहे हैं। इतना कि साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है। हमें कछुआ से सीखना चाहिए कि कैसे धीरे-धीरे सांस लेकर ज़िन्दगी की बहुत लम्बी पारी खेली जा सकती है। प्रकृति से हम कनेक्ट नहीं हो पा रहे हैं। खेर ने कहा कि जब हम खुद से जुड़ पाएंगे, खुद को समझ पाएंगे, वह हमारा सबसे अच्छा दिन होगा। अच्छे लोगों से संपर्क करके हम सबसे धनवान बन सकते हैं । धनवान बनने के लिए बैंक बैलेंस होना ज़रूरी नहीं होता।

खेर ने बताया कि मुझमें धैर्यता की कमी थी। इस आदत के कारण मैं लगातार कई सालों तक फिल्मों में काम करता रहा। मैं रुका ही नहीं। अधैर्यता ने मुझे पहचान दिया। इसे मैं अपनी उपलब्धि के तौर पर लेता हूँ और इसके लिए मैं खुद को आज़ाद महसूस करता हूँ।

खेर ने कहा कि असफलता एक घटना है, इंसान नहीं है। इंसान फेल नहीं होता। घटना फेल होती है। उन्होंने कहा कि बचपन में मुझे याद है कि एक बार मैं रिपोर्ट कार्ड लेकर पिताजी के पास गया तो उनके पूछने पर मैंने बताया कि 60 बच्चों में मैं 59वें स्थान पर हूँ। उनका जवाब था कि तुम अगली बार 48 वें स्थान पर भी आ सकते हो। इसलिए तुम्हें कोई डर नहीं है। डर पहला स्थान पाने वाले को है। असफ़लता सबसे अच्छा शिक्षक है। और सफ़लता एक आयामी होता है।

उन्होंने एक बार फिर से दोस्तों से जुड़ने की चर्चा में अपने एक स्कूल के दोस्त विजय सहगल से फ़ोन पर बातचीत करने का ज़िक्र करते हुए कहा कि स्कूल में क्लास टॉपर ने जब मुझे अपने साथ इसलिए बैठाने से मना कर दिया क्योंकि मैं अच्छा स्टूडेंट नहीं था , तो मैं दूसरे छात्र के पास गया जो विजय सहगल था। उसने कहा कि तू मेरे साथ क्यों बैठना चाहता है तो मैंने कहा कि मुझे बैठने देगा तो तू ज़िन्दगी भर याद रखेगा कि तू अनुपम खेर का दोस्त है। फ़ोन पर हम दोनों इस बात पर खूब हँसे। अभी वह रिटायर्ड बैंकर है।

'आत्मनिरीक्षण करिये और स्लो रहिये। ज़िन्दगी खूबसूरत हो जायेगी।'

अनुवाद- इंदु सिंह

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में यहां पढ़ें- I do not want to walk about with the burden of my name Anupam Kher

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