10% से अधिक वर्षा की कमी खरीफ फसलों पर डाल सकती है असरः सरकार

Gaon Connection | Jul 24, 2026, 18:54 IST
मानसून की वर्षा में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी का असर खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ेगा। हालांकि, सिंचाई और नई तकनीकों से किसानों को कुछ राहत मिली है। पहले के सालों में सूखा और एल नीनो जैसी घटनाओं ने खरीफ की पैदावार को प्रभावित किया था। ई-नाम के माध्यम से अंतरराज्यीय कृषि व्यापार में तेजी आई है तथा मसालों के प्रसंस्करण का भी विस्तार हुआ है।

राज्यसभा में सरकार ने बताया कि देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा सामान्य से 10 प्रतिशत से अधिक कम होने पर खरीफ खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि हाल के वर्षों में सिंचाई, उन्नत बीज और आधुनिक कृषि तकनीकों के कारण इसका असर पहले की तुलना में कुछ कम हुआ है।



देश में खरीफ सीज़न की खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर करता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और बाजरा जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई से लेकर शुरुआती बढ़वार तक पर्याप्त बारिश की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्यान्न उत्पादन और किसानों की आय पर भी पड़ता है। सरकार ने राज्यसभा में दी गई जानकारी में बताया है कि जब देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा सामान्य से 10 प्रतिशत से अधिक कम हो जाती है, तब खरीफ खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।



10% से अधिक वर्षा घाटा बढ़ाता है उत्पादन की चिंता

राज्यसभा में जलवायु परिवर्तन और मानसून की अनिश्चितता के खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव से जुड़े प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की गंभीर कमी का सीधा संबंध खरीफ खाद्यान्न उत्पादन से देखा गया है। उन्होंने कहा कि जब अखिल भारतीय स्तर पर वर्षा की कमी लगभग 10 प्रतिशत से अधिक होती है, तब उत्पादन में गिरावट की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में सबसे अधिक चुनौती वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के सामने आती है, क्योंकि उनकी फसलें पूरी तरह प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर रहती हैं।



सूखा और एल नीनो वाले वर्षों में दिखा असर

सरकार ने अपने जवाब में यह भी बताया कि 1982, 1987, 2002, 2004, 2009, 2014 और 2015 जैसे प्रमुख सूखा और एल नीनो वाले वर्षों में देश में मानसून की वर्षा सामान्य से 12 से 22 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई थी। इन वर्षों में खरीफ खाद्यान्न उत्पादन पर अलग-अलग स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला। हालांकि हर वर्ष उत्पादन में गिरावट समान नहीं रही, क्योंकि विभिन्न राज्यों में मौसम की स्थिति और कृषि परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं।



बेहतर कृषि प्रबंधन से कुछ कम हुआ जोखिम

सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का असर पहले की तुलना में कुछ कम हुआ है। इसके पीछे सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, सूखा सहन करने वाली उन्नत फसल किस्मों को अपनाना, मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में सुधार, किसानों तक समय पर कृषि संबंधी सलाह पहुँचाना, बीज और अन्य कृषि आदानों की बेहतर उपलब्धता, आधुनिक फसल प्रबंधन तकनीकों का उपयोग तथा राज्यों द्वारा तैयार की जाने वाली आकस्मिक कार्य योजनाएँ प्रमुख कारण हैं। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में विभिन्न सरकारी हस्तक्षेपों ने भी जोखिम को कम करने में मदद की है।



खरीफ सीज़न पर बनी हुई है नजर

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि खरीफ 2026-27 की बुवाई अभी कई राज्यों में जारी है। इसलिए जुलाई से जून तक चलने वाले कृषि वर्ष की प्रमुख खरीफ फसलों के प्रथम अग्रिम उत्पादन अनुमान अभी जारी नहीं किए गए हैं। ऐसे में इस वर्ष मानसून की स्थिति का वास्तविक असर उत्पादन पर कितना पड़ेगा, इसका स्पष्ट आकलन शुरुआती आधिकारिक अनुमान आने के बाद ही संभव होगा। फिलहाल कृषि क्षेत्र की निगाहें मानसून की आगे की चाल पर टिकी हैं। यदि आने वाले दिनों में वर्षा सामान्य रहती है, तो फसलों की बढ़वार को सहारा मिल सकता है। वहीं यदि बारिश में बड़ी कमी बनी रहती है, तो इसका असर उत्पादन पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में किसानों, कृषि विभागों और नीति-निर्माताओं के लिए मौसम की लगातार निगरानी और समय पर आवश्यक कदम उठाना महत्वपूर्ण रहेगा।



कपास, मसाला और ई-नाम पर भी साझा किए गए आँकड़े

संसद में कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य विषयों पर भी जानकारी दी गई। वस्त्र राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा ने बताया कि किसानों के अधिक लाभ देने वाली दूसरी फसलों की ओर रुख करने से कपास का रकबा घटा है। वर्ष 2020-21 में कपास का उत्पादन 352.48 लाख गांठ था, जो 2025-26 (अनंतिम) में घटकर 290.91 लाख गांठ रह गया। हालांकि इस अवधि में उत्पादकता 428 से 451 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के बीच लगभग स्थिर रही। उन्होंने यह भी बताया कि अंतरराष्ट्रीय कपास कीमतों में लगभग 19 प्रतिशत और घरेलू एस-6 किस्म के कपास की कीमतों में करीब 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।


वहीं वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि 2025-26 के दौरान देश के स्पाइसेज़ पार्कों में 52,986.79 टन मसालों का प्रसंस्करण किया गया, जिनकी अनुमानित कीमत 579.06 करोड़ रुपये रही। इसके अलावा 12,040 टन मसाले और मसाला उत्पाद, जिनकी कीमत लगभग 201.09 करोड़ रुपये थी, निर्यात या निर्यातकों को उपलब्ध कराए गए। स्पाइसेज़ पार्कों के गोदामों में 16,235 टन मसाले, जिनकी अनुमानित कीमत 206.63 करोड़ रुपये थी, भंडारित किए गए। सरकार के अनुसार, देश में अब तक आठ फसल-विशिष्ट स्पाइसेज़ पार्क स्थापित किए जा चुके हैं।



ई-नाम से बढ़ रहा अंतरराज्यीय कृषि व्यापार

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि 30 जून 2026 तक ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाज़ार) पर 1.89 करोड़ किसान और 2.78 लाख व्यापारी पंजीकृत हो चुके हैं। वर्ष 2018-19 में जहाँ अंतरराज्यीय व्यापार 563 टन (करीब 37 लाख रुपये) था, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 2,984.3 टन (लगभग 14.28 करोड़ रुपये) हो गया। अब तक 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को ई-नाम से जोड़ा जा चुका है, जिनमें इस वर्ष जनवरी से जून के बीच 134 नई मंडियाँ शामिल हुई हैं।

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