1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगता है 10000 लीटर पानी, क्या चावल से ईंधन का सौदा भारत को पड़ेगा भारी? जल संकट की तैयारी!

Gaon Connection | Apr 30, 2026, 16:55 IST
भारत सरकार एथेनॉल मिश्रण के माध्यम से पेट्रोल की दक्षता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसका लक्ष्य कच्चे तेल के आयात को कम करना है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा खतरा छिपा है। कृषि उत्पादों से एथेनॉल बनाने में जुटाई जाने वाली जल संसाधन दरअसल देश के जल संकट को और नाजुक बना सकती है।

भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर खतरा छिपा है। एथेनॉल उत्पादन के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है जिससे देश का जल संकट और गहरा सकता है। दलअसल, भारत सरकार ने देश में वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने ऐसे फ्यूल पर काम शुरू किया है जिसमें पेट्रोल की जगह ज्यादा इथेनॉल इस्तेमाल होगा। इसके लिए E85 (85% इथेनॉल) और E100 (100% इथेनॉल) के उपयोग को लेकर ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिए गए हैं। अब क्या पेट्रोल के विकल्प के लिए पानी को दांव पर लगाया जाएगा?



एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है

एथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब पेट्रोल में पौधों से बनने वाले अल्कोहल यानी एथेनॉल को मिलाना है, ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो सके। भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके लिए सरकार ने 2024-25 में 52 लाख टन चावल एथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया था, जिसे 2025-26 में बढ़ाकर 90 लाख टन करने का लक्ष्य है। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में टूटे चावल की हिस्सेदारी भी घटाई जा रही है।



एक लीटर एथेनॉल में 10,000 लीटर पानी की खपत

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 2024 में एक कॉन्फ्रेंस में बताया था कि चावल से एक लीटर एथेनॉल बनाने में करीब 10,790 लीटर पानी लगता है। इसमें खेती और प्रोसेसिंग दोनों शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर पानी खेती में ही खर्च होता है। एक किलो चावल उगाने में 3,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है, और करीब 2.5 से 3 किलो चावल से एक लीटर एथेनॉल बनता है।



उद्योग ज्यादा पानी खर्च कर रहा

रिपोर्ट के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत बेहद ज्यादा है, लेकिन इसके लिए उद्योगों को उतनी आलोचना नहीं झेलनी पड़ती जितनी किसानों को। रिपोर्ट में बताया गया कि जहां किसान 1 किलो चावल उगाने में 3,000-5,000 लीटर पानी खर्च करते हैं, वहीं उद्योग 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से ज्यादा पानी इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञ अंजल प्रकाश के मुताबिक, एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलें अत्यधिक पानी मांगती हैं, जिससे जल संकट और बढ़ सकता है।



जल संकट के बीच बढ़ रहा एथेनॉल उत्पादन

भारत पहले से ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई समेत 21 बड़े शहरों में भूजल खत्म होने का खतरा है। इसके बावजूद देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,822 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है, और इसका बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र जैसे जल संकट झेल रहे राज्यों में केंद्रित है।



गन्ना और मक्का भी बढ़ा रहे दबाव

एथेनॉल उत्पादन में गन्ना और मक्का का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। एक लीटर एथेनॉल के लिए गन्ना करीब 3,636 लीटर और मक्का करीब 4,670 लीटर पानी खपत करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में पहले से गन्ने की खेती हो रही है, वहां भूजल स्तर पहले ही गिर चुका है और एथेनॉल प्लांट इस दबाव को और बढ़ा रहे हैं।

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