भिंडी-खीरा-तरबूज की किस्मों के इस्तेमाल से मिले ₹5.68 करोड़, जानिए किन राज्यों को मिला कितना हिस्सा
देश की जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले आर्थिक लाभ का एक हिस्सा अब उनके संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हित में लगाया जा रहा है। इसी दिशा में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने पहुँच और लाभ-बंटवारा (ABS)व्यवस्था के तहत 5.68 करोड़ रुपये की राशि जारी की है। यह रकम अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जैव विविधता से जुड़े कामों के लिए दी गई है।
इस राशि का बड़ा हिस्सा खेती में इस्तेमाल होने वाली फसलों की अलग-अलग किस्मों से जुड़ा है। इसमें भिंडी, खीरा और तरबूज के साथ कुछ सूक्ष्मजीवों और अन्य कृषि संसाधनों के इस्तेमाल से मिलने वाली राशि भी शामिल है। एनबीए के मुताबिक़, इस फंड का इस्तेमाल जैव विविधता के संरक्षण, शोध, स्थानीय स्तर पर रिकॉर्ड तैयार करने और समुदायों की आजीविका को बढ़ावा देने जैसे कामों में किया जाएगा।
भिंडी की किस्मों से मिली सबसे ज़्यादा राशि
ताज़ा जारी की गई रकम में सबसे बड़ा हिस्सा भिंडी से जुड़ा है। भिंडी की 139 किस्मों और 28 हाइब्रिड किस्मों के इस्तेमाल के लिए 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 3.51 करोड़ रुपये दिए गए हैं। एनबीए के अनुसार, यह राशि नन्हेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से प्राप्त हुई थी। कंपनियों की ओर से जैविक संसाधनों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर एबीएस व्यवस्था के तहत मिलने वाली राशि का एक हिस्सा संबंधित क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण के कामों के लिए दिया जाता है।
भिंडी के अलावा तरबूज और खीरे की बड़ी संख्या में किस्मों से भी राशि प्राप्त हुई है। तरबूज की 662 किस्मों और 15 हाइब्रिड किस्मों, जबकि खीरे की 1,009 किस्मों और 14 हाइब्रिड किस्मों के इस्तेमाल से जुड़ी रकम भी इसमें शामिल है। इन जैविक संसाधनों को नन्हेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ईस्ट वेस्ट सीड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और बायर साइंस एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों ने बाज़ारों और व्यापारियों के ज़रिए हासिल किया था।
बाज़ार के ज़रिए खरीदी गई फसलें
अब सवाल यह है कि जब इन फसलों को उगाने वाले किसान मौजूद हैं, तो राशि सीधे किसानों को क्यों नहीं दी गई? एनबीए के मुताबिक़, संबंधित कंपनियों ने इन फसलों और जैविक संसाधनों को सीधे किसानों से नहीं खरीदा था। इनकी खरीद बाज़ारों और व्यापारियों के माध्यम से हुई थी। ऐसे में यह पहचान करना मुश्किल था कि संबंधित जैविक संसाधन किस किसान, समुदाय या किसी ख़ास क्षेत्र से आया है। इसी वजह से विशेषज्ञ समिति की सिफ़ारिश के आधार पर तय किया गया कि यह राशि उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बांटी जाए, जहाँ इन फसलों की खेती होती है। इस तरह लाभ-बंटवारे की राशि को व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण के कामों से जोड़ा गया है।
इन राज्यों को मिली कितनी राशि?
ताज़ा वितरण में गुजरात को 88,79,304 रुपये मिले हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल को 78,08,691 रुपये और मध्य प्रदेश को 64,90,418 रुपये दिए गए हैं। ओडिशा को 59,01,641 रुपये, बिहार को 45,59,602 रुपये और उत्तर प्रदेश को 36,90,952 रुपये मिले हैं। वहीं, तमिलनाडु को 34,11,119 रुपये, आंध्र प्रदेश को 30,58,472 रुपये, छत्तीसगढ़ को 24,82,991 रुपये और महाराष्ट्र को 17,57,359 रुपये दिए गए हैं। इसके अलावा दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 87,77,728 रुपये रखे गए हैं। इस तरह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कुल राशि 5.68 करोड़ रुपये है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा पुणे स्थित सीएसआईआर-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी-नेशनल कल्चर ऑफ इंडस्ट्रियल माइक्रोऑर्गेनिज्म को भी एबीएस व्यवस्था के तहत फंड दिया गया है। यह राशि हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड से प्राप्त हुई थी। शोध संस्थान इस फंड का इस्तेमाल जैविक संसाधनों के रखरखाव, शोध, संरक्षण और क्षमता निर्माण से जुड़े कामों में कर सकेंगे।
गाँवों में तैयार होंगे जैव विविधता रजिस्टर
सरकार के नियमों के मुताबिक़, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दी गई एबीएस राशि का इस्तेमाल जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32 के तहत किया जाएगा। इस रकम से गांवों में पीपल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार करने का काम भी किया जाएगा। इन रजिस्टरों में स्थानीय स्तर पर मौजूद जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी दर्ज की जाती है। इसके अलावा जंगली पौधों के संरक्षण, पर्यावरण सुधार, जैव विविधता विरासत स्थलों को मज़बूत करने, शोध और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़े कामों पर भी पैसा खर्च किया जा सकेगा।
एबीएस के ज़रिए अब तक ₹191 करोड़ से ज़्यादा का वितरण
एनबीए के मुताबिक़, ताज़ा भुगतान के बाद प्राधिकरण की ओर से अब तक वितरित की गई कुल एबीएस राशि 191 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। एबीएस व्यवस्था का मूल उद्देश्य यही है कि देश के जैविक संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल होने पर उससे मिलने वाला लाभ सिर्फ़ कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि जैव विविधता के संरक्षण और उससे जुड़े स्थानीय हितों में भी वापस लगाया जाए। ताज़ा 5.68 करोड़ रुपये का वितरण इसी व्यवस्था के तहत किया गया है।