शिवराज सिंह ने बताया कम ज़मीन में ज़्यादा कमाई का तरीका! ICAR का ये मॉडल अपनाकर बढ़ेगी किसानों की आमदनी
खेती के लिए ज़मीन कम हो तो आमदनी भी कम होगी, ऐसा ज़रूरी नहीं है। अगर एक ही खेत में अलग-अलग फसलों के साथ पशुपालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों को जोड़ा जाए, तो छोटी जोत से भी बेहतर कमाई का रास्ता बन सकता है। पटना में आयोजित कृषि जन कल्याण संवाद में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को इंटीग्रेटेड फार्मिंग यानी एकीकृत खेती अपनाने की सलाह देते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक मॉडल का ज़िक्र किया।
उन्होंने छोटे किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए एकीकृत खेती के साथ प्राकृतिक खेती पर भी ज़ोर दिया। उनके मुताबिक़, खेती को सिर्फ़ एक फसल तक सीमित रखने के बजाय खेत की उपलब्ध जगह का अलग-अलग तरीक़े से इस्तेमाल किया जाए, तो किसान सालभर आमदनी के कई ज़रिए बना सकते हैं।
2-3 बीघे में खेती के साथ मछली और मुर्गी पालन
कृषि मंत्री ने आईसीएआर के पूर्वी परिसर में लागू किए गए एक मॉडल का उदाहरण दिया। इसमें करीब दो से तीन बीघे ज़मीन को अलग-अलग हिस्सों में इस्तेमाल करने की योजना है। धान की फसल लेने के बाद खेत के हिस्सों में गेहूं, चना, सरसों और मक्का जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं। वहीं, खेत के एक हिस्से में भू-तालाब बनाकर मछली पालन किया जा सकता है। इसके साथ मुर्गी और बतख पालन, बेल वाली सब्ज़ियों की खेती, फलदार पेड़ और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी की जा सकती है। इस तरह किसान को एक ही ज़मीन से अलग-अलग तरह की उपज मिलती रहती है। अगर किसी एक फसल की कीमत कम हो जाए या उत्पादन प्रभावित हो, तो दूसरे स्रोतों से होने वाली आमदनी किसान के लिए सहारा बन सकती है।
एक ही खेत से सालभर कमाई का मॉडल
एकीकृत खेती की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि इसमें किसान किसी एक फसल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता। फसल उत्पादन के साथ मछली, अंडे, मांस, सब्ज़ियां, फल और चारे जैसी चीज़ों को भी खेती की व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। सरकार की ओर से साझा किए गए मॉडल के मुताबिक़, इस तरह की समेकित खेती से कई किसान परिवारों की आमदनी महीने-दर-महीने बढ़ सकती है और सालाना आय करीब 2 लाख रुपये तक पहुँचने का उदाहरण सामने आया है। हालांकि, वास्तविक आमदनी खेती के क्षेत्र, मौसम, उत्पादन, बाज़ार भाव और किसान द्वारा अपनाई गई गतिविधियों पर निर्भर करेगी।
कृषि मंत्री ने किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने खेती में रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई। हालांकि, किसानों को अपनी पूरी ज़मीन पर अचानक प्राकृतिक खेती शुरू करने के बजाय पहले खेत के छोटे हिस्से में इसका प्रयोग करने की सलाह दी गई। इससे किसान अपनी मिट्टी, उत्पादन और लागत में होने वाले बदलाव को समझने के बाद धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ा सकते हैं।
ऑर्गेनिक उपज को मिलेगा बेहतर बाज़ार?
प्राकृतिक या जैविक खेती करने वाले किसानों के सामने सिर्फ़ उत्पादन की चुनौती नहीं होती, बल्कि अपनी उपज का सही दाम पाना भी बड़ी समस्या है। कई बार किसान बेहतर गुणवत्ता वाली उपज तो तैयार कर लेते हैं, लेकिन उसे सामान्य उत्पाद से अलग पहचान और बाज़ार नहीं मिल पाता। इसी को देखते हुए शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग पर काम करने की बात कही। केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर ऐसे उत्पादों को बाज़ार से जोड़ने की कोशिश की जाएगी, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
छोटे किसानों के लिए क्यों अहम है एकीकृत खेती?
छोटे किसानों के पास ज़मीन सीमित होती है, इसलिए सिर्फ़ एक या दो फसलों पर निर्भर रहने से उनकी आमदनी भी सीमित रह सकती है। एकीकृत खेती में उसी ज़मीन पर कई गतिविधियों को जोड़कर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है। मिसाल के तौर पर तालाब में मछली पालन, उसके आसपास सब्ज़ियों की खेती, खेत में अनाज और दलहन की फसलें, साथ में मुर्गी या बतख पालन—इन सभी को एक-दूसरे से जोड़ा जा सकता है। इससे खेती का अपशिष्ट भी दूसरे काम में इस्तेमाल हो सकता है और लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, हर किसान के लिए एक ही मॉडल काम करेगा, यह ज़रूरी नहीं है। पानी की उपलब्धता, मिट्टी, बाज़ार, श्रम और स्थानीय मौसम के हिसाब से गतिविधियों का चुनाव करना होगा। एकीकृत खेती छोटे किसानों के लिए सिर्फ़ ज़्यादा उत्पादन का मॉडल नहीं, बल्कि आमदनी के कई रास्ते बनाने की कोशिश है। अगर इसे स्थानीय ज़रूरतों और बाज़ार के हिसाब से अपनाया जाए, तो कम ज़मीन में भी किसान अपनी आय को अधिक स्थिर बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।