सोयाबीन की सुस्त बुआई से बढ़ी महँगाई की आशंका, चढ़ सकते हैं खाद्य तेल के दाम, अल नीनो ने भी बढ़ाया जोखिम
देश के प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्यों में सोयाबीन की बुआई में हो रही देरी ने खाद्य तेलों की कीमतों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानसून की धीमी प्रगति के कारण बुआई लगभग दो सप्ताह पीछे चल रही है। यदि जल्द पर्याप्त और संतुलित बारिश नहीं हुई, तो घरेलू स्तर पर सोयाबीन उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिसका सीधा असर खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ने की आशंका है।
इस बीच पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर भी खाद्य तेल बाज़ार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद खाद्य तेलों की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब यदि मानसून की स्थिति नहीं सुधरती और अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है, तो घरेलू बाज़ार के साथ-साथ वैश्विक आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ सकता है। इससे उपभोक्ताओं को आने वाले महीनों में खाद्य तेल के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
छह राज्यों में सोयाबीन की बुआई पिछड़ी
देश में सोयाबीन की बुआई मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना और कर्नाटक में होती है। इन राज्यों में अब तक सामान्य से कम बारिश होने के कारण बुआई की रफ़्तार लगभग पंद्रह दिन पीछे चल रही है। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सोपा) के कार्यकारी निदेशक डी. एन. पाठक ने कहा कि सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में जल्द बारिश होना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि केवल बारिश होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका समान वितरण भी आवश्यक है, ताकि फसल की उत्पादकता प्रभावित न हो।
सोपा के अनुसार, खरीफ़ सीज़न 2025 में देश में लगभग 1.102 करोड़ टन (11.02 मिलियन टन) सोयाबीन का उत्पादन हुआ था। यदि इस बार बुआई में देरी लंबे समय तक बनी रहती है या बारिश सामान्य नहीं रहती, तो उत्पादन में कमी आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अल नीनो और वैश्विक उत्पादन पर नज़र, खाद्य तेल बाज़ार में बढ़ सकता है दबाव
खाद्य तेल कंपनियों का मानना है कि यदि अल नीनो के कारण मौसम में गड़बड़ी बढ़ती है, तो सोयाबीन उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसका असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिका, ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे दुनिया के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक देशों में भी उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
ऐसी स्थिति में वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की आपूर्ति कम हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाज़ार में किसी भी तरह की कमी या मूल्य वृद्धि का असर घरेलू उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। ऐसे में कृषि क्षेत्र और खाद्य तेल उद्योग दोनों की नज़र अब मानसून की प्रगति और आने वाले दिनों की बारिश पर टिकी हुई है।