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बंगाल में पीढ़ियों से मूर्तियों का काम करने वाले लाखों कारीगरों का काम कोरोना लॉकडाउन से प्रभावित

कोरोना संकट, चक्रवात अम्फान और अब भारी बारिश ने मूर्तियों का काम करने वाले पारंपरिक बंगाली कारीगरों के लिए मुश्किलें पैदा कर दी है। अकेले कोलकाता में कम से कम 2.5 लाख कारीगर प्रभावित हुए हैं, वहीं वित्तीय घाटा लाखों रुपयों का हुआ है।

बंगाल में पीढ़ियों से मूर्तियों का काम करने वाले लाखों कारीगरों का काम कोरोना लॉकडाउन से प्रभावित

- पूर्णिमा शाह

कूच बिहार, उत्तर बंगाल। पाल पारा, जिसे कुमरतुली (कुम्हार का इलाका) के नाम से जाना जाता है, पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में कुम्हारों का सबसे पुराना और शायद सबसे बड़ा इलाका है। यह राज्य की राजधानी कोलकाता से लगभग 700 किलोमीटर दूर स्थित है। इस क्षेत्र में अकेले छह कारखाने हैं जहां कारीगर विभिन्न त्योहारों के दौरान हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं।

एक तरफ जहां दुर्गा पूजा के मौके पर इस इलाके में कुम्हारों और खरीदारों की हलचल रहती थी वहीं इस समय यहां की गलियां सुनसान हैं।

लगभग एक शताब्दी पुराना ढाका विक्रमपुर शिलपलाया इस क्षेत्र का सबसे पुराना कारखाना है। आम तौर पर इस कारखाने में 15 से अधिक दैनिक मजदूरी कारीगर देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने का काम करते हैं। लेकिन अब केवल दो कारीगर स्टॉक रूम में बेकार बैठे हैं क्योंकि आर्डर की गई कई मूर्तियों के आदेश रद्द कर दिए गए हैं।

बंगाल में कारीगरों को आमतौर पर फरवरी से दुर्गा पूजा के आर्डर मिलना शुरू हो जाते हैं। मार्च से कारीगर मूर्ति के लिए धीरे-धीरे कच्चा माल जैसे मिट्टी, बांस के डंडे, लकड़ी के ढेर, सूखी घास, गहने, कपड़े, अस्त्र-शस्त्र और सजावटी सामान खरीदना शुरू कर देते हैं। चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा की, जिसके बाद देशव्यापी लॉकडाउन कर दिया गया इसकी वजह से एक के बाद एक आर्डर रद्द हो गए।

40 वर्षीय सुजीत पाल कहते हैं, "जनता कर्फ्यू के एक हफ्ते के भीतर और लॉकडाउन के बाद हमने तीन लाख रुपये के ऑर्डर खो दिए।" सुजीत उन तीन कारीगरों में से एक हैं, जो ढाका विक्रमपुर शिल्पालय कारखाने के मालिक हैं। उनकी फैक्ट्री का एक छोटा सा लकड़ी का कमरा गणेश, बिप्लोदतरिणी, मानसा और अनगिनत दुर्गा मूर्तियों से भरा पड़ा है। ये सभी मूर्तियां बिकी नहीं हैं।

सुजीत पाल ने गांव कनेक्शन से कहा, "हमारे पूर्वज भारत-बांग्लादेश विभाजन से पहले यहां आ गए थे। हम पैदाइशी कुम्हार हैं। हमारे पूर्वजों से पारित इस कला से महिला और पुरुष दोनों परिचित हैं। 95 वर्षीय मेरी मां विष्णु प्रिया पाल अभी भी मूर्तियों को पेंट करने का काम करती हैं।"

सुजीत यहां अपने भाई 67 वर्षीय बादल चंद्र पाल और 60 वर्षीय प्रदीप पाल के साथ 1.5 कट्ठा (पूर्वी भारत में भूमि मापने के लिए एक क्षेत्र) यानी लगभग 1,000 वर्ग फुट में रहते हैं। यह दो मंजिला अर्ध पक्का मकान कम कारखाना है। सुजीत बताते हैं, "हमारे पूर्वज भारत-बांग्लादेश विभाजन से पहले यहां आ गए थे। पहले हम यहां किराए पर रहते थे। मालिक से हमने इसे 12 साल पहले खरीदा था। ''


