El Niño 2026 Alert: किसानों के लिए चुनौती बन सकता है कमजोर मानसून, अभी से बदलनी होगी खेती की रणनीति

Preeti Nahar | May 13, 2026, 10:12 IST
साल 2026 में एल नीनो के संभावित प्रभाव से भारतीय कृषि पर चिंता बढ़ गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे खरीफ फसलों को नुकसान होगा। किसानों को मौसम के अनुसार अपनी खेती की रणनीति बदलनी होगी। कम पानी वाली फसलें और आधुनिक सिंचाई तकनीकें अपनाना महत्वपूर्ण होगा।

Impact on Kharif Crops: साल 2026 में संभावित एल नीनो (El Niño) की आशंका ने भारतीय कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एल नीनो प्रभाव मजबूत हुआ, तो देश में मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे खरीफ फसलों पर बड़ा असर देखने को मिल सकता है। भारत की खेती अभी भी काफी हद तक बारिश पर निर्भर है और ऐसे में बारिश में थोड़ी भी कमी किसानों की लागत, उत्पादन और आय तीनों को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस बार किसानों को पारंपरिक खेती के बजाय मौसम के अनुसार रणनीति बदलने की जरूरत होगी।



क्या होता है एल नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?

एल नीनो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ी एक जलवायु घटना है, जिसका असर दुनियाभर के मौसम पर पड़ता है। भारत में एल नीनो का सीधा असर मानसून पर देखा जाता है। आमतौर पर एल नीनो वर्षों में बारिश कम होती है, तापमान बढ़ता है और सूखे जैसे हालात बनने लगते हैं। वैज्ञानिकों ने 2026 में एल नीनो बनने की आशंका जताई है और कई वैश्विक एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यह वर्ष अत्यधिक गर्म और शुष्क हो सकता है।



खरीफ फसलों पर सबसे ज्यादा असर

विशेषज्ञों का कहना है कि धान, गन्ना, कपास और मक्का जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसलें सबसे अधिक प्रभावित हो सकती हैं। यदि मानसून देर से आता है या बीच में लंबे ड्राई स्पेल आते हैं, तो इन फसलों की बुवाई और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे। दक्षिण भारत के कावेरी डेल्टा और कई अन्य राज्यों में किसान पहले से ही भूजल के सहारे जल्दी बुवाई शुरू कर चुके हैं ताकि मौसम की अनिश्चितता से नुकसान कम किया जा सके।



किसानों को क्या बदलना होगा?

कृषि और मौमस वैज्ञानिकों के साक-साथ केंद्रिय मं किसानों को कम अवधि वाली और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर बढ़ने की सलाह दे रहे हैं। मोटे अनाज, दालें और सूखा सहन करने वाली किस्में इस बार बेहतर विकल्प मानी जा रही हैं। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय सहित कई कृषि संस्थानों ने किसानों को मिलेट्स और दालों की खेती बढ़ाने की सलाह दी है ताकि कमजोर मानसून की स्थिति में भी नुकसान कम हो। ऐसा ही उदाहरण पेश कर रहे हैं ओडिसा के किसान जो कम पानी वाली सिंचाई तकनीक का इसतेमाल कर खेती को मौसम अनुकूल ढाल रहे हैं।



असम के गोलाघाट और शिवसागर जिलों के कई किसानों की तरह गोगोई भी उन किसानों में शामिल हैं, जिन्हें माइक्रो इरिगेशन सिस्टम अपनाने से बड़ा फायदा मिला है। ‘रेजिलिएंस’ प्रोजेक्ट के तहत किसानों को स्प्रिंकलर और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकें उपलब्ध कराई गई हैं। ये माइक्रो इरिगेशन सिस्टम केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत किसानों तक पहुंचाए जा रहे हैं।



साल 2018 में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट को नॉर्वे के विदेश मंत्रालय द्वारा वित्तीय सहायता दी जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे किसानों की कृषि उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु और आर्थिक बदलावों के प्रति उनकी क्षमता मजबूत करना और कृषि बाजार से जुड़ी मूल्य श्रृंखलाओं को सशक्त बनाना है। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के पैटर्न में लगातार बदलाव हो रहा है, ऐसे में कम पानी में खेती करने वाली माइक्रो इरिगेशन तकनीक किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है।



पानी बचाने वाली तकनीक होगी सबसे बड़ा हथियार

ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिंचाई, मल्चिंग और खेत में नमी बनाए रखने वाली तकनीकों का महत्व इस साल और बढ़ सकता है। कृषि विभागों ने किसानों को सुबह या शाम के समय सिंचाई करने और खेत में जैविक पदार्थ बढ़ाने की सलाह दी है ताकि मिट्टी ज्यादा समय तक नमी रोक सके। तमिलनाडु सहित कई राज्यों में किसानों को गर्मी और सूखे से बचाव के लिए एडवाइजरी जारी की गई है।



असम के अलावा यह परियोजना ओडिशा में भी लागू की जा रही है। इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (IWMI) इस ‘रेजिलिएंस’ प्रोजेक्ट का प्रमुख साझेदार है और राज्य सरकारों के साथ मिलकर असम के गोलाघाट और शिवसागर तथा ओडिशा के कटक और गंजाम जिलों में माइक्रो इरिगेशन सिस्टम लगाने का काम कर रहा है।



असम के किसान से लगभग 1800 किलोमीटर दूर ओडिशा के गंजाम जिले के किसान सुरेंद्र सेठी ने बताया कि वे अपनी करीब दो एकड़ जमीन पर ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का उपयोग कर रहे हैं। 52 वर्षीय सुरेंद्र सेठी अपने खेतों में लोबिया और राजमा जैसी फसलों की खेती करते हैं और उनका कहना है कि इस तकनीक से पानी की बचत के साथ उत्पादन में भी सुधार हुआ है।



सरकार की तैयारी और राहत योजना

केंद्र और राज्य सरकारें संभावित कमजोर मानसून को देखते हुए पहले से तैयारी में जुट गई हैं। कृषि मंत्रालय ने सूखा सहन करने वाले बीजों का बफर स्टॉक, सिंचाई सुविधाओं और जल संरक्षण योजनाओं पर जोर दिया है। सरकार का कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में अब सिंचाई नेटवर्क और जलाशयों की स्थिति बेहतर है, जिससे बड़े संकट को काफी हद तक संभाला जा सकेगा।



सिर्फ खेती नहीं, खाद्य कीमतों पर भी असर

यदि एल नीनो के कारण उत्पादन घटता है, तो खाद्यान्न और सब्जियों की कीमतों में तेजी आ सकती है। कपास, धान और दालों के उत्पादन में गिरावट से बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार एल नीनो का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखला, पशुपालन और बिजली उत्पादन तक भी दिखाई दे सकता है।



समय रहते तैयारी ही बचाव

बदलते मौसम के दौर में किसानों को “मौसम आधारित खेती” अपनानी होगी। सही समय पर बुवाई, कम पानी वाली फसलें, जल संरक्षण और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती करना ही इस संभावित संकट से बचने का सबसे प्रभावी तरीका माना जा रहा है। आने वाले हफ्तों में मानसून की स्थिति और साफ होगी, लेकिन अभी से तैयारी शुरू करना किसानों के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।

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