तालाबंदी का कहर

कूच बिहार में कारीगरों की एक संस्था कुमर्थुली मृतशिल्पा संस्कृति समिति को मार्च में लॉकडाउन की पहली घोषणा के बाद काम रोकना पड़ा। संस्था में जिले के भीतर के लगभग 60 कारीगर पंजीकृत हैं। वहीं जिले भर में कई अपंजीकृत कारीगर बिखरे हुए हैं। सभी बिना काम और मजदूरी के हैं।

कुछ ऐसा ही हाल कोलकाता कुमर्थुली मृतशिल्पा संस्कृति समिति (कुमर्थुली मूर्तियां बनाने की सांस्कृतिक समिति) के मूर्ति निर्माताओं की दुर्दशा का है। इसका गठन 1964 में हुआ था। आमतौर पर कुमर्थुली की इस समय काफी डिमांड रहती है पर इस वर्ष सब सूना पड़ा है।

कोलकाता के कुमरतुली शिल्पा केंद्र की प्रशंता पाल बताते हैं, "नबाद्वीप, कृष्णानगर, पूर्बस्थली, पटुली, बामनपुकुर, नादिया, बर्दवान, हल्दिया और बीरभूम के लगभग 15,000 दैनिक वेतन कारीगर काम के सिलसिले में कोलकाता के कुमरतुली आते हैं, लेकिन तालाबंदी और कोरोनवायरस के डर के कारण इस बार वह नहीं आए।"

कनटेंमेंट जोन पूरी तरह से लॉकडाउन होने की वजह उस क्षेत्र के लोगों ने कुछ दिन पहले ही आर्डर दिए थे जिसे उन्हें कैंसिल करना पड़ा।

प्रशंता आगे कहते हैं, विदेशी ग्राहक, जिन्होंने मार्च में आर्डर दिए और एडवांस भुगतान किया उन्होंने पैसे वापस नहीं लिए हैं। उन्होंने उन पैसों को अगले वर्ष के आर्डर के लिए रखने को कहा है। वह लोग बड़े दयालु हैं।

प्रसिद्ध मूर्ति निर्माता और कोलकाता कुमरतुली मृतशिल्पा संस्कृति समिति के सचिव बाबू पॉल ने बताया कि अकेले कोलकाता में 2.5 लाख से अधिक कारीगर जीवन व्यापन करने के लिए दुर्गा पूजा पर निर्भर हैं। मगर इस बार पूजा को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण इनका भविष्य अंधेरे में दिख रहा है।

पॉल ने गांव कनेक्शन को बताया, "हम सरकारी निकायों से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन हमें इस बात की कोई पुष्टि नहीं मिली है कि पूजा का आयोजन किया जाएगा या नहीं। हमने 25 दिन पहले एक लिखित अपील भेजी थी। इस समय जो लोग आर्डर दे भी रहे हैं वो छोटी मूर्तियों के दे रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से लॉकडाउन के कारण कुमरतुली में हमारे कारीगरों को कोई आय नहीं हुई है। हमने विदेश से दान प्राप्त किया और परिवारों को सूखा राशन वितरित किया।''

बादल चंद्र पाल ने कहा, "लगभग चार महीने से कोई कमाई नहीं होने के कारण परिवार चलाना कठिन हो गया है। हम हर दिन क्षेत्रीय समाचार पत्रों और टेलीविजन समाचार चैनलों की जांच करते हैं इस उम्मीद से कि सरकार हमारे पक्ष में कुछ घोषणा करेगी। मार्च मेंअपनी शिकायतों को लेकर हम जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय भी गए थे। हमने फार्म भर के अर्जी भी डाली मगर उधर से कोई जवाब नहीं आया। हम कारीगरों के साथ वर्षों से लापरवाही की जा रही है।''


कमाई का सीजन पर कोई आय नहीं

यह मूर्ति निर्माताओं के लिए कमाई का मौसम है क्योंकि अधिकांश हिंदू त्योहार इसी महीने से शुरू होते हैं। पाल की फैक्ट्री, ढाका विक्रमपुर शिल्पालय को शहर के विभिन्न मोहल्लों से बिरिर पूजा (घरों में आयोजित दुर्गा पूजा) और बाहरी स्थान जैसे सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, असम और मेघालय से हर साल कम से कम 80 दुर्गा मूर्तियों के ऑर्डर मिलते थे।

सुजीत पाल ने कहा, "हमें कूच बिहार के तीन क्लबों से अभी तक केवल तीन कंफर्म आर्डर मिले हैं। वे लोग बड़ी मूर्तियां खरीदने में रुचि नहीं रखते इसलिए हमारी आय 15,000 रुपये से अधिक नहीं होगी। "

पिछले साल, उन्होंने एक या दो लाख की मूर्ति बेची और पूजा के महीने के दौरान 50 लाख रुपये से अधिक की कमाई की।

पाल परा के रमेश चंद्र पाल कारखाना के 51 वर्षीय पुलक पाल ने गांव कनेक्शन को बताया कि उन्हें अभी तक एक भी आर्डर नहीं मिला है। उन्होंने कहा, "मैंने फरवरी के अंत में कच्चा माल खरीदा था। मेरे पास अब अपना ऋण चुकाने के पैसे नहीं हैं। मैं उन ठेका मजदूरों का भुगतान करने में असमर्थ हूं जो मेरे लिए काम करते हैं। यदि बिक्री जल्द शुरू नहीं हुई, तो मुझे चाय स्टाल खोलना पड़ेगा। "

पाल पारा में भुबन शिल्पा मंदिर मॉडल स्टूडियो के 61 वर्षीय गोबिंदो पॉल की भी यही कहानी है। मूर्तियों के अलावा 70 साल पुरानी यह फैक्ट्री फूलों के गमले भी बनाती है। पौधे बेचने के लिए इनके पास एक छोटी नर्सरी है। गोबिन्दो जिसने छोटी सी उम्र में पिता का काम संभाला बताते हैं, "कस्बे के अलग-अलग क्लबों ने जानकारी ली है लेकिन किसी ने भी आर्डर कंफर्म नहीं किया है। हमें बरिर पूजा के अब तक दो आर्डर मिले हैं और वो भी केवल छोटी मूर्तियों के लिए।"

गोबिंदो ने कहा, "मेरे अधिकांश आर्डर उत्तर बंगाल, जयगांव और फंटशोलिंग के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं, लेकिन इस बारअभी तक उन ग्राहकों से कोई आर्डर नहीं आया है। मेरी नर्सरी के कारण मैं कम से कम अपने परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करने में सक्षम हूं। "

पुरुषों के अलावा महिला कारीगर भी हैं। गुनजोबरी कनई पाल प्रतिमा करखाने में काम करने वाली 40 वर्षीय संपा पाल अपने पति के साथ मूर्तियां बनाने का काम करती हैं।


संपा ने गांव कनेक्शन को बताया, "हमारे पूर्वज 85 साल पहले यहां आए थे, जब कूच बिहार के महाराजा (राजा) उन्हें यहां लाए थे और तीन बीघा (लगभग 1.2 एकड़) भूमि भेंट की थी। अब हमारे पास सिर्फ दो कट्ठा (0.16 एकड़) जमीन बची है।''

संपा का परिवार मूल रूप से कृष्णानगर का है और उनके पूर्वज उन कारीगरों में से थे जिन्होंने कूचबिहार राजबाड़ी (पैलेस) के अंदर प्रतिमा और मूर्तियों को तराशने का काम किया था।

संपा कहती हैं, "मेरे अनुमान से बंगाल की दुर्गा पूजा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि कामगरों के पास काम नहीं है। आमतौर पर पूजा के मौके पर हम लोग 60,000 रूपये महीना कमा लेते थे। संपा के परिवार में कुल 10 लोग हैं और सभी मूर्ति बनाने के काम पर ही निर्भर हैं।"

कारीगर जो अपने कारखानों के मालिक हैं और जिनके पास बेहतर पूंजी है वह अन्य कारीगरों को दैनिक मजदूरी के रूप में काम पर रख लेते हैं। आर्डर की संख्या कम होने के बावजूद भी यह जारी है क्योंकि वे वर्षों से एक साथ काम करते आ रहे हैं।

प्रदीप पाल कहते हैं, "हम बिना आर्डर के भी मूर्तियां बनाते हैं क्योंकि हमें अपने कारीगरों को पैसा देना होता है जो हमारे साथ सालों से हैं। वे पूरी तरह से हम पर निर्भर हैं। हमें उम्मीद है कि ग्राहक बरिर पूजा के लिए कम से कम छोटी मूर्तियां खरीदेंगे।"

उन्होंने आगे कहा, "हमें न तो बैंकों ने और न ही सरकार कोई लोन प्रदान किया। मार्च में हमारा कच्चा माल पुंडीबारी, भेटागुरी, तूफानगंज, चिलखाना, काकरीबारी, मारुगंज और कोलकाता से आ गया था। पूरे खर्च और कर्ज को कवर करने के लिए हमने छह लाख रुपये का कर्ज लिया और कर्मचारियों का भुगतान किया।"


घाटे का साल

बादल पाल कहते हैं, "अप्रैल में पोइला बैसाख (बंगाली नया साल) और अक्षय तृतीया के दौरान ढाका विक्रमपुर शिल्पालय ने लगभग 500 गणेश मूर्तियां बनाई, लेकिन केवल दो ही कंफर्म आर्डर आए। हम इस उम्मीद में थे फुटपाथ पर बैठकर मूर्तियां बेच पाएंगे लेकिन सख्त तालाबंदी के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उस अवधि के दौरान हमने 5 लाख रुपये से अधिक का नुकसान उठाया।"

वह शिकायत करते हुए कहते हैं, "वर्षों से कारीगर सरकारी अधिकारियों से वित्तीय सहायता लेने के लिए संपर्क कर रहे हैं। इस तरह का काम निवेश के बिना नहीं चल सकता और ऋण ही हमारा एकमात्र विकल्प है। कोलकाता के कारीगरों को पौरोशोबा (पश्चिम बंगाल नगरपालिका प्रशासन) से ऋण मिलता है लेकिन एक बार भी उत्तर बंगाल के कुमारटोली कारीगरों को वित्तीय सहायता नहीं मिली।"

प्रदीप पाल ने बताया, "हर साल कम से कम 25 ट्रक मिट्टी और 4000 से अधिक बांस के खंभों की आवश्यकता होती है।" कुछ 15 से 30 कारीगर 300 रुपये से 500 रुपये के दैनिक वेतन पर निर्भर करते हैं और उत्तर बंगाल, कृष्णानगर और कोलकाता के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। एक मूर्ति पर कम से कम छह लोगों की जरूरत होती है।"

उन्होंने कहा, "इस पेशे में सभी लोग एक-दूसरे पर निर्भर हैं इसलिए यदि कोई एक नुकसान से गुजरता है तो दूसरे को भी उसका सामना करना पड़ता है।"

लॉकडाउन से उतना नुकसान नहीं हुआ जितना मई में आए चक्रवात अम्फान और अब मानसून की भारी वर्षा ने इन कारीगरों के संकट को और बढ़ा दिया है। वे मिट्टी की मूर्तियों को पानी से बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। कई मूर्तियों फुटपाथ पर तो अस्थायी आश्रयों में पड़ीं हैं जिन्हें फिलहाल तिरपाल से ढक कर रखा गया है।

सुजीत पाल कहते हैं,"मिट्टी की इन मूर्तियों को बचा कर रखने में अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होती है। हमें उन्हें अलग से मोटी प्लास्टिक शीट के साथ अच्छी तरह से पैक करके रखना पड़ता है नहीं तो उसमें दरार आ जाती है और वो टूट जाती हैं। हमारे पास पर्याप्त प्लास्टिक शीट नहीं हैं। पानी हर दिन इकट्ठा हो रहा है जिससे बाढ़ जैसी स्थिति बन गई है। हम फुटपाथ और वर्कशॉप में ग्राउंड फ्लोर पर रखी मूर्तियों को नहीं बचा पाएंगे। देखते हैं हमारे भाग्य में क्या है ? "

उन्होंने गांव कनेक्शन से कहा, "अभी भी इस पर कोई स्पष्टता नहीं है कि इस वर्ष दुर्गा पूजा होगी भी या नहीं। हालांकि कारीगर मूर्तियां बनाने का काम जारी रखे हुए हैं।"


सोनारी ककरीबारी गांव से रोज 10 किलोमीटर साइकिल चलाकर कूचबिहार की एक फैक्ट्री में काम करने जाने वाली 55 वर्षीय मोनी पाल कहती हैं, "हम दुर्गा की मूर्तियों को कम संख्या में बनाने का काम जारी रखे हुए हैं, इस उम्मीद से कि सरकार की तरफ से अचानक कोई घोषणा होगी और हमारे लिए चीजें बदल जाएंगी।"

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि क्यों वे काम करने के कोई और विकल्प के बारे में नहीं सोच सकते क्योंकि यह एकमात्र ऐसा काम है जो वो पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा, '' पुजो सीजन के दौरान हम लगभग 20,000 रुपये महीना कमाते थे। मगर अब 5,000 रुपये भी नहीं कमा रहे हैं। अगर हमें काम नहीं मिला तो हम भूख से मर जाएंगे।"

प्रदीप ने बताया कि कई काम के लिए उन्हें निजी निकायों से कर्ज भी लेना पड़ा। हमें न तो बैंकों ने ऋण दिया और न ही सरकार ने। मार्च में हमारा कच्चा माल पुंडीबारी, भेटागुरी, तुफानगंज, चिलखाना, काकरीबारी, मारुगंज और कोलकाता के विभिन्न स्थानों से आ चुका था। पूरे खर्च और कर्ज को कवर करने के लिए हमने छह लाख रुपये का लोन लिया और उन पैसों से कर्मचारियों का भुगतान किया।

शिकायत करते हुए बादल कहते हैं, "वर्षों से हम वित्तीय सहायता की मांग करने के लिए सरकारी अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं। मगर जब उन्होंने इन सभी वर्षों में हमारी कभी मदद नहीं की तो अब महामारी के समय उनसे मदद की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस बार उनके पास वास्तविक बहाना भी है।"

कोलकाता के कुमरतुली में शिल्प केंद्र के प्रशांत पाल को कोलकाता, जलपाईगुड़ी और ऋषिकेश से क्लबों से आर्डर मिलने के साथ-साथ ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर और नीदरलैंड जैसे देशों से अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर प्राप्त करने के लिए भी जाना जाता हैं।

प्रशांत ने गांव कनेक्शन से कहा, "मेरे पास इस समय कुल आठ अंतरर्राष्ट्रीय आर्डर हैं। मैं केवल 30 स्थानीय आर्डर लेता हूं क्योंकि वे सभी बड़े और थीम आधारित मूर्तियां होती हैं। फरवरी में ग्राहकों ने आर्डर के लिए भुगतान किया था लेकिन लॉकडाउन की घोषणा के बाद किसी को भी यह पता नहीं है कि पूजा का आयोजन होगा भी या नहीं। "

उन्होंने आगे कहा, कुछ ऐसे आर्डर भी हैं जो आए और एक या दो दिन में ही कैंसिल गए। यह चिंताजनक है। स्थानीय आदेश बहुत कम हैं और वे सभी छोटी मूर्तियां चाहते हैं।

कोलकाता का कुमरतुली आमतौर पर साल के इस समय के खूब चहल पहल वाला हुआ करता है लेकिन इस समय सब वीरान है। प्रशान्त ने कहा, "नबाद्वीप, कृष्णानगर, पूर्बस्थली, पटुली, बामनपुकुर, नादिया, बर्दवान, हल्दिया और बीरभूम के लगभग 15,000 दैनिक वेतन कारीगर काम के सिलसिले में कोलकाता के कुमरतुली जाते थेलेकिन तालाबंदी और कोरोना वायरस के डर के कारण इस बार कोई नहीं गया।"

प्रशांत ने बताया, '' कुछ कंटेनमेंट जोन में पूरी तरह से लॉकडाउन है इसलिए जिन लोगों ने कुछ दिन पहले ही ऑर्डर दिया थे वो कैंसिल कर दिए। हालांकि जिन विदेशी ग्राहकों ने मार्च में एडवांस आर्डर देकर भुगतान कर दिया था, उन्होंने अभी पैसे वापस नहीं लिए हैं। उन्होंने उस भुगतान को अगले वर्ष के लिए रखने को कहा है।"


कारीगरों की अंतिम पीढ़ी

पेशे में अंतहीन कठिनाइयों के बावजूद गांव कनेक्शन से बातचीत को दौरान किसी भी कारीगर ने अपने बच्चों को इस पेशे को संभालने की इच्छा व्यक्त करने की बात नहीं की। ढाका विक्रमपुर शिल्पालय के बच्चे पुणे जैसे शहर में काम कर रहे हैं। सुदीप पाल ने कहा कि उनका बेटा पुणे में एक आईटी फर्म में काम करता है।

सुदीप पाल जिनका बेटा पुणे की एक आईटी फर्म में काम करता है कहते हैं,"हमारे बच्चों ने हमें दिन-रात संघर्ष करते देखा है। इस पेशे में पर्याप्त पैसा न होना एक बड़ी वजह है जिसकी वजह से उन्होंने कभी इस पेशे के प्रति रुचि नहीं दिखाई। "उनकी बेटियों की शादी अलग-अलग पेशे वाले परिवारों में हुई है।

बादल पाल ने कहा, "यह सोचकर दुःख होता है कि हमारी पारंपरिक कला खो जाएगी लेकिन मैं इसके लिए बच्चों को दोष नहीं देता और उनसे इस काम में शामिल होने की उम्मीद करता हूं क्योंकि मुझे उन्हें इस पेश से देने के लिए कुछ भी सकारात्मक नहीं मिला।"

अनुवाद- सुरभि शुक्ला

मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस स्टोरी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